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महिला अपराध में ‘सजा की गारंटी’ वाला राज्य कैसे बना यूपी?

by National Agenda
May 12, 2026
in Uttar Pradesh
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UP police
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लखनऊ : उत्तर प्रदेश में महिला अपराधों के मामलों में तेज जांच और मजबूत पैरवी का एक बड़ा उदाहरण फीरोजाबाद का वह मामला है, जिसमें 10 वर्षीय बच्ची से रेप के प्रयास और हत्या के आरोपी को महज 22 कार्यदिवसों में उम्रकैद की सजा सुनाई गई.

यह मामला ‘ऑपरेशन कन्विक्शन’ के तहत यूपी पुलिस और अभियोजन विभाग (प्रॉसिक्यूशन डिपार्टमेंट) की तेज कार्रवाई का उदाहरण बनकर सामने आया था. 27 अगस्त 2025 को बच्ची लापता हुई थी और कुछ घंटों बाद उसका शव खेत में मिला. पुलिस ने तुरंत FIR दर्ज कर पांच विशेष टीमें गठित कीं.

शुरुआती दौर में मामला ब्लाइंड मर्डर था लेकिन 72 घंटे के भीतर आरोपी की पहचान कर उसे गिरफ्तार कर लिया गया. पुलिस ने घटना के सिर्फ आठ दिनों के भीतर अदालत में चार्जशीट दाखिल कर दी. अभियोजन पक्ष ने नौ महत्वपूर्ण गवाहों और वैज्ञानिक साक्ष्यों के आधार पर अदालत में मजबूत पैरवी की. फास्ट ट्रैक POCSO कोर्ट ने सुनवाई पूरी करते हुए आरोपी को उम्रकैद और 62 हजार रुपए जुर्माने की सजा सुनाई.

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यह सिर्फ एक मामला नहीं बल्कि उस बड़े बदलाव की झलक है जिसकी पुष्टि अब राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो यानी NCRB की 2024 की रिपोर्ट भी कर रही है. महिलाओं के खिलाफ अपराधों में दोषसिद्धि दर के मामले में उत्तर प्रदेश ने देश के बड़े राज्यों में पहला स्थान हासिल किया है. 76.6 प्रतिशत की दोषसिद्धि दर के साथ यूपी ने न केवल महाराष्ट्र, कर्नाटक, तेलंगाना, तमिलनाडु और राजस्थान जैसे राज्यों को पीछे छोड़ा है बल्कि यह संदेश भी दिया है कि राजनीतिक इच्छाशक्ति और प्रशासनिक दृढ़ता के साथ कानून-व्यवस्था की तस्वीर बदली जा सकती है.

आंकड़ों में दिखती नई तस्वीर

NCRB के अनुसार, उत्तर प्रदेश में महिलाओं के खिलाफ अपराधों के 3,52,664 मामले ट्रायल के लिए लंबित थे. इनमें अदालतों ने 27,639 मामलों में सुनवाई पूरी की और 21,169 आरोपियों को दोषी ठहराया. यह संख्या देश में सबसे अधिक है. कुल 27,743 मामलों का निस्तारण हुआ.

सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि यूपी ने यह उपलब्धि ऐसे समय हासिल की है जब राज्य की आबादी देश में सबसे अधिक है और अपराध मामलों का दबाव भी अन्य राज्यों की तुलना में कहीं ज्यादा है. इसके बावजूद दोषसिद्धि दर में इतनी बड़ी बढ़ोतरी इस ओर इशारा करती है कि सिर्फ पुलिसिंग ही नहीं, बल्कि जांच, अभियोजन और न्यायिक प्रक्रिया के बीच समन्वय भी मजबूत हुआ है. महाराष्ट्र की दोषसिद्धि दर जहां 8.7 प्रतिशत रही, वहीं कर्नाटक 4.8 प्रतिशत और तेलंगाना 14.8 प्रतिशत पर सिमट गया. मध्य प्रदेश और राजस्थान जैसे राज्यों की स्थिति भी यूपी से काफी पीछे रही. ऐसे में यह सवाल स्वाभाविक है कि आखिर यूपी ने ऐसा क्या किया जो बाकी राज्य नहीं कर सके.

