नई दिल्ली। 12-13 सितंबर को होने वाले BRICS शिखर सम्मेलन को लेकर तैयारियां जोरों पर हैं और दुनिया की महाशक्तियां इसमें शरीक होने वाली हैं. भारत के लिए यह बेहद अहम है कि वह अपने एजेंडे को आगे रखते हुए काम करे और चीन की युआन वाली चाल से सावधान रहे.
इस बीच, पूर्व सीनियर डिप्लोमैट्स ने इस इवेंट की ऐतिहासिक अहमियत पर जोर देते हुए 10 सदस्यों वाले इस बड़े ग्रुप के सामने आने वाली जियोपॉलिटिकल चुनौतियों और रणनीतिक मौकों के बारे में बताया है.
ANI से बातचीत में पूर्व सीनियर डिप्लोमैट महेश सचदेव ने कहा कि ग्रुप के अस्तित्व के दो दशक पूरे होना एक अहम मोड़ है. सचदेव ने कहा, ‘ऐतिहासिक रूप से, ब्रिक्स की स्थापना 2006 में BRIC के तौर पर हुई थी और इस साल यह 20 साल पूरे कर रहा है. दो दशकों में इसकी प्रगति मिली-जुली रही है. उम्मीद है कि 21 साल की उम्र यानी ‘एडल्टहुड’ तक पहुंचने पर यह ग्रुप कुछ ज्यादा ठोस और प्रोडक्टिव काम करेगा.’ उन्होंने कहा, ‘ब्रिक्स समिट का एक बहुत अहम हिस्सा ब्रिक्स और पश्चिमी देशों के बीच भारत की पुल वाली भूमिका होगी.’
‘एक ग्लोबल पावर ना ले ले दूसरे की जगह’
हालांकि सचदेव ने आगे चेतावनी दी कि ग्लोबल ऑर्डर में सुधार की कोशिशों का नतीजा यह नहीं होना चाहिए कि एक ताकतवर ग्लोबल पावर की जगह दूसरी ताकतवर पावर ले ले, खासकर ग्लोबल ट्रेड और फाइनेंशियल सिस्टम के मामले में. सचदेव का इशारा अमेरिका और चीन की ओर था.
सचदेव ने कहा, ‘दुनिया अमेरिका की ओर से अपने प्रभुत्व को फिर से थोपने की कोशिशों से थक चुकी है और मल्टीपोलैरिटी (बहु-ध्रुवीयता) चाहती है, वह अमेरिका की जगह चीन को नहीं लाएगी. अभी ब्रिक्स की कुल GDP का दो-तिहाई हिस्सा चीन का है और इस समय हो रहे ज्यादातर फाइनेंशियल इनोवेशन में चीन की छाप है. इससे एक तरह का खतरा पैदा होता है कि हम एक हेजेमोन (प्रभुत्वशाली ताकत) की जगह दूसरे हेजेमोन को ले आएंगे.’ उन्होंने आगे कहा, ‘अगर हम डी-डॉलरलाइजेशन करते हैं, लेकिन फिर युआन को उसी जगह पर ले आते हैं, तो मुख्य ढांचा फिर भी किसी एक देश के हितों से ही चलेगा.’
‘हर देश देख रहा अपना फायदा’
वेस्ट एशिया और रूस-यूक्रेन में बढ़ते युद्ध के बीच ब्रिक्स और पश्चिमी देशों के बीच डिप्लोमैटिक पुल के तौर पर भारत की खास स्थिति पर सचदेव ने कहा, ‘कॉन्फ्रेंस में इसका अपना असर हो सकता है. रूस चाहेगा कि यूक्रेन युद्ध पर उसके रुख का समर्थन किया जाए. ईरान चाहेगा कि खास तौर पर होर्मुज स्ट्रेट पर उसके विवाद और अमेरिका-इजरायल के साथ जंग के मामले में उसे समर्थन मिले.’
इसके अलावा, अलग-अलग सदस्य देशों के बीच आम सहमति बनाने की चुनौती पर बात करते हुए, पूर्व सीनियर डिप्लोमैट सुरेंद्र कुमार ने कहा कि भारत को इस समिट को ऐसे मुद्दों की ओर ले जाना चाहिए, जिनसे असल में आर्थिक विकास, टेक्नोलॉजी शेयरिंग और तरक्की हो, न कि ऐसे राजनीतिक झगड़ों में उलझना चाहिए जिनका कोई हल नहीं है.
भारत को क्या रवैया अपनाना होगा?
कुमार ने कहा, ‘भारत इसे राजनीतिक मुद्दों में उलझने के बजाय ज्यादा आर्थिक एजेंडे, ज्यादा सहयोग, ज्यादा टेक्नोलॉजी शेयरिंग और उन चीजों की ओर ले जाने की कोशिश कर रहा है जो लोगों के लिए सच में मायने रखती हैं. राजनीतिक मुद्दों पर एकता नहीं हो सकती,मुझे लगता है कि भारत का लचीलेपन, इनोवेशन, सस्टेनेबिलिटी और सहयोग पर जोर देना आगे बढ़ने का बहुत सही तरीका है, और इन क्षेत्रों में काफी सहयोग हो सकता है.’
कुमार ने ग्रुप की बड़ी आर्थिक ताकत और साथ ही उसके अंदरूनी राजनीतिक मतभेदों की ओर भी इशारा किया और सदस्यों से कहा कि वे असल सफलता पाने के लिए डिजिटल पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर (DPI) जैसे ठोस कदमों पर फोकस करें
कुमार ने आगे कहा, ‘अब BRICS की सबसे बड़ी ताकत को देखें तो इसमें दुनिया की लगभग आधी आबादी, 40% व्यापार और PPP के आधार पर 40% GDP शामिल है. इस हिसाब से यह G7 से भी बड़ा है. लेकिन सच यह भी है कि यह एक ऐसा संगठन है जिसमें बहुत सारे मतभेद हैं.’
कैसे BRICS को आगे ले जा सकता है भारत?
उन्होंने कहा, ‘भारत डिजिटल पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर की पेशकश कर रहा है.हमने 20 देशों के साथ MoU साइन किए हैं, जिनमें से 12 में UPI काम कर रहा है. हम बहुत कुछ कर सकते हैं जैसे ट्रेड, वित्तीय सहयोग बढ़ाना, MSME को मजबूत और WTO का समर्थन करना. ऐसे कई व्यावहारिक क्षेत्र हैं, जिनकी ओर भारत इस ग्रुप को ले जा सकता है ताकि असल सफलता मिल सके.’
उन्होंने आगे कहा कि जब सदस्य देश सीधे तौर पर संघर्ष में शामिल हों या उससे प्रभावित हों, तो राजनीतिक एकता मुश्किल होती है, लेकिन भारत को व्यावहारिक आर्थिक एजेंडे को आगे बढ़ाते हुए अपनी नैतिक स्पष्टता बनाए रखनी चाहिए.
कुमार ने कहा, ‘हम ऐसे समय में भी हैं, जब दुनिया बंटी हुई है. यूक्रेन बनाम रूस, सप्लाई चेन में बहुत ज्यादा रुकावटें और कई तरह के संकट हैं. भारत इसे राजनीतिक मुद्दों में उलझने के बजाय ज्यादा आर्थिक एजेंडे-ज्यादा सहयोग, ज्यादा टेक्नोलॉजी शेयरिंग और उन चीजों की ओर ले जाने की कोशिश कर रहा है जो लोगों के लिए सच में मायने रखती हैं. राजनीतिक मुद्दों पर एकता नहीं हो सकती.’












