नई दिल्ली। कंगाली और कर्ज के दलदल में फंसे पाकिस्तान से इस वक्त की सबसे बड़ी आर्थिक और राजनीतिक खबर सामने आ रही है. शहबाज शरीफ सरकार का जो केंद्रीय बजट आज यानी 5 जून को संसद में पेश होने वाला था, उसे अचानक टाल दिया गया है. ‘रॉयटर्स’ और ‘डॉन’ की रिपोर्ट के मुताबिक, अब पाकिस्तान का यह संघीय बजट 5 जून के बजाय आगामी 10 जून 2026 को पेश किया जाएगा.
इस स्थगन ने अंतरराष्ट्रीय मंच पर पाकिस्तान की साख को एक बार फिर बड़ा झटका दिया है. सवाल उठ रहे हैं कि आखिर ऐन वक्त पर ऐसा क्या हुआ कि सरकार को बजट की तारीख आगे बढ़ानी पड़ी? कूटनीतिक सूत्रों की मानें तो इसके पीछे अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) की सख्त शर्तें, पाकिस्तानी सेना (GHQ) की बेतहाशा मांगें और आंतरिक बगावत का एक ऐसा त्रिकोण है, जिसने शहबाज सरकार के हाथ-पांव फुला दिए हैं.
क्यों फंसा पेंच?
- IMF का ‘डंडा’ और वित्तीय कड़ा रुख (IMF pressure on Pakistan): पाकिस्तान इस समय IMF के 7 अरब डॉलर के बेलआउट (राहत) पैकेज पर सांसें ले रहा है. IMF ने साफ अल्टीमेटम दिया है कि यदि पाकिस्तान को अगली किस्त चाहिए, तो उसे वित्तीय अनुशासन दिखाना होगा और टैक्स बढ़ाने होंगे. IMF की शर्तों और शहबाज सरकार के कुछ वित्तीय उपायों के बीच अभी तक सहमति नहीं बन पाई है.
- पाकिस्तानी सेना (Pakistan Military Spending) की भारी-भरकम मांग: एक तरफ देश के पास खाने के लाले हैं, वहीं दूसरी तरफ पाकिस्तानी सेना ने रक्षा बजट (Military Spending) में 20% से 25% की भारी बढ़ोतरी की मांग ठोक दी है. आईएमएफ घाटा कम करने का दबाव बना रहा है और सेना फंड मांग रही है; इस कशमकश में शहबाज शरीफ बीच में बुरी तरह फंस गए हैं.
- प्रांतों की बगावत (Pakistan Economic Crisis): केंद्र सरकार चाहती है कि देश के विभिन्न प्रांत संघीय खर्चों को उठाने के लिए अपने फंड का कुछ हिस्सा छोड़ें. लेकिन प्रांतीय सरकारें इसके लिए बिल्कुल तैयार नहीं हैं. संसाधनों के इस बंटवारे को लेकर केंद्र और प्रांतों के बीच घमासान मचा हुआ है.
डेडलॉक सुलझाने के लिए मिला बोनस
पाकिस्तान के डिप्टी प्राइम मिनिस्टर इशाक डार ने बजट की नई तारीख (10 जून) की पुष्टि की है. हालांकि, 5 जून का संसद सत्र अपने तय समय पर ही आयोजित किया जा रहा है ताकि इस गतिरोध और प्री-बजट मसौदों पर पक्ष-विपक्ष के बीच चर्चा हो सके. यह 5 दिन की देरी नागरिक प्रशासन (शहबाज सरकार) को सेना, आईएमएफ और अपने गठबंधन सहयोगियों के साथ बातचीत कर आंकड़ों को अंतिम रूप देने का एक आखिरी मौका देगी. लेकिन बड़ा सवाल यही है कि क्या कर्ज के सहारे चलने वाले देश का बजट पाकिस्तान की आवाम को कोई राहत दे पाएगा?










