नई दिल्ली। झारखंड में धर्मांतरण की वजह से डेमोग्राफी तेजी से बदल रही है, खासकर सीमावर्ती इलाकों में। पूर्व सीएम चंपई सोरेन ने जनजातीय क्षेत्रों में ईसाइयत के फैलने और जनजातियों की संस्कृति, जीवन शैली नष्ट होने को लेकर चिंता जताई है। इसके बाद एक बार फिर जनजातीय परंपरा और उसपर ईसाई मिशनरी और घुसपैठियों के बढ़ते प्रभाव पर बहस हो रही है।
चंपई सोरेन का कहना है कि अगर सरकार ने जनजातियों के लिए आरक्षण जैसी सुविधाएँ दी हैं, तो ईसाई बनने वाले इसका लाभ कैसे उठा सकते हैं, क्योंकि धर्मांतरण के बाद ही वे अल्पसंख्यक बन जाते हैं। अल्पसंख्यकों के लिए अलग व्यवस्था और सुविधाएँ संविधान और सरकार ने दे रखी है। यही बात इस्लाम कबूलने वालों के साथ भी लागू है।
चंपई सोरेन ने अपनी बात को ऐतिहासिक और सामाजिक संदर्भ देते हुए समझाया कि झारखंड में हजारों सालों से प्रकृति पूजक जनजातियों और सनातनियों के बीच एक बेहद गहरा, आत्मीय और सह-अस्तित्व का संबंध रहा है। दोनों समुदाय सदियों से एक ही गाँव, एक ही परिवेश में भाईचारे के साथ रहते आए हैं। उनके बीच कभी भी धर्म या पूजा पद्धति को लेकर कोई दीवार खड़ी नहीं हुई। सनातन धर्म ने कभी भी जनजातियों की पहचान को मिटाने की कोशिश नहीं की।
यही वजह है कि जनजातियों की मूल संस्कृति, पूजा पद्धति और बाकी खासियत बनी रही। अगर सनातनियों ने धर्मांतरण कराया होता तो जनजातीय समुदाय की संस्कृति कब का नष्ट हो जाती। इसी वजह से जनजातीय समाज को कभी भी हिंदू मंदिरों या सनातन परंपराओं से कोई आपत्ति या असुरक्षा की भावना नहीं हुई।
इस रिश्ते की खूबसूरती यह है कि सनातनी समाज के लोग जनजातीय लोगों के पवित्र स्थलों जैसे जाहेरस्थान, सरना स्थल, देशाउली और मांझी थान पर पूरी श्रद्धा और आस्था के साथ जाते हैं और वहाँ के रीति-रिवाजों का सम्मान करते हैं। इसी तरह रांची के पास स्थित प्रसिद्ध दिउड़ी मंदिर और रंकिणी मंदिर जैसे अनगिनत ऐतिहासिक धार्मिक स्थल इसके प्रत्यक्ष प्रमाण हैं।
इन मंदिरों में जनजातीय समाज के लोग न केवल सिर झुकाते हैं, बल्कि सबसे बड़ी बात यह है कि इन मंदिरों के मुख्य पुजारी भी स्वयं जनजातीय समुदाय यानी आदिवासी पाहन या मुंडा से ही आते हैं। दोनों समुदाय एक-दूसरे के पर्व-त्योहारों में खुलकर शामिल होते हैं। जब आदिवासी भाई करमा या सरहुल मनाते हैं, तो सनातनी समाज उनके साथ झूमता है और जब सनातनी कोई उत्सव मनाते हैं, तो जनजातीय समाज उसका सहर्ष हिस्सा बनता है।
जनजातीय समुदाय झारखंड में मात्र 26 फीसदी
झारखंड में डेमोग्राफी का संकट कोई काल्पनिक डर नहीं है, बल्कि सरकारी आँकड़े इस बात की गवाही दे रहे हैं कि राज्य में आदिवासियों का प्रतिशत लगातार घट रहा है, जबकि धर्मांतरित ईसाइयों और विशेषकर सीमावर्ती इलाकों में घुसपैठियों की आबादी अप्रत्याशित रूप से बढ़ रही है। साल 2011 की जनगणना के मुताबिक झारखंड में जनजातियों की कुल संख्या लगभग 86.45 लाख है, जो राज्य की कुल आबादी का करीब 26.2% है।
वहीं पूरे देश की बात की जाए तो जनजातीय समुदाय की कुल जनसंख्या मात्र 10.45 करोड़ के आसपास है, जो देश की कुल आबादी का लगभग 8.6% है। झारखंड में कुल 32 जनजातियाँ हैं, जिनमें संथाल उरांव, मुंडा , कोल, माहली, हो प्रमुख हैं। संथाल यहाँ की सबसे बड़ी जनजाति हैं। संथाल परगना में इनकी आबादी सर्वाधिक है।
