नई दिल्ली: ऑपरेशन सिंदूर से लेकर पश्चिम एशिया तक भारत का ड्रोन युग शुरू हो चुका है। बीते साल पाकिस्तान के साथ भारत के संघर्ष और यूक्रेन और ईरान में हुए युद्धों ने ड्रोनों को आधुनिक युद्धकलापों के केंद्र में ला दिया है। अब भारतीय कंपनियां घरेलू ऑर्डर और पश्चिम एशिया और उत्तर अटलांटिक संधि संगठन (NATO) यानी नाटो के बाजारों से बढ़ती मांग को पूरा करने के लिए प्रयासरत हैं। इस स्वदेशी कदम से अब तक अमेरिका-इजरायल, चीन और तुर्की के सैन्य ड्रोन पर निर्भर रहने वाले भारत ने पूरी दुनिया में अपने सैन्य ड्रोन को उड़ाने की तैयारी कर ली हे। भारत अब पूरी तरह से स्वदेशी शेषनाग-150, आरवी माया-300 और स्टार्क जैसे ड्रोन विकसित कर रहा है।
भारत के बनाए शेषनाम ने रख दिया बड़ा कदम
भारत के बनाए ‘शेषनाग-150’ ने फरवरी में रियाद में आयोजित विश्व रक्षा प्रदर्शनी में अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपनी शुरुआत की। बेंगलुरु स्थित स्टार्टअप न्यूस्पेस रिसर्च एंड टेक्नोलॉजीज की ओर से विकसित यह शेषनाम भारतीय लड़ाकू ड्रोनों की एक नई पीढ़ी का प्रतिनिधित्व करता है। इसेसे न केवल निगरानी के लिए बल्कि लंबी दूरी के युद्ध के लिए भी डिजाइन किया गया है।
शेषनाग की खूबियां क्या हैं
- शेषनाग-150 आसमान में मंडराते हुए उड़ता है।
- इसकी रफ्तार 290-322 किमी प्रति घंटे की है।
- यह 1,000 किमी से अधिक की दूरी तय कर सकता है।
- पांच घंटे से अधिक समय तक खुफिया जानकारी जुटाते हुए मंडरा सकता है।
- यह 25-40 किलोग्राम के वारहेड से दुश्मन के इलाके में गहराई तक हमला कर सकता है।
स्वदेशी तकनीक को बढ़ावा
भारतीय सेना की मांग में भी तेजी से बदलाव आ रहा है। कंपनियों का कहना है कि सशस्त्र बलों को अब केवल निगरानी ड्रोन ही नहीं चाहिए, बल्कि बड़ी संख्या में, लंबी दूरी तक मार करने वाले और विशिष्ट मिशनों के लिए बने ड्रोन चाहिए।
बेंगलुरु स्थित नेक्स्टलीप एयरोनॉटिक्स के सीईओ एल्विन एंथोनी का कहना है कि ऑपरेशन सिंदूर के बाद आवश्यकताओं में काफी बदलाव आया है। उन्होंने कहा-लंबी उड़ान क्षमता और लंबी दूरी तक मार करने वाले ड्रोनों में रुचि बढ़ रही है। पहले हम 10-15 किलोमीटर तक की मारक क्षमता वाले ड्रोनों की बात करते थे, लेकिन अब अपेक्षा इससे भी अधिक मारक क्षमता वाले ड्रोनों की है। उनका कहना है कि वायु सेना को अब कम से कम 200 किलोमीटर की मारक क्षमता वाले ड्रोन चाहिए।
मिलिट्री ड्रोन के मामले में भारत बना आत्मनिर्भर
रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन (DRDO) के पूर्व अध्यक्ष जी सतीश रेड्डी कहते हैं-‘कुल मिलाकर रक्षा ड्रोन क्षेत्र आत्मनिर्भर हो गया है क्योंकि यह चीनी कलपुर्जों या सप्लाई-चेन पर निर्भर हुए बिना पूरी तरह से कार्य करने में सक्षम है।’ फिर भी इजरायली ऑप्टिक्स, सेंसर और युद्ध में सिद्ध प्रणालियों पर निर्भरता को लेकर कुछ चिंताएं बनी हुई हैं।
आइडियाफोर्ज के विशाल सक्सेना कहते हैं-उनके ड्रोन युद्ध में सिद्ध हो चुके हैं, इसलिए उन्हें ही ऑर्डर मिल रहे हैं। हमारी कुछ तकनीक अभी भी इजरायल जैसे देशों से आती है, जो युद्ध में उलझा हुआ है। इसलिए अगले दो वर्षों तक भारत को आपूर्ति करने की स्थिति में नहीं हो सकता है।
ऑपरेशन सिंदूर के बाद ड्रोन में काफी कुछ बदला
ऑपरेशन सिंदूर के महज एक साल बाद भारत के रक्षा ड्रोन उद्योग ने अपनी क्षमताओं का तेजी से विस्तार किया है। नैनो इंडोर स्काउट्स और आईएसआर (खुफिया, निगरानी और टोही) क्वाडकॉप्टर्स से लेकर लोइटरिंग मुनिशन्स, स्वार्म ड्रोन, इंटरसेप्टर ड्रोन और माइक्रो-टर्बोजेट सिस्टम तक भारतीय कंपनियां अब आधुनिक युद्ध की लगभग हर श्रेणी के सैन्य ड्रोन की मांग को पूरा कर रही हैं।










