नई दिल्ली। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के विदेश दौरों ने जितनी भारत में सुर्खियां बटोरी हैं, उससे कम ग्लोबल हेडलाइन में नहीं रही हैं. जो अमेरिका कभी प्रधानमंत्री मोदी की नीतियों को लेकर काफी कुछ लिखता था, अब उसने पीएम मोदी की इसी कूटनीति की तारीफों में कसीदे पढ़ने शुरू कर दिए हैं. अमेरिका के प्रमुख अखबार न्यूयॉर्क टाइम्स में छपे एक आर्टिकल में वैश्विक अनिश्चितताओं और बदलते ग्लोबल समीकरणों के बीच पिछले एक साल में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने दुनिया भर के देशों में हुए दौरों का विश्लेषण किया गया है.
रिपोर्ट में लिखा गया है कि अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की ओर से भारत पर भारी भरकम टैरिफ लगाए जाने और रूसी तेल खरीद को लेकर सजा दिए जाने के बाद से भारत की विदेश नीति में एक बड़ा बदलाव आया है. अमेरिका के साथ रिश्तों में आई खटास और ईरान युद्ध की वजह से ऊर्जा सुरक्षा पर मंडराते संकट ने भारत की कूटनीति को अलग आयाम दिया है. भारत ने अपनी अर्थव्यवस्था को मजबूत करने और वैश्विक झटकों से बचाने के लिए प्लुरिलेटरल यानी बहुपक्षीय और लक्षित कूटनीति का रास्ता चुना है. अब वो किसी एक देश पर निर्भर नहीं है बल्कि अलग-अलग देशों से व्यापारिक संबंध बढ़ा रहा है.
प्रधानमंत्री के विदेश दौरों की हकीकत क्या?
अगस्त 2025 से लेकर अब तक पीएम मोदी ने कम से कम 20 देशों की आधिकारिक यात्राएं की हैं. ये दौरे एकतरफा नहीं रहे हैं, 13 देशों के शीर्ष नेता खुद भारत आ चुके हैं. दिलचस्प ये है कि ये यात्राएं पारंपरिक मेल-मिलाप से हटकर पूरी तरह व्यावहारिक और व्यापारिक वार्ताओं पर केंद्रित रही हैं, जहां दोनों पक्ष ठोस समझौतों पर मुहर लगा रहे हैं. पीएम का उज्बेकिस्तान और किर्गिस्तान का हालिया दौरा इसी रणनीति का हिस्सा है. SCO शिखर सम्मेलन के दौरान क्षेत्रीय सुरक्षा और रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन के साथ ऊर्जा-रणनीतिक साझेदारी पर चर्चा होगी.
इन यात्राओं के जरिए भारत ने कई बड़े कूटनीतिक और आर्थिक लाभ हासिल किए हैं. जर्मनी से पनडुब्बी तकनीक, फ्रांस से एआई, सुशासन और छात्रों के लिए वीजा समझौते, तथा यूनाइटेड किंगडम से लोकप्रिय स्कॉच व्हिस्की पर सस्ते आयात शुल्क जैसे कई अहम सौदे हुए हैं.
इसके अलावा, यूरोपीय संघ (EU) के साथ एक ऐतिहासिक मुक्त व्यापार समझौते (FTA) पर भी हस्ताक्षर किए गए हैं, जिसे यूरोपीय आयोग की अध्यक्ष उर्सुला वॉन डेर लेयन ने यानि मदर ऑफ ऑल डील्स करार दिया है. दो दशक से अटके इस व्यापार समझौते के तहत भारत ने यूरोपीय कारों और वाइन पर अपने टैरिफ में कटौती करने जैसे बड़े आर्थिक रियायतें दी हैं, जो देश की पुरानी कंजरवेटिव पॉलिसी से काफी अलग है.
भारत की इस नई कूटनीति के केंद्र में कुछ चुनिंदा प्राथमिकताएं हैं- रक्षा तकनीक, क्षेत्रीय सुरक्षा, ऊर्जा आयात, क्रिटिकल मिनरल्स, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, और युवाओं के लिए विदेशों में पढ़ाई व रोजगार के अवसर. नॉर्वे के साथ रोजगार सृजन समझौता और दक्षिण कोरिया के साथ जहाज निर्माण में सहयोग बढ़ाने के वादे इसी दिशा में उठाए गए कदम हैं.
भारत का लक्ष्य 2047 तक दुनिया के टॉप 5 शिप बिल्डर्स में शामिल होना है. इसके अलावा न्यूजीलैंड के साथ 40 सालों में किसी भारतीय प्रधानमंत्री की पहली यात्रा के दौरान समुद्री सुरक्षा और द्विपक्षीय व्यापार को दोगुना करने पर जोर दिया गया.
रिपोर्ट ये भी कहती है कि इस नीति को लेकर एक्सपर्ट मानते हैं कि अमेरिका के साथ भारत के रिश्ते इस वक्त अस्थिरता की स्थिति में हैं. चैथम हाउस के दक्षिण एशिया एक्सपर्ट चीतिग्ज बाजपेयी के मुताबिक जी-7 सम्मेलन के दौरान मोदी और ट्रंप की हालिया मुलाकात औपचारिक रही और इसमें रणनीतिक गहराई का अभाव था. अमेरिका पर अत्यधिक निर्भरता कम करने के लिए, भारत अब फ्रांस, जापान, कनाडा जैसे मीडियम पावर और ग्लोबर पावर्स के बीच एक संतुलन साधने की पुरानी नीति पर लौट आया है.
पीएम मोदी की इस इकोनॉमिक डिप्लोमेसी को केवल सरकारी समझौतों तक नहीं देखा जा सकता है. ये भारत को दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती बड़ी अर्थव्यवस्था के रूप में स्थापित करने की सोची-समझी प्लानिंग है. फ्रांस के साथ एआई पर काम करना हो या इटली की प्रधानमंत्री जॉर्जिया मेलानी के साथ दोस्ताना अंदाज को दिखाकर निवेशकों को आकर्षित करना हो, भारत हरसंभव तरीके से अपने रणनीतिक और आर्थिक हितों को साध रहा है.
दुनिया के बदलते दबावों के बीच भारत अब अपने पारंपरिक संरक्षणवाद से बाहर आकर आक्रामक, सधे हुए और ग्लोबल पार्टनरशिप वाले भविष्य की ओर कदम बढ़ा चुका है. दिलचस्प ये है कि भारत की इस शुरुआत के पीछे अमेरिकी राष्ट्रपति की भारत पर दबाव डालने की नीति थी, जिसने उसे एक नया रास्ता दिया.