आजादी के समय और उसके बाद के दशकों के आँकड़ों का तुलनात्मक अध्ययन करें, तो पता चलता है कि झारखंड के गठन के समय जनजातीय लोगों की आबादी का जो अनुपात था, वह अब घटकर मात्र 26 फीसदी के आसपास सिमट गया है। इसके विपरीत ईसाई और मुस्लिम आबादी के विकास की दर सामान्य से कहीं अधिक रही है। अगर धर्मांतरण और घुसपैठ की रफ्तार यही रही, तो आने वाले कुछ दशकों में जनजातीय समाज अपनी ही गृह-भूमि पर अल्पसंख्यक बन जाएगा।
धर्मांतरण करा कर नष्ट किया जा रहा जनजातीय जीवन शैली
जनजातीय लोगों की जन्म से लेकर विवाह और मृत्यु तक जीवनशैली खास तरह की होती है। जन्म, नामकरण, विवाह और दूसरे अहम पड़ावों पर सामाजिक प्रक्रियाएँ मांझी परगना, नायके, पाहन, मानकी, मुंडा, पड़हा राजा आदि पूरी करवाते हैं। इन मौकों पर जाहेरस्थान, सरना स्थल, देशाउली, मांझी थान जाकर मरांग बुरु, सिंगबोगा की पूजा की जाती है। हजारों सालों से ये चलता आ रहा है।
सनातन धर्म ने कभी भी इसमें हस्तक्षेप नहीं किया। अगर ऐसा होता तो जनजातीय परंपरा मिट चुकी होती। उनकी संस्कृति उजड़ गई होती। लेकिन 18वीं शताब्दी में आए मिशनरियों ने इसे काफी हद तक बदल दिया। धर्मांतरण की वजह से इन स्थानों पर जनजातीय आस्था कम हो गई है। गाँवों में नए-नए चर्च उग आए हैं। इसमें प्रार्थना होती है और भोले भाले जनजातीय लोगों को वहाँ बहला-फूसला कर धर्मांतरण कराया जाता है। आज जिस रफ्तार से इन क्षेत्रों में धर्मातरण कराया जा रहा है। अगर ये नहीं रुकी तो जनजातीय संस्कृति खत्म हो जाएगी।
हजारों सालों से जनजातीय- सनातन का रिश्ता आपसी मदद सहयोग और सह-अस्तित्व का रहा है। सनातनियों ने कभी भी लालच देकर या साजिश कर जनजातीय लोगों को धर्मांतरण के लिए मजबूर नहीं किया। ये खुद को जनजातीय नहीं बताते हैं और न ही आरक्षण समेत दूसरे सरकारी लाभ छीनने की कोशिश करते हैं। इनलोगों ने कभी भी जनजातीय अधिकार नहीं छीने। जल-जंगल-जमीन पर जनजातीय लोगों का ही वर्चस्व रहा।
मिशनरियों ने आस्था पर पहुँचाई चोट
ईसाई और जनजातीय संस्कृति में कोई समानता नहीं है। 1845 में मिशनरियों ने जनजातीय क्षेत्रों में ईसाइयत का प्रचार शुरू किया। इन 180 सालों में इनलोगों ने इनकी परंपरा और धार्मिक आस्था पर चोट किया। इनके अस्तित्व को मिटाने की कोशिश की। यही वजह है कि झारखंड के कई हिस्सों में जाहेरस्थानों और सरना स्थलों पर ताला लग गया है। वहाँ धर्मांतरण की वजह से कोई पूजा करने नहीं जाता। यहाँ की जीवनशैली, रीति रिवाज, भाषा, संस्कृति जनजातीय पहचान सबकुछ बदल गया है।
कई अफ्रीकी देशों और लैटिन अमेरिकी देशों और आइलैंड में जनजातीय समुदाय की परंपरा और संस्कृति पूरी तरह बदल गई है। चाहे केन्या की संबुरु जनजाति हो या ब्राजील की वाई-वाई जनजाति, अयोरओ जनजाति सब अपनी सभ्यता-संस्कृति भूल चुके हैं और ईसाइयत के रंग में रंग गए हैं। मिशनरी भारत में भी यही करना चाहते हैं। धर्मांतरण कर पूरी जीवन शैली बदलना चाहते हैं।
ईसाईयों को अल्पसंख्यक का दर्जा भारत के संविधान के अनुच्छेद 30 के तहत दिया गया है। उसके मुताबिक ये अपनी शिक्षण संस्थानों पर माइनॉरिटी संस्थान लिखते भी हैं। लेकिन जैसे ही फायदा लेने का वक्त आता है, ये खुद को जनजातीय कहने लगते हैं। जनजातीय आरक्षण का लाभ लेकर नौकरी खाते हैं। उनकी दूसरी सुविधाओं का सुख भोगते हैं।
सबसे बड़ी बात है कि जनजातीय आरक्षित सीटों पर चुनाव भी लड़ते हैं। इस पर रोक लगाना जरूरी है। अगर किसी ने अपनी इच्छा से धर्मांतरण किया है, तो उसके ये पता होना चाहिए कि वे अब जनजातