नई दिल्ली। उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव 2027 को लेकर बीजेपी का नया प्लान तैयार हो रहा है. इस बार यूपी चुनाव में भारतीय जनता पार्टी ने बेहद सख्त ‘एज फैक्टर’ फॉर्मूला तैयार किया है. इस फॉर्मूले की वजह से पार्टी के करीब एक दर्जन से अधिक विधायकों, जो 75 वर्ष की उम्र पार कर चुके हैं उनका टिकट कट सकता है. इस रिपोर्ट में जानिए किन-किन दिग्गजों का पत्ता साफ हो सकता है और क्या उनके बच्चों को बीजेपी टिकट देगी?
यूपी चुनाव 2027 में 75 पार विधायकों के लिए क्या बीजेपी का प्लान?
लखनऊ. उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव 2027 की बिसात बिछनी शुरू हो चुकी है. दिल्ली से लेकर लखनऊ तक भारतीय जनता पार्टी के रणनीतिकार सत्ता में लगातार तीसरी बार वापसी का खाका खींच रहे हैं. लेकिन इस बार का चुनाव बीजेपी के कई कद्दावर और उम्रदराज नेताओं के लिए सियासी संन्यास की घंटी साबित हो सकता है. उत्तर प्रदेश विधानसभा के 2027 चुनावों में बीजेपी के सामने सबसे बड़ी आंतरिक चुनौती उम्रदराज विधायकों की है. 2022 में बीजेपी ने 255 सीटें जीतीं. कई वरिष्ठ विधायक अब 75 वर्ष की उम्र पार कर चुके हैं या 2027 तक पार कर जाएंगे. इस बार पार्टी का फोकस ‘एक परिवार, एक टिकट’ और मेरिट-बेस्ड उम्मीदवार चयन पर है, लेकिन क्षेत्रीय समीकरणों में परिवार के युवा चेहरों को मैदान में उतारने की रणनीति भी नजर आ रही है.
पार्टी सूत्रों के मुताबिक, केंद्रीय नेतृत्व इस बार ‘मिशन 2027’ में एंटी-इंकंबेंसी यानी सत्ता विरोधी लहर को कम करने और संगठन में नई ऊर्जा फूंकने के लिए एक कड़ा कदम उठाने जा रहा है, जिसके तहत 75 साल या उससे अधिक उम्र के विधायकों का टिकट कटना लगभग तय माना जा रहा है. ऐसे में बीजेपी के भीतर चल रही इस आंतरिक सुगबुगाहट ने कई दिग्गज नेताओं की नींद उड़ा दी है, जिनका राजनीतिक भविष्य अधर में लटकता नजर आ रहा है. बीजेपी में अघोषित रूप से लागू 75 साल के रिटायरमेंट फॉर्मूले को लेकर समय-समय पर चर्चा होती रही है. उत्तर प्रदेश की मौजूदा विधानसभा में बीजेपी के पास लगभग 258 विधायक हैं. इंटरनल सर्वे और खुफिया रिपोर्टों के आधार पर पार्टी ने एक ऐसी लिस्ट तैयार की है, जिसमें करीब 12 से 15 विधायक ऐसे हैं जो साल 2027 के चुनाव तक 75 वर्ष की उम्र सीमा को पार कर चुके होंगे या उसके बेहद करीब होंगे.
यूपी बीजेपी में 75+ के कितने विधायक?
इन उम्रदराज नेताओं में कई ऐसे नाम शामिल हैं जो विधानसभा के सबसे वरिष्ठ मंत्रियों और विधायकों में गिने जाते हैं. उदाहरण के तौर पर आठ बार के विधायक और मौजूदा सरकार में संसदीय कार्य व वित्त मंत्री सुरेश कुमार खन्ना, जय प्रताप सिंह और सूर्य प्रताप शाही जैसे कद्दावर चेहरे उम्र के उस पड़ाव पर हैं, जहां पार्टी नेतृत्व अब विकल्प तलाशने लगा है. इसके अलावा पश्चिम से लेकर पूर्वांचल तक फैले कई अन्य बुजुर्ग विधायकों के नामों पर भी तलवार लटकी हुई है.
क्या बेटे, बेटी या बहू को मिलेगा मैदान?
टिकट कटने के डर के बीच, इन उम्रदराज नेताओं ने पार्टी के भीतर अपनी विरासत को बचाने के लिए हाथ-पैर मारना शुरू कर दिया है. लखनऊ के सियासी गलियारों में चर्चा आम है कि ये नेता अपने बेटों, बेटियों या बहुओं को अपनी पारंपरिक सीटों से मैदान में उतारने के लिए पैरवी कर रहे हैं. ऐसे में यदि बीजेपी अपने ही बुजुर्ग नेताओं के बच्चों को थोक के भाव टिकट बांटती है, तो विपक्ष को ‘परिवारवाद’ के मुद्दे पर हमला करने का सीधा मौका मिल जाएगा. वहीं दूसरी तरफ, अगर इन स्थानीय क्षत्रपों के परिवारों को पूरी तरह नजरअंदाज किया गया, तो भीतरघात और बगावत का खतरा बढ़ सकता है.
डबल लेयर सर्वे से तय होगा नेताओं का भविष्य
यूपी की राजनीति को करीब से जानने वाले वरिष्ठ पत्रकार संजीव पांडेय कहते हैं, ‘यूपी भाजपा के सामने 2027 में दोहरी चुनौती है. एक तरफ लगातार तीसरी बार सत्ता में वापसी का लक्ष्य है, दूसरी तरफ नए नेतृत्व को आगे लाने का दबाव भी बढ़ रहा है. पार्टी के कई वरिष्ठ विधायक 75 वर्ष की सीमा पार कर चुके होंगे या उसके करीब पहुंच जाएंगे. इनमें कुछ ऐसे चेहरे हैं जो कई दशक से क्षेत्रीय राजनीति के केंद्र में रहे हैं और जिनकी पहचान पार्टी से बड़ी मानी जाती है. राजनीतिक गलियारों में चर्चा है कि भाजपा इस बार विनेबिलिटी प्लस सक्सेशन मॉडल पर काम कर सकती है. यानी जहां वरिष्ठ नेता चुनाव लड़ने की स्थिति में नहीं होंगे, वहां उनके परिवार के किसी सदस्य जैसे बेटे, बेटी, बहू या राजनीतिक उत्तराधिकारी को मौका दिया जा सकता है. यह प्रयोग भाजपा पहले भी कई राज्यों में सीमित स्तर पर कर चुकी है.
बीजेपी इस बार किसी भी कीमत पर जोखिम उठाने के मूड में नहीं है. पार्टी ने साफ कर दिया है कि केवल उम्र ही नहीं, बल्कि परफॉर्मेंस और पब्लिक परसेप्शन ही टिकट का अंतिम पैमाना होगी. इसके लिए आरएसएस (RSS) और निजी एजेंसियों के माध्यम से एक ‘डबल लेयर सर्वे’ कराया जा रहा है. यदि कोई 75 पार का नेता अपने क्षेत्र में बेहद लोकप्रिय है और उसके बिना सीट हारने का खतरा है, तो पार्टी अपवाद स्वरूप विचार कर सकती है. लेकिन जहां भी विधायक के खिलाफ नाराजगी है, वहां उनका पत्ता साफ होना तय है. ऐसे में साफ है कि 2027 का चुनाव यूपी बीजेपी में एक बड़े पीढ़ीगत बदलाव का गवाह बनने जा रहा है, जहां पुराने दिग्गजों की विदाई होगी और नए चेहरों को अपनी किस्मत आजमाने का मौका मिलेगा.










