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वंदे मातरम और जन गण मन में ‘महान’ कौन, क्यों मचा है ऐसा शोर?

by National Agenda
July 12, 2026
in National
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Vande Mataram
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नई दिल्ली। केंद्र सरकार ने सभी राज्यों और केंद्रीय मंत्रालयों को एक बार फिर सख्त निर्देश दिया है कि सरकारी कार्यक्रमों में जब भी राष्ट्रगान और राष्ट्रगीत दोनों बजाए या गाए जाएं तो पहले ‘वंदे मातरम’ बजाना या गाना होगा, उसके बाद ‘जन गण मन’ गाया या बजाया जाएगा। गृह मंत्रालय ने 9 जुलाई को सभी राज्यों के मुख्य सचिवों और केंद्रीय मंत्रालयों के सचिवों को पत्र लिखकर कहा कि इस नियम का सख्ती से पालन किया जाए।

केंद्र सरकार का निर्देश है कि ‘वंदे मातरम’ और ‘जन गण मन’ को सही शब्दों, सही उच्चारण और सही लय में ही गाया या बजाया जाए। फरवरी महीने में भी सरकार ने आदेश दिया था कि वंदे मातरम के सभी छह छंद पूरे गाए जाएं, जो करीब 3 मिनट 10 सेकंड का होता है। अब इस नियम को दोबारा याद दिलाया गया है।

‘वंदे मातरम’ की रचना बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय ने की थी। यह उनके प्रसिद्ध उपन्यास ‘आनंदमठ’ का हिस्सा है। यह गीत, भारत माता की आराधना है। स्वतंत्रता आंदोलन के समय कांग्रेस ने इसके पहले दो छंदों को अपनाया था। बाद में इसे राष्ट्रगीत का दर्जा दिया गया। ‘जन गण मन’ की रचना रवींद्रनाथ टैगोर ने की थी।

वंदे मातरम पर क्या कानून लाने जा रही है सरकार?

सरकार जल्द ही संसद के मानसून सत्र में एक बिल लाने जा रही है, जिसमें वंदे मातरम का अपमान करने या इसे गाने में बाधा डालने को दंडनीय अपराध बनाया जाएगा।  राष्ट्रीय गौरव अपमान निवारण अधिनियम, 1971 की धारा 3 के तहत राष्ट्रगान, राष्ट्रध्वज और संविधान का अपमान करने पर तीन साल तक की सजा हो सकती है। सरकार चाहती है कि सभी संस्थाएं और संगठन इन निर्देशों का पूरी तरह पालन करें।

वंदे मातरम या जन गण मन महान कौन?

संवैधानिक मामलों की जानकार और सुप्रीम कोर्ट में अधिवक्ता रुपाली पंवार बताती हैं, ‘वंदे मातरम और जन गण मन दोनों ही महान हैं, लेकिन अलग-अलग भूमिकाओं में। ये बहस राजनीतिक और भावनात्मक है, न कि संवैधानिक। जन गण मन पर किसी वर्ग को कोई आपत्ति नहीं है, वहीं वंदे मातरम को आलोचक सेक्युलर विचारधारा के खिलाफ मानते हैं। इसके सिर्फ दो छंद राष्ट्रगीत के तौर पर स्वीकृत हैं लेकिन जन गण मन में किसी खास धर्म या देवी का सीधा जिक्र नहीं है।’

कितनी पुरानी ये बहस है?

दीवान लॉ कॉलेज में असिस्टेंट प्रोफेसर निखिल गुप्ता बताते हैं, ’24 जनवरी 1950 को संविधान सभा में डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने जन गण मन को राष्ट्रगान और वंदे मातरम को राष्ट्रगीत घोषित करते हुए कहा था कि दोनों को समान सम्मान मिलेगा। अब सरकार कह रही है कि यह मूल भावना थी, जिसे अब कानूनी रूप दिया गया है लेकिन सेक्युलर वर्ग को वंदे मातरम पर आपत्ति है। इस्लाम में ईश्वर के अतिरिक्त कोई पूजा के योग्य नहीं है, इसलिए ज्यादातर मुसलमानों को इस पर ऐतराज है।’

आलोचना क्या है?

असदुद्दीन ओवैसी और अबू आजमी जैसे मुस्लिम नेताओं का साफ कहना है कि वे वंदे मातरम का सम्मान करते हैं लेकिन वंदे मातरम नहीं कहेंगे। उनका धर्म, उन्हें ईश्वर के अलावा किसी की पूजा से रोकता है। यह उनका धार्मिक अधिकार है कि वे वंदे मातरम न कहें। असदुद्दीन ओवैसी तो यहां तक कह चुके हैं, ‘अगर आप मुझे किसी और की पूजा करने के लिए मजबूर करते हैं, तो मेरी धार्मिक आजादी कहां रही?’

