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PM मोदी ने एक तीर से साधे कई निशाने, 70 साल पुराना वादा भी पूरा किया

by National Agenda
June 9, 2026
in Diplomacy, National
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pm modi
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नई दिल्ली। निर्वाचित प्रधानमंत्री के तौर पर पंडित जवाहर लाल नेहरू को पीछे छोड़ते नरेंद्र मोदी की सबसे बड़ी उपलब्धि अपनी पार्टी की पहचान से जुड़े मुद्दों को जमीनी सच्चाई में बदल देने की है. भारतीय जनसंघ (बाद में भाजपा) अपनी स्थापना के समय से ही कश्मीर के सवाल पर पंडित नेहरू की नीतियों और राज्य को विशेष दर्जा दिए जाने की विरोधी रही है. पार्टी के संस्थापक अध्यक्ष डॉक्टर श्यामा प्रसाद मुखर्जी का 23 जून 1953 को श्रीनगर में हिरासत में बलिदान ” एक देश में दो विधान – दो प्रधान और दो निशान ” के विरोध में चलाए गए आंदोलन के दौरान हुआ.

मोदी ने 5 अगस्त 2019 अनुच्छेद 370 और 35A समाप्त कर पाकिस्तान के साथ ही कश्मीर की उन ताकतों को सीधी चुनौती दी, जो इन प्रावधानों के खात्मे की स्थिति में घाटी में तिरंगा उठाने वाले हाथ लापता होने की चुनौती दे रहे थे.

कश्मीर के सवाल पर पंडित नेहरू और संघ जनसंघ की सोच दो विपरीत किनारों पर रही है. प्रधानमंत्री के रूप में मोदी ने मातृ संगठन संघ और पार्टी के पुरखों की सोच और वायदे को सच में बदला है. पढ़िए उसकी कहानी…

कश्मीर हमेशा से जनसंघ – भाजपा के एजेंडे में रहा

अगस्त 1952 में जम्मू में एक विशाल जनसभा को संबोधित करते हुए डॉक्टर श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने कहा था , ” मैं आपको भारतीय संविधान दिलाऊंगा या उसके लिए अपने प्राण न्योछावर कर दूंगा. ” जम्मू – कश्मीर के भारत में विलय के बाद भी उस समय यह स्थिति थी कि राज्य के किसी भाग में तिरंगा नहीं फहराया जा सकता था. शेष भारत के किसी राज्य से जम्मू – कश्मीर में प्रवेश के लिए विशेष परमिट की अनिवार्यता थी. यहां तक कि सुप्रीम कोर्ट, चुनाव आयोग और नियंत्रक – लेखा महापरीक्षक को भी इस राज्य में कोई अधिकार नहीं प्राप्त था. भारतीय जनसंघ की यह शैशव अवस्था थी. लेकिन मुखर्जी की अगुवाई में पार्टी ” एक देश में दो विधान – दो प्रधान और दो निशान ” के नारे के साथ मुखर थी.

फरवरी 1953 में कानपुर में पार्टी के पहले महाधिवेशन में कश्मीर का मुद्दा छाया रहा. प्रधानमंत्री नेहरू ने सरदार पटेल के विरोध के बाद भी कश्मीर का प्रश्न सयुंक्त राष्ट्र संघ के सिपुर्द कर दिया था. पार्टी ने इसके खिलाफ आंदोलन छेड़ने का फैसला किया. जम्मू – कश्मीर पुलिस ने 11 मई 1953 को डॉक्टर मुखर्जी को गिरफ्तार किया. हिरासत में ही 23 जून 1953 को उनकी संदिग्ध परिस्थितियों में मृत्यु हुई. भारतीय जनसंघ और आगे भाजपा ने कश्मीर के विशेष दर्जे के खात्मे को अपने एजेंडे में हमेशा बनाए रखा.

मोदी के उदय से तस्वीर बदली

भाजपा को केंद्र की सत्ता तक पहुंचने में कठिन यात्रा पूरी करनी पड़ी. पार्टी के शिखर नेता अटल बिहारी वाजपेयी ने 1998-2004 के मध्य एन.डी.ए. की दो सरकारों की अगुवाई की. कई दलों की बैसाखी पर चलती उनकी सरकार के समय असली चुनौती कार्यकाल पूरा करने की थी. 1998 की सरकार साल भर के भीतर विदा हो गई. 1999 से 2004 के बीच उनकी काफी शक्ति सहयोगियों को साधने में लगी. लेकिन 2013 में नरेंद्र मोदी के केन्द्रीय राजनीति में प्रवेश और 2014 के चुनाव में मोदी – मोदी की गूंज के बीच भाजपा की धमाकेदार जीत के साथ केंद्र की पूरी तस्वीर बदल गई. मोदी की बड़ी कामयाबी थी कि उन्होंने इसके पहले के ढाई दशकों से केंद्र में चल रही गठबंधन सरकारों के दौर से देश को निजात दिलाई. 2019 के चुनाव में उनकी जीत और बड़ी थी.

गठबंधन के दबावों से मुक्त मोदी ने केवल स्थिर सरकारें ही नहीं दीं अपितु विकास के साथ ही राष्ट्रीय – अंतरराष्ट्रीय मोर्चे पर भारत की मजबूत छवि निर्मित की. यही समय था , जब उन्होंने कश्मीर से अनुच्छेद 370 और धारा 35A समाप्त करने और अयोध्या में राम मंदिर निर्माण के पार्टी के पुराने वायदे पूरे किए. बेशक 2024 के चुनाव में वे थोड़ी सी सीटों की कमी से पूर्ण बहुमत नहीं प्राप्त कर सके , लेकिन उनकी तीसरी सरकार के अब तक का कार्यकाल के संदेश बिलकुल साफ हैं कि सहयोगियों को पूरा सम्मान देते हुए , वे किसी दबाव में शासन नहीं कर रहे हैं.

