नई दिल्ली। सऊदी अरब ने तेल पर बड़ा डिस्काउंट दिया है। एशिया के खरीदारों को कच्चे तेल पर बड़ी छूट दी है, इसमें भारत भी शामिल है। ऐसे में सवाल उठता है कि क्या भारत में पेट्रोल और डीजल सस्ते होंगे? इस सवाल का जवाब हम आपको आगे देंगे। पहले ये जानते हैं कि यह छटू क्यों और किसने दी है। दरअसल, सऊदी अरामको ने नवंबर के लिए अपने मुख्य तेल अरब लाइट की आधिकारिक कीमत ओमान/दुबई के औसत भाव से 5 डॉलर प्रति बैरल कम कर दी है। यह छह साल में सबसे बड़ी छूट है। अचानक लिया गया यह फैसला एशियाई बाजार, खासकर भारत और चीन जैसी बड़ी खरीदार अर्थव्यवस्थाओं को ध्यान में रखकर आया है। भारत अपनी जरूरत का बड़ा हिस्सा मध्य पूर्व से आयात करता है, इसलिए सऊदी कीमतों का सीधा असर यहां की रिफाइनरियों पर पड़ता है।
रिपोर्टों के अनुसार, यह कटौती रिफाइनरियों को सस्ता तेल देने के मकसद से नहीं की गई है। फारस की खाड़ी से तेल लाने वाले जहाजों का किराया हाल के महीनों में बहुत बढ़ गया है। सुरक्षा खर्च, लंबे रास्ते और भू-राजनीतिक तनाव की वजह से ढुलाई महंगी हो गई है। रिफाइनरियों का कहना है कि हर महीने करीब 3 डॉलर प्रति बैरल की यह कमी असल में टैंकरों को सुरक्षित रखने और माल ढुलाई की अतिरिक्त लागत को कवर करती है। यानी कागज पर छूट दिख रही है, लेकिन जहाज तक तेल पहुंचाने का कुल खर्च उतना नहीं घटा है।
अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कीमतें अभी भी हाई
रिपोर्ट के अनुसार, क्षेत्रीय औसत के मुकाबले छूट के बावजूद, दुनिया की बड़ी बेंचमार्क कीमतें ऊंची बनी हुई हैं। मिडिल ईस्ट तनाव और आपूर्ति को लेकर अनिश्चितता के कारण ब्रेंट क्रूड 100 डॉलर प्रति बैरल से ऊपर कारोबार कर रहा है। जब वैश्विक भाव इतने ऊंचे हों, तो भारत के लिए ऊर्जा की कच्ची लागत कम नहीं होती। सऊदी छूट स्थानीय औसत से जुड़ी है, जबकि भारत की कुल आयात लागत अंतरराष्ट्रीय भाव, बीमा, ढुलाई और डॉलर की कीमत पर भी निर्भर करती है।
रॉयटर्स और अन्य रिपोर्टों के मुताबिक, भारत की सरकारी तेल विपणन कंपनियां ( आईओसी, बीपीसीएल और एचपीसीएल) रिटेल ग्राहकों को राहत तभी देंगी, जब कच्चे तेल की कीमतें लंबे समय तक कम और स्थिर रहें। कुछ दिनों या एक महीने की छूट से पंप कीमत नहीं बदलने वाली हैं।
तेल कंपनियां पहले घाटा करती हैं पूरा
जब अंतरराष्ट्रीय कीमतें अचानक बढ़ती हैं, तो भारतीय तेल कंपनियां अक्सर पंप पर पुरानी कीमत बनाए रखती हैं और नुकसान उठाती हैं। इसे अंडर-रिकवरी कहा जाता है। बाद में जब कच्चा तेल सस्ता होता है या छूट मिलती है, तो ये कंपनियां पहले अपना पिछला घाटा पूरा करती हैं और मार्जिन ठीक करती हैं। उसके बाद ही पेट्रोल-डीजल सस्ता करने पर विचार होता है। इसलिए रिफाइनरी गेट पर लागत घटने और पंप पर कीमत घटने के बीच अक्सर लंबा अंतर रहता है।
टैक्स भी बड़ी वजह
भारत में पंप कीमत का बड़ा हिस्सा टैक्स है। केंद्र की एक्साइज ड्यूटी और राज्यों का वैट मिलकर ग्राहक के बिल का तय और भारी हिस्सा बनाते हैं। कच्चे तेल की कीमत में उतार-चढ़ाव का असर सिर्फ बेस कीमत पर पड़ता है। अगर कच्चा तेल कुछ डॉलर सस्ता भी हो, तो टैक्स वही रहने से ग्राहक को पूरी राहत नहीं मिलती। कई राज्यों में वैट अलग-अलग होने से एक ही दिन में शहरों के बीच कीमतों में फर्क भी दिखता है।












