नई दिल्ली। भाजपा राज्यसभा में पहली बार बहुमत के करीब पहुंच रही है. यह उसके लिए ही नहीं बल्कि बीते 40 सालों के संसदीय इतिहास में भी एक रिकॉर्ड है. भाजपा की उच्च सदन में बढ़ती ताकत के पीछे उसकी दोतरफा रणनीति है. इस पर वह लगातार काम कर रही है और टीएमसी के साथ भी ऐसा ही दिखा है. तृणमूल कांग्रेस के तीन राज्य सभा सांसदों से इस्तीफा दिलवा कर और उनके इस्तीफे से खाली सीटों पर उपचुनाव में उन्हें ही अपना उम्मीदवार बना कर भाजपा ने राज्य सभा में अपने ऑपरेशन का एक और चरण को पूरा कर लिया है.
संसद के ऊपरी सदन में अपनी संख्या बढ़ाने का उसका यह ऑपरेशन पिछले 12 वर्षों से चल रहा है, जिसे दो तरह से अंजाम दिया जा रहा है. इस तरह अब तक विपक्ष के 20 से भी अधिक सांसद भाजपा के खेमे में आ चुके हैं. इसके बूते भाजपा की राज्य सभा में अब तक की सर्वाधिक संख्या भी होने जा रही है. भाजपा मनोनीत और निर्दलीयों के सहयोग से साधारण बहुमत और सहयोगी दलों के साथ दो-तिहाई बहुमत के करीब भी पहुंच रही है. हालांकि 17 राज्यों में खुद की सरकार और 22 राज्यों में सहयोगियों के साथ सत्ता में होने का भी उसे लाभ मिला है जिसके कारण राज्य सभा में उसकी ताक़त बढ़ी है. राज्य सभा में ऑपरेशन दो तरह से चलाया जा रहा है.
यह ऑपरेशन इस तरह से होता है कि संविधान की दसवीं अनुसूची या दलबदल कानून का उल्लंघन न हो और भाजपा के पाले में आने वाले सांसदों की सदस्यता न जाए. जिन विपक्षी दलों में टूट के लिए जरूरी दो-तिहाई सांसदों की संख्या पूरी हो जाती है वहां वे भाजपा में विलय कर देते हैं. जैसा कि तेलुगु देशम पार्टी और आम आदमी पार्टी के मामलों में हुआ.
इन मामलों में उपचुनाव की आवश्यकता नहीं पड़ती. जिन विपक्षी दलों में टूट के लिए दो-तिहाई सांसद नहीं जुट पाते हैं, वहां एक-एक कर सांसदों से इस्तीफा दिलाया जाता है ताकि उनके इस्तीफे से उपचुनाव हो. यहां यह ध्यान रखा जाता है कि यह विपक्षी दलों के सांसद भाजपा शासित राज्यों से ही चुन कर आए हों. इसका मतलब कि जहां विधानसभा में भाजपा को बहुमत हो ताकि उनके इस्तीफे से खाली राज्य सभा सीट पर उपचुनाव होने पर वे भाजपा के टिकट पर दोबारा जीत कर राज्य सभा आ सकें.
ऐसा इसलिए क्योंकि राज्य सभा के उपचुनाव में संख्या बल के हिसाब से सत्तारूढ़ दल की जीत सुनिश्चित मानी जाती है. अगर एक से अधिक सीटों पर उपचुनाव हो तो हर उपचुनाव एक अलग चुनाव के तौर पर कराया जाता है. ऐसे में विपक्षी दल चाह कर भी न तो अपने उम्मीदवार खड़े कर सकते हैं और अगर खड़ा कर भी दें तो उसकी जीत सुनिश्चित नहीं करा सकते. हालांकि हाल में इसका फायदा कांग्रेस को भी मिला जब तमिलनाडु में डीएमके के राज्य सभा सांसद के इस्तीफे से खाली सीट पर हुए उपचुनाव में उसे एक सीट मिल गई क्योंकि सत्तारूढ़ टीवीके ने उसका समर्थन किया.