AIMIM प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी ने कहा कि जन-गण-मन को संविधान के तहत विशेष दर्जा प्राप्त है, जबकि वंदे मातरम की ऐतिहासिक अहमियत तो है पर दोनों को समान कानूनी स्तर पर रखना उचित नहीं होगा।

सरकार की सोच क्या है?

कानूनी और संवैधानिक रूप से आज भी जन गण मन ही भारत का राष्ट्रगान है और वंदे मातरम राष्ट्रगीत है। सरकार का दावा है कि नए नियम बस दोनों को बराबर सम्मान देने के लिए लाए जा रहे हैं। यह किसी को महान घोषित करने का मामला नहीं है।

क्या कह रहा है पक्ष?

नेशनलिस्ट काग्रेंस पार्टी (शरद पवार) के राष्ट्रीय प्रवक्ता नसीम सिद्दीकी कहते हैं, ‘मैंने पहले भी कई इंटरव्यू में कहा है, मुसलमान ‘वंदे मातरम’ नहीं गा सकते क्योंकि उनकी मान्यता के अनुसार, वे केवल एक ईश्वर की पूजा करते हैं और उनमें विश्वास रखते हैं। इसलिए, वे ईश्वर के अलावा किसी और के सामने या किसी और चीज के सामने अपना सिर नहीं झुका सकते।’

कुछ ऐसा ही तर्क कांग्रेस सांसद जेपी माथर ने कहा, ‘यह ठीक है, और निश्चित रूप से हम सभी को वंदे मातरम और राष्ट्रगान का सम्मान करना चाहिए। मैंने वह नोटिफिकेशन या निर्देश नहीं देखा है। जिस तरह से यह सरकार काम करती है, वह हमेशा इसमें कोई न कोई राजनीतिक एजेंडा शामिल करने या लोगों पर किसी तरह का दबाव डालने की कोशिश करती है।’

क्या कहते हैं सत्ता पक्ष के लोग?

आचार्य प्रमोद कृष्णम ने कहा, ‘वंदे मातरम भारत की आत्मा की आवाज है। देश की आजादी की लड़ाई वंदे मातरम के नारे के साथ लड़ी गई थी। इसलिए, वंदे मातरम गाना या बोलना हर भारतीय के लिए गर्व की बात है और हर नागरिक को ऐसा करना चाहिए।’

बीजेपी सांसद शशांक मणि ने कहा, ‘वंदे मातरम को कांग्रेस और पूर्ववर्ती सरकारों ने भुला दिया था। उन्होंने सिर्फ पहले दो छंद रखे थे और हमने देखा, पार्लियामेंट में जो डिबेट हुई तो उसमें ये निकल कर आया कि सभी छंद बंकिमचंद्र चट्टोपाध्याय जी ने 150 साल पहले लिखे थे और इसके उच्चारण से मां भारती का जयगान होता है। सांस्कृतिक राष्ट्रवाद को आगे बढ़ाया जा सकता है। इसी कारणवश हमारी सरकार ने ये लागू किया है कि वंदे मातरम का पूर्ण गान होना चाहिए और पहले होना चाहिए।’

वंदे मातरम vs जन गण मन का शोर क्यों?

वंदे मातरम मूल रूप से 6 छंदों का है। पहली दो पंक्तियां मातृभूमि की स्तुति हैं। बाद की पंक्तियों में दुर्गा और हिंदू देवियों का रूपक लिया गया है। अल्पसंख्यकों को इस पर ऐतराज है। स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान वंदे मातरम को खूब गाया गया। क्रांतिकारियों ने इसे सुर बना लिया। यह रचना 7 नवंबर 1875 को लिखी गई थी। गीत के कुछ छंदों में देवी-पूजा और युद्धाभिलाषा जैसी पंक्तियां हैं। 1930 से 40 के दौर में रवीन्द्रनाथ टैगोर और सुभाष चंद्र बोस के बीच भी इस गीत को लेकर बहस हुई।

1937 तक जवाहर लाल नेहरू,  महात्मा गांधी और रवींद्र नाथ टैगोर की सलाह पर दो छंदों को स्वीकार किया। तब कुछ मुस्लिम नेताओं ने दुर्गा और लक्ष्मी के रूपक वाले बाद के छंदों और उपन्यास के संदर्भों पर आपत्ति जताई। यह पूरा गीत, राष्ट्रगान नहीं बन सका। एक पक्ष आज कहता है कि वंदे मातरम स्वाधीनता संग्राम का असली गान है, इसे पूरा गाने का अधिकार और अनिवार्यता से जुड़ा कानून बनना चाहिए। दूसरे पक्ष का तर्क है कि धर्मनिरपेक्ष भारत में यह हिंदू धर्म की ओर झुका है, इसे संवैधानिक मजबूरी नहीं बनानी चाहिएष जन गण मन इससे बेहतर विकल्प है।

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