कश्मीर एक बड़ी चुनौती

आजादी के बाद से ही कश्मीर का सवाल भारत के लिए चुनौती रहा है. इसी के चलते 1947,1965 और 1999 में पाकिस्तान के तीन युद्धों का भारत ने सामना किया. बात यहीं नहीं थमी. राज्य में अशांति और आतंकवाद का पाकिस्तान प्रायोजित सिलसिला लगातार चलता रहा है. भाजपा मानती रही है कि कश्मीर की समस्या पंडित नेहरू के गलत फैसलों और नीतियों की देन है. उसके नेता बराबर कहते रहे कि कश्मीर के प्रश्न पर अगर नेहरू ने सरदार पटेल को दर – किनार नहीं किया होता तो देश को इस विषम स्थिति का सामना नहीं करना पड़ता. मोदी के सत्ता में आने तक कश्मीर के हालात बेहद नाजुक हो चुके थे. घुसपैठियों और सीमा पार से आ रहे आतंकियों – हथियारों और घाटी की अलगाववादी ताकतों के नापाक गठजोड़ ने वहां समानान्तर सत्ता स्थापित कर रखी थी. दशकों पहले लाखों कश्मीरी पंडित घाटी से बेदखल हो चुके थे.

राज्य की निर्वाचित सरकार और चुनाव प्रतीकात्मक रह गए थे. आतंकवादी वारदातें , पत्थरबाजी और सुरक्षाबलों द्वारा किसी आतंकी के मारे जाने पर उनके जनाजे पर उमड़ती भीड़ और हिंसा सीधे भारत की अखंडता के लिए चुनौती बने हुए थे. इस मुकाम पर कश्मीर को लेकर बड़ी सर्जरी और कड़े फैसले लिए जाने की जरूरत थी. राजनीति के जोड़ – घटाव से अलग हटकर स्वीकार किया जाना चाहिए कि इस नाजुक मुद्दे पर मोदी ने अपनी क्षमता प्रदर्शित करके इतिहास में अपना स्थान सुरक्षित किया है.

मोदी ने इतिहास रचा

अनुच्छेद 370 और 35A की समाप्ति के बाद जम्मू – कश्मीर को लेकर मोदी सरकार के फैसले बहस का विषय हो सकते हैं. राज्य के पूर्ण दर्जे का खात्मा . लद्दाख को अलग केंद्र शासित प्रदेश बनाया जाना. विधानसभा चुनाव बाद भी जम्मू – कश्मीर को पूर्ण राज्य का दर्जा न दिए जाने की शिकायत हो सकती है. लेकिन इससे इनकार नहीं किया जा सकता कि मोदी के शासन काल में कश्मीर में पत्थरबाजी बंद हुई है. आतंकवादी घटनाओं में उल्लेखनीय कमी में आई है. पुलवामा और पहलगाम के पाकिस्तानी कुकर्मों का ऑपरेशन बालाकोट और ऑपरेशन सिंदूर के जरिए माकूल जवाब दिया गया है.

राज्य की अलगाववादी ताकतों की फंडिंग रोक कर और अन्य कड़े उपायों के जरिए कमर तोड़ी गई है. तिरंगे को चुनौती देने वालों को सख्ती से कुचला गया है. सकारात्मक भी बहुत कुछ हुआ है. स्थानीय निकाय से राज्य विधानसभा तक के चुनावों में जोरदार मतदान हुआ. लंबे अंतराल पर चुनावों में धांधली की शिकायतें नहीं हुईं. राज्य में मोदी की विरोधी नेशनल कांफ्रेस की उमर अब्दुल्ला की सरकार है. लेकिन उनका लेफ्टिनेंट गवर्नर मनोज सिन्हा से समन्वय बना हुआ है.

मोदी कड़े फैसले लेने में नहीं हिचकते

जम्मू – कश्मीर के विशेष दर्जे को खत्म किए जाने के परिणामस्वरूप भारतीय संविधान और उसके तहत बने कानून वहां लागू किया जाना संभव हुआ है. इससे पश्चिम पाकिस्तान से आए शरणार्थियों, वाल्मीकि समुदाय और कुछ अन्य समूहों को पूर्ण नागरिक अधिकार एवं मतदान अधिकार मिले हैं. अशांति के लंबे दौर के बाद घाटी में पर्यटकों की रिकॉर्ड संख्या बढ़ी. व्यापारिक गतिविधियों के साथ ही विकास – निर्माण और औद्योगिक कारखानों का तेजी से विस्तार हो रहा है. शैक्षिक संस्थानों और चिकित्सा सुविधाओं के लिहाज से भी निरंतर कुछ नया जुड़ रहा है. अविश्वास की खाई पट रही है. पाकिस्तान के कारण कश्मीर अभी भी भारत की चिंताओं का बड़ा केंद्र है.

लेकिन अपने दृढ़ रवैये और स्पष्ट सोच से मोदी सिर्फ पाकिस्तान नहीं बल्कि कश्मीर की हर अलगाववादी सोच को स्पष्ट संदेश देने में सफल रहे हैं कि उनकी सरकार हर गलत हरकत का पूरी ताकत से जवाब देने में पीछे नहीं रहेगी. जवाहर लाल नेहरू कश्मीर समस्या का इलाज जिस रास्ते ढूंढते रहे ,उसने इसे और उलझाया. मोदी एक्शन में भरोसा करते हैं और उसे लेने में हिचकते नहीं. मोदी के इस रुख ने पाकिस्तान और घाटी की अलगाववादी ताकतों को कड़ी सीख दी है.

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