अयोध्या: अयोध्या के भव्य राम मंदिर परकोटा स्थित मां भगवती मंदिर के शिखर पर ध्वजारोहण करने प्रसिद्ध हिंदूवादी नेत्री साध्वी ऋतंभरा पहुंचीं. इस मौके पर उन्होंने मातृशक्ति इकाइयों की प्रमुख पदाधिकारियों के साथ संगठनात्मक बैठक की. उन्होंने महिलाओं को संबोधित करते हुए राष्ट्र निर्माण और सनातन समाज में मातृशक्ति की अहम भूमिका के बारे में विस्तार से बताया.
उन्होंने आधुनिक युग की महिलाओं को कड़ा संदेश देते हुए कहा कि यदि भारत को वास्तव में भारत बनाए रखना है, तो इसकी गारंटी स्वयं महिलाओं को ही देनी पड़ेगी.
दुर्गा वाहिनी की संस्थापक अध्यक्ष साध्वी ऋतंभरा
संतानों में संस्कारों का बीजारोपण: साध्वी ऋतंभरा के अनुसार वर्तमान दौर में केवल भारत की सनातन महिलाएं ही देश की संस्कृति और अस्मिता की सच्ची गारंटी बन सकती हैं. उन्होंने चिंता जताते हुए कहा कि आज के समाज में मर्यादा और महिलाओं की महिमा के जो पुराने प्रतिमान टूट रहे हैं, उन्हें समझना बेहद जरूरी है. आने वाली पीढ़ी को सुरक्षित करने के लिए संतानों के हृदय में बचपन से ही भारतीय संस्कृति के अनुरूप संस्कारों का बीजारोपण होना चाहिए. भगवती मंदिर के शिखर पर आज जो धर्म ध्वजा आरोहित हो रही है, वह हम सभी के संकल्पों और सांस्कृतिक राष्ट्रवाद की विजय का प्रतीक है.
रामलला के बाद रामराज की आस: उन्होंने आंदोलन के दिनों को याद करते हुए कहा कि दुर्गा वाहिनी और मातृशक्ति महिला मंडल की कार्यकर्ताओं ने राम मंदिर के लिए लंबा संघर्ष किया है. इस स्वर्णिम दृष्टि को साक्षात देखने और संकल्प की पूर्ति के लिए हमारी कई बहनों ने अपने जीवन की आहुतियां तक दी हैं. आज उन सभी पुरानी संघर्षी साथियों को एक बार फिर अयोध्या की पावन धरती पर एकत्रित देखकर मन अत्यंत भावुक है. हालांकि, भव्य राम मंदिर बनने के बाद भी हृदय में कुछ वेदनाएं बाकी हैं, क्योंकि जब टेंट से निकलकर रामलला अपने महल में आ गए हैं तो अब देश में वास्तविक राम राज्य भी आना चाहिए.
गौमाता और बेटियों की सुरक्षा जरूरी: साध्वी ऋतंभरा ने कहा कि देश में पूरी तरह से गौ माता सुरक्षित होनी चाहिए और हमारी बेटियां हर भय से मुक्त होकर सुखी होनी चाहिए. इसके अलावा देश के विभिन्न हिस्सों में सुनियोजित तरीके से हो रहे अवैध धर्मांतरण के खेल पर अब पूरी तरह रोक लगनी चाहिए. हमारे हृदय के अंदर आज भी जो कुछ सामाजिक पीड़ाएं बची हैं, उनका स्थायी निवारण करना हमारी सर्वोच्च प्राथमिकता है. इन सभी समस्याओं का समाधान समाज के सभी वर्गों के मिलकर सम्मिलित होने, सक्रिय रहने और जागृत होने से ही संभव है.
धड़कनों में बसे हैं रामलला: अयोध्या का यह भव्य धाम और रामलला का यह पावन द्वार हम सभी सनातनी हिंदुओं को अपने प्राणों से भी बढ़कर प्यारा है. प्रभु रामलला देश के करोड़ों रामभक्तों की धड़कनों और उनकी रोज चलती सांसों में रचे-बसे हुए हैं. भारत की आत्मा और यहां के प्राणों की प्रतिष्ठा वास्तव में प्रभु श्रीराम की इसी दिव्य सत्ता से ही संचालित होती है. परकोटे में विराजमान मां भगवती के यह अलौकिक दर्शन हम सबको राष्ट्र सेवा के मार्ग पर सदैव सक्रिय भूमिका निभाने के लिए प्रेरित कर रहे हैं.
राम मंदिर जन आंदोलन का इतिहास: इतिहास गवाह है कि सदियों लंबे चले राम मंदिर आंदोलन में देश की महिलाओं ने बहुत बड़ी और ऐतिहासिक भूमिका निभाई थी. चाहे देश के कोने-कोने से पूजित होकर आई रामशिलाओं के पूजन का कार्यक्रम हो या फिर राम जानकी रथयात्रा के संचालन की बात हो, हर जगह महिलाएं आगे रहीं. पूरे देश के अंदर सांस्कृतिक पुनर्जागरण का भारी कार्य करते हुए लाखों माताएं, बहनें और छोटी पुत्रियां अपने घरों की दहलीज पार कर बाहर निकली थीं. उस दौर में पूरा देश एक सुर में ‘जय श्री राम’ के गगनभेदी उद्घोष से गुंजायमान होने लगा था.
