नई दिल्ली। राष्ट्रीय कार्यकारिणी की घोषणा के बाद बीजेपी में अब संसदीय बोर्ड के गठन की चर्चा है. इस बोर्ड में बीजेपी शासित कई राज्यों के मुख्यमंत्रियों को शामिल करने की बात कही जा रही है. इनमें महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस और यूपी के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ का नाम प्रमुख है. संसदीय बोर्ड को बीजेपी का शीर्ष इकाई माना जाता है. इसी के पास पार्टी के सभी बड़े फैसले लेने का अधिकार है. इसमें शामिल नेताओं को बीजेपी में टॉप लीडरशिप कहा जाता है.
पार्टी के संविधान की धारा-25 में इसके गठन के बारे में विस्तार से बताया गया है. इसके मुताबिक संसदीय बोर्ड में अधिकतम 11 सदस्य हो सकते हैं और इसके अध्यक्ष बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष होते हैं. बोर्ड में पार्टी के सदन के नेता और एक महामंत्री का होना भी जरूरी है. इसके अलावा अन्य सदस्यों का चयन राष्ट्रीय अध्यक्ष करते हैं. यानी यह कोई ऐसी सामान्य समिति नहीं है, जिसमें पार्टी के हर स्तर के नेता शामिल हों.
इसमें ऐसे नेताओं को जगह मिलती है, जिनका पार्टी संगठन, सरकार और राजनीति में खास अनुभव और प्रभाव होता है.
5 सवालों में समझिए संसदीय बोर्ड की ताकत
- बीजेपी का संसदीय बोर्ड आखिर क्या है?
- इसमें कितने सदस्य होते हैं और कौन शामिल हो सकता है?
- संसदीय बोर्ड के पास कौन-कौन सी ताकत होती है?
- क्या बोर्ड का फैसला ही अंतिम फैसला होता है?
- सांसदों और विधायकों पर इसकी क्या नजर रहती है?
बीजेपी का संसदीय बोर्ड आखिर क्या है?
संसदीय बोर्ड को आसान भाषा में बीजेपी की सबसे अहम आंतरिक कमेटियों में से एक समझ सकते हैं. पार्टी के बड़े राजनीतिक और संगठनात्मक मामलों पर यहां चर्चा होती है. खासतौर पर ऐसे मुद्दे जिनका पार्टी की दिशा और रणनीति पर बड़ा असर पड़ सकता है, उनमें बोर्ड की भूमिका महत्वपूर्ण होती है.
इसमें पार्टी के शीर्ष स्तर के नेता शामिल होते हैं. इसलिए बोर्ड की बैठक को बीजेपी के भीतर काफी अहम माना जाता है. हालांकि, इसे सीधे तौर पर सरकार चलाने वाली संस्था नहीं समझना चाहिए. सरकार चलाने की जिम्मेदारी प्रधानमंत्री और मंत्रिपरिषद की होती है, जबकि संसदीय बोर्ड पार्टी के अंदर बड़े फैसलों और रणनीति से जुड़े मामलों में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है.
संसदीय बोर्ड में कौन शामिल हो सकता है?
बीजेपी के संविधान के मुताबिक संसदीय बोर्ड में 11 सदस्य हो सकते हैं. इनमें बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष बोर्ड के अध्यक्ष होते हैं. इसके अलावा पार्टी के सदन के नेता और एक महामंत्री का होना जरूरी है. महामंत्री कोटे से आमतौर पर संगठन महासचिव इसमें शामिल होते हैं. बाकी सदस्यों का चयन राष्ट्रीय अध्यक्ष करते हैं.
यानी 3 पद तो पहले से फिक्स है. बाकी के 8 पदों पर माथापच्ची की जाती है.
संसदीय बोर्ड के पास कौन-कौन सी ताकत होती है?
संसदीय बोर्ड का सबसे बड़ा काम पार्टी के महत्वपूर्ण मामलों पर फैसला लेना और दिशा तय करना है. इसके अधिकारों में कई अहम जिम्मेदारियां शामिल हैं. पार्टी के भीतर अनुशासन से जुड़े मामलों पर बोर्ड फैसला कर सकता है. इसके अलावा नीतिगत मुद्दों और संगठन से जुड़े बड़े मामलों पर भी चर्चा होती है. सरकार के गठन के समय भी संसदीय बोर्ड की भूमिका महत्वपूर्ण हो सकती है.
खासतौर पर मंत्रिमंडल के गठन को लेकर पार्टी की ओर से सलाह देने का काम यहां हो सकता है. इसके अलावा बीजेपी के संसदीय दल और अलग-अलग राज्यों के विधानमंडल दल की गतिविधियों की निगरानी भी संसदीय बोर्ड की जिम्मेदारियों में शामिल है.
क्या बोर्ड का फैसला ही अंतिम फैसला होता है?
यहां एक जरूरी बात समझना जरूरी है. संसदीय बोर्ड पार्टी की शीर्ष इकाइयों में से एक है, लेकिन इसके फैसलों के लिए पार्टी के संविधान में तय प्रक्रिया भी है. बोर्ड के फैसलों को 21 दिनों के भीतर राष्ट्रीय कार्यकारिणी के सामने अभिपुष्टि के लिए रखना जरूरी होता है.
यानी बोर्ड किसी महत्वपूर्ण मामले में फैसला ले सकता है, लेकिन उसे पार्टी की निर्धारित संवैधानिक प्रक्रिया से भी गुजरना होता है. इससे यह समझ आता है कि बीजेपी में निर्णय लेने की व्यवस्था सिर्फ एक व्यक्ति या एक समिति तक सीमित नहीं है. अलग-अलग स्तरों पर पार्टी के संविधान के मुताबिक प्रक्रिया तय की गई है.
सांसदों और विधायकों पर इसकी क्या नजर रहती है?
संसदीय बोर्ड का एक महत्वपूर्ण काम पार्टी के संसदीय दल और विधानमंडल दल की गतिविधियों की निगरानी करना भी है. बीजेपी के सांसद संसद में और विधायक विधानसभा में पार्टी की लाइन के मुताबिक काम कर रहे हैं या नहीं, संगठन से जुड़े मामलों में उनका प्रदर्शन कैसा है और किसी तरह का अनुशासन संबंधी मामला तो नहीं है- इन चीजों पर पार्टी का शीर्ष नेतृत्व नजर रखता है. इसी वजह से संसदीय बोर्ड को सिर्फ बैठक करने वाली कमेटी नहीं माना जाता. इसका संबंध पार्टी संगठन और उसके निर्वाचित प्रतिनिधियों, दोनों से जुड़ा हुआ है.
कौन हो सकता है संसदीय बोर्ड में शामिल?
संसदीय बोर्ड में कौन-कौन नेता होंगे, यह राजनीतिक रूप से भी काफी महत्वपूर्ण सवाल होता है. राष्ट्रीय अध्यक्ष इसके सदस्यों के चयन में अहम भूमिका निभाते हैं. आमतौर पर पार्टी में लंबे समय का अनुभव रखने वाले, संगठन की समझ रखने वाले और बड़े राजनीतिक फैसलों में भूमिका निभाने वाले नेताओं को इस तरह की शीर्ष जिम्मेदारियां मिल सकती हैं.
हालांकि, किसी खास समय पर कौन नेता बोर्ड में शामिल होगा, यह पार्टी के नेतृत्व और उस समय की राजनीतिक परिस्थितियों पर निर्भर करता है. इसलिए केवल किसी नेता के बड़े पद पर होने से यह तय नहीं हो जाता कि वह संसदीय बोर्ड का सदस्य भी होगा.












