लखनऊ: उत्तर प्रदेश की सियासत में साल 2027 का विधानसभा चुनाव सिर्फ एक सूबे की सत्ता का फैसला नहीं करेगा, बल्कि यह देश की भविष्य की राजनीति की दिशा तय करने वाला है. 5 जून 1972 को जन्मे मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ अब 54 साल के हो चुके हैं. उनके राजनीतिक जीवन के लिए यह पड़ाव सबसे अहम माना जा रहा है. बीते कुछ सालों से बीजेपी के केंद्रीय नेतृत्व के लिए योगी आदित्यनाथ उत्तर प्रदेश में निर्विवाद चेहरा बने हुए हैं.
यही कारण है कि प्रभु राम के नाम का मंत्र और राम मंदिर के सांस्कृतिक गौरव को ढाल बनाकर वह लगातार मैदान में डटे हुए हैं. बीजेपी के भीतर-बाहर हर जगह उनको चैलेंज करने वाला कोई नेता इस समय नहीं है. भाजपा यूपी चुनाव में एक बार फिर से सीएम योगी के चेहरे के साथ ही उतर रही है, यह राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नवीन के दो दिनों के लखनऊ दौरे से पता चल गया है. लेकिन इस बार उनके सामने समाजवादी पार्टी के सुप्रीमो अखिलेश यादव का सोशल इंजीनियरिंग का वह चक्रव्यूह है, जिसने हालिया दिनों में भाजपा को कड़ी टक्कर दी है.
उत्तर प्रदेश में लगातार दो बार पूर्ण बहुमत की सरकार चलाकर इतिहास रचने वाले योगी आदित्यनाथ भाजपा के सबसे बड़े यूथ आइकॉन और फायरब्रांड नेता हैं. 54 वर्ष की उम्र में उनकी प्रशासनिक पकड़, कठिन दिनचर्या और हिंदुत्व के साथ-साथ विकास का कॉम्बिनेशन उन्हें पार्टी में सबसे खास बनाता है. बीजेपी के केंद्र में उनके रहने की तीन मुख्य वजहें हैं पहला, ‘बुलडोजर मॉडल’ और अपराध पर जीरो टॉलरेंस की नीति ने पूरे देश में योगी की एक अलग पहचान बनाई है. अयोध्या में राम मंदिर निर्माण के बाद से हिंदुत्व के एजेंडे को जमीन पर उतारने का श्रेय सीधे योगी आदित्यनाथ के खाते में जाता है. राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नवीन के लखनऊ दौरे के दौरान यह साफ हो गया कि संगठन और सरकार के बीच समन्वय की धुरी केवल और केवल सीएम योगी ही हैं.
सपा प्रमुख अखिलेश यादव ने सूबे की राजनीति को ‘मंडल बनाम कमंडल’ के पुराने दौर की तरह एक नए खांचे में फिट कर दिया है, जिसे उन्होंने PDA पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक का नाम दिया है. हाल के लोकसभा चुनावों में इस फॉर्मूले ने बीजेपी को तगड़ा नुकसान पहुंचाया था. अखिलेश लगातार जातीय जनगणना का मुद्दा उठाकर गैर-यादव पिछड़ों और दलितों को अपने पाले में लाने की कोशिश कर रहे हैं. स्थानीय मुद्दों पर घेराबंदी जैसे पेपर लीक, बेरोजगारी और महंगाई जैसे मुद्दों को उठाकर सपा युवाओं को सीधे साध रही है.
‘राम नाम’ बनाम ‘सामाजिक न्याय’
उत्तर प्रदेश में राम मंदिर निर्माण और सनातन संस्कृति का मुद्दा हमेशा से भाजपा का सबसे मजबूत आधार रहा है. 2027 के चुनाव में भी भाजपा ‘राम का नाम’ लेकर राष्ट्रवाद और सांस्कृतिक अस्मिता के एजेंडे को धार दे रही है. लेकिन इस बार लड़ाई इसलिए भीषण है क्योंकि सपा इस धार्मिक ध्रुवीकरण को ‘सामाजिक न्याय’ और ‘हक-अधिकार’ की लड़ाई से काटना चाहती है. हाल ही में अयोध्या कांड यानी चंदा चोरी का मामला विपक्ष खसाकर सपा और अखिलेश यादव पूरे जोर- शोर से उठा रहे हैं. ऐसे में 54 साल के योगी आदित्यनाथ के लिए 2027 की जंग उनके राजनीतिक करियर की सबसे बड़ी परीक्षा है. अगर वे अखिलेश यादव के इस चक्रव्यूह को भेदने में सफल रहते हैं, तो न केवल उत्तर प्रदेश में भाजपा की हैट्रिक लगेगी, बल्कि राष्ट्रीय राजनीति में भी उनका कद बेहद मजबूत हो जाएगा.”
क्या PDA का चक्रव्यूह भेद पाएंगे योगी आदित्यनाथ?
बीजेपी इस बार किसी भी स्तर पर अति-आत्मविश्वास में नहीं दिख रही है. नितिन नवीन के हालिया दौरों और मैराथन बैठकों से साफ है कि भाजपा अपने ‘बूथ प्रबंधन’ और ‘शक्ति केंद्रों’ को नए सिरे से एक्टिवेट कर रही है. योगी आदित्यनाथ का सीधा मुकाबला अब अखिलेश के जमीनी समीकरणों से है. बीजेपी जहां ‘राम नाम’ और राष्ट्रवाद के सहारे बंटे हुए हिंदू वोटों को एक छत के नीचे लाने का प्रयास करेगी, वहीं अखिलेश यादव दलित-पिछड़ा गठजोड़ को टूटने से बचाने की कोशिश करेंगे. देखना दिलचस्प होगा कि 54 साल के संन्यासी का ‘सियासी प्रताप’ 2027 की इस भीषण जंग में विपक्ष के चक्रव्यूह को कैसे नेस्तनाबूद करता है.