सर्वस्व अर्पण से बना मंदिर: साध्वी ऋतंभरा ने कहा कि राम मंदिर आंदोलन किसी एक विशिष्ट संगठन या संस्था का नहीं, बल्कि यह पूरे भारत का एक विराट जन आंदोलन था. इस राष्ट्रव्यापी यज्ञ में जहां देश का युवा वर्ग अपने तन का समर्पण कर रहा था, वहीं भामाशाहों ने अपने धन की तिजोरियां खोल दी थीं. दूसरी तरफ, देश की मातृशक्तियों ने अपने परिवार की सुख-सुविधाओं को त्यागकर इस पावन कार्य में अपना सर्वस्व अर्पण कर दिया था. महिलाओं ने स्वयं अपनी सक्रिय भूमिका निभाने के साथ-साथ अपने पुत्रों और पतियों को भी प्रेरित करके इस आंदोलन की रणभेरी में भेजा था.
काशी और मथुरा पर दिया संदेश: प्रतिकूलताओं और विपरीत राजनीतिक परिस्थितियों के बीच भी मातृशक्ति की यह जुझारू भूमिका इतिहास के सुनहरे अक्षरों में दर्ज हो चुकी है. अयोध्या की धरती से ही साध्वी ऋतंभरा ने अब देश के दो अन्य बड़े सांस्कृतिक केंद्रों यानी काशी और मथुरा को लेकर भी बड़ा संदेश दे दिया है. उन्होंने पूरी दृढ़ता से कहा कि अयोध्या, काशी और मथुरा एक साथ हमारी आध्यात्मिक सांसों में और सनातन संस्कृति के मूल में बोलता है. यही कारण है कि श्रीकृष्ण जन्मभूमि मथुरा और बाबा विश्वनाथ की नगरी काशी में भी ऐसा ही भव्य दृश्य बहुत जल्द पूरी दुनिया को देखने को मिलेगा.
भोजशाला की तरह सामने आएगा सच: उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि जिस तरह से हाल ही में धार की ऐतिहासिक भोजशाला को वैधानिक रूप से मुक्त कराया गया है, ठीक उसी तरह का दृश्य काशी और मथुरा में भी सामने आएगा. सनातन समाज किसी के धार्मिक स्थलों पर कोई अनाधिकार चेष्टा या जबरन कब्जा करने का प्रयास बिल्कुल नहीं कर रहा है. जो ऐतिहासिक और पुरातात्विक सत्य है, उसे अब दूसरे पक्ष को भी बिना किसी संकोच के खुले मन से स्वीकार कर लेना चाहिए. उन पवित्र स्थानों पर हमारे आराध्य देवों के स्वरूप और करोड़ों हिंदुओं की धार्मिक भावनाओं के अनुरूप ही भव्य परिसरों का निर्माण होना चाहिए.
अदालत में साक्ष्य पूरी तरह प्रत्यक्ष: वर्तमान में इन विवादों को लेकर देश की विभिन्न अदालतों में कई महत्वपूर्ण और ऐतिहासिक कानूनी प्रक्रियाएं सुचारू रूप से चल रही हैं. भगवान की मर्जी के बिना पत्ता भी नहीं हिलता, इसलिए जब ईश्वर चाहेगा तब हमें हमारे सभी आराध्य स्थल पुनः मूल स्वरूप में वापस मिलेंगे. साध्वी ऋतंभरा ने कहा कि अब काशी और मथुरा के लिए पूर्व की भांति किसी नए बड़े जनांदोलन की आवश्यकता दिखाई नहीं देती है. इसका मुख्य कारण यह है कि उन विवादित परिसरों में प्राचीन सनातन संस्कृति के साक्ष्य और वैज्ञानिक प्रमाण पूरी तरह से प्रत्यक्ष हैं.
पत्थर देते हैं इतिहास की गवाही: जैसे भोजशाला के 50 वर्षों के लंबे संघर्ष का परिणाम अब आप सबके सामने है, वैसे ही अन्य स्थानों का सत्य भी सामने आ रहा है. हमारी भारतीय संस्कृति के आधार पर भव्य और दिव्य स्वरूप को देखकर अब किसी भी व्यक्ति की अंतरात्मा यही कहेगी कि सत्य के पक्ष में खड़े हो जाओ. देश में जहां भी हमारे प्राचीन धर्म स्थान हैं, उनके गौरवमयी पुनरुत्थान का समय अब नजदीक दिखाई दे रहा है. अंत में उन्होंने एक बेहद मार्मिक बात कही कि दुनिया में मनुष्य तो अपने निजी स्वार्थ के लिए अपनी गवाही से बदल सकता है, परंतु ऐतिहासिक पत्थर और प्राचीन कलाकृतियां कभी अपनी गवाही से नहीं बदलतीं.