वर्ष 2017 में सत्ता संभालने के बाद मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने कानून-व्यवस्था को अपनी सरकार की सबसे बड़ी प्राथमिकताओं में रखा. महिलाओं की सुरक्षा को लेकर ‘जीरो टॉलरेंस’ नीति सिर्फ राजनीतिक नारा नहीं रही, बल्कि इसे प्रशासनिक ढांचे में उतारा गया. एंटी-रोमियो स्क्वॉड की शुरुआत इसी सोच का हिस्सा थी. शुरुआती दिनों में इस पर सवाल भी उठे, लेकिन सरकार ने इसे सार्वजनिक स्थानों पर महिलाओं की सुरक्षा से जोड़ा.

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इसके साथ ही महिला हेल्पलाइन, मिशन शक्ति अभियान, पिंक बूथ, महिला बीट पुलिसिंग और फास्ट ट्रैक अदालतों के विस्तार जैसे कदम उठाए गए. हाइकोर्ट के युवा एडवोकेट और आपराधिक मामलों के विशेषज्ञ अभि‍नव सिंह बताते हैं, “असली बदलाव पुलिस कार्रवाई से ज्यादा अभियोजन प्रणाली में आया. पहले बड़ी संख्या में मामले अदालत तक पहुंचने से पहले ही कमजोर पड़ जाते थे. जांच में तकनीकी खामियां, गवाहों का मुकरना और अभियोजन पक्ष की तैयारी कमजोर होना आम समस्या थी. यूपी सरकार ने इसी हिस्से पर सबसे ज्यादा फोकस किया.”

टेक्नोलॉजी बनी सबसे बड़ा हथियार

उत्तर प्रदेश अभियोजन विभाग ने पिछले कुछ वर्षों में तकनीक आधारित जिस मॉडल को विकसित किया, उसने पूरे सिस्टम की कार्यशैली बदल दी. वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग, ई-अभियोजन पोर्टल, ई-ऑफिस सिस्टम, डेटा एनालिटिक्स और माफिया मॉनिटरिंग ऐप जैसी व्यवस्थाओं ने मामलों की निगरानी और पैरवी दोनों को मजबूत किया. अधिकारियों के मुताबिक, 2025 तक 5000 से अधिक पुलिस अधिकारियों और सरकारी गवाहों के बयान वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए रिकॉर्ड किए जा चुके थे. इससे न केवल समय की बचत हुई, बल्कि गवाहों की सुरक्षा भी बढ़ी. कई मामलों में गवाहों को अदालत आने-जाने के दौरान धमकियों का सामना करना पड़ता था. अब वे अपने जिले या कार्यालय से ही बयान दर्ज करा पा रहे हैं.

सरकार का दावा है कि इस व्यवस्था से अब तक 10 करोड़ रुपए से अधिक की बचत हुई है. लेकिन इससे भी बड़ी बात यह रही कि मामलों की सुनवाई में तेजी आई. अभियोजन विभाग अब डिजिटल रिकॉर्डिंग और डेटा ट्रैकिंग के जरिए हर केस की प्रगति पर नजर रखता है.

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उत्तर प्रदेश लंबे समय से ई-अभियोजन पोर्टल पर डेटा फीडिंग में देश में पहले स्थान पर बना हुआ है. 75 लाख से अधिक न्यायिक कार्यवाहियों का डेटा इस पोर्टल पर अपलोड किया जा चुका है. इसका सबसे बड़ा फायदा यह हुआ कि हर केस की डिजिटल प्रोफाइल तैयार होने लगी. किस मामले में चार्जशीट दाखिल हुई, कौन-सा गवाह पेश हुआ, अगली तारीख कब है, किस स्तर पर देरी हो रही है, इसकी निगरानी अब रियल टाइम में संभव हो सकी. यह डेटा सीधे मुख्यमंत्री डैशबोर्ड ‘दर्पण 2.0’ से भी जुड़ा है. यानी उच्च स्तर पर समीक्षा संभव हो गई. पहले जिन मामलों में वर्षों तक फाइलें धूल खाती रहती थीं, अब उन पर लगातार निगरानी हो रही है.

मजबूत पैरवी ने बदली तस्वीर

सरकार के मुताबिक, अब तक एक लाख से अधिक अपराधियों को प्रभावी पैरवी के जरिए सजा दिलाई जा चुकी है. इनमे महिलाओं के खिलाफ अपराधों के आरोपी भी बड़ी संख्या में शामिल हैं. दरअसल, किसी भी आपराधिक मामले में दोषसिद्धि सिर्फ पुलिस गिरफ्तारी से नहीं होती. अदालत में सबूतों की मजबूती और कानूनी तैयारी सबसे अहम होती है. यूपी अभियोजन विभाग ने इसी कड़ी को व्यवस्थित करने के लिए व्यापक कानूनी ढांचा तैयार किया.

महिला अपराधों, POCSO, SC/ST अत्याचार, साइबर अपराध और जघन्य अपराधों के मामलों में जांच अधिकारियों को स्पष्ट दिशानिर्देश दिए गए कि किस तरह के सबूत जुटाने हैं, किन कानूनी धाराओं का प्रयोग करना है और अदालत में किन बिंदुओं पर विशेष जोर देना है. उदाहरण के तौर पर, इलेक्ट्रॉनिक सबूतों को सुरक्षित रखने पर खास ध्यान दिया गया. सोशल मीडिया चैट, कॉल रिकॉर्ड, स्क्रीनशॉट और डिजिटल ट्रांजैक्शन को अब केस डायरी का महत्वपूर्ण हिस्सा बनाया जा रहा है. पहले तकनीकी कमियों के कारण ऐसे सबूत अदालत में कमजोर पड़ जाते थे.

महिलाओं और बच्चों से जुड़े मामलों में सिर्फ सख्ती ही काफी नहीं होती. पीड़ित के साथ संवेदनशील व्यवहार भी जरूरी है. इसी वजह से अभियोजन ढांचे में विशेष दस्तावेजीकरण प्रोटोकॉल बनाए गए. नाबालिग पीड़ितों, SC/ST समुदाय की महिलाओं और दिव्यांग पीड़ितों से जुड़े मामलों में अलग दिशानिर्देश लागू किए गए. कोशिश यह रही कि पीड़िता को बार-बार बयान न देना पड़े और उसकी पहचान सुरक्षित रहे. इसके साथ ही आरोपी और उससे जुड़े संगठनों की वित्तीय जांच भी कई मामलों में अनिवार्य की गई. खासकर ऐसे मामलों में जहां संगठित नेटवर्क, मानव तस्करी या जबरन धर्मांतरण जैसे आरोप शामिल हों.

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फास्ट ट्रैक अदालतों का असर महिला अपराधों में सबसे बड़ी समस्या न्याय मिलने में देरी रही है. वर्षों तक लंबित रहने वाले मामलों में गवाह कमजोर पड़ जाते हैं और पीड़िता मानसिक रूप से टूट जाती है. यूपी सरकार ने फास्ट ट्रैक विशेष अदालतों के जरिए इस चुनौती से निपटने की कोशिश की. हालांकि लंबित मामलों की संख्या अभी भी बहुत अधिक है और NCRB के आंकड़ों के अनुसार लंबित दर 92.1 प्रतिशत है, लेकिन विशेषज्ञ मानते हैं कि दोषसिद्धि दर का बढ़ना इस बात का संकेत है कि निपटाए गए मामलों में जांच और पैरवी की गुणवत्ता बेहतर हुई है. यानी अब अदालत तक पहुंचने वाले मामलों में अभियोजन पक्ष ज्यादा तैयार होकर जा रहा है.

हालांकि आलोचक यह भी कहते हैं कि सिर्फ दोषसिद्धि दर से महिलाओं की सुरक्षा का पूरा आकलन नहीं किया जा सकता. अपराध दर्ज होने की संख्या, पीड़ित सहायता तंत्र और सामाजिक जागरूकता जैसे पहलुओं को भी साथ देखना होगा.

Tags: NCRBUP Policeउत्तर प्रदेशऑपरेशन कन्विक्शनमहिला अपराधयूपी पुलिस
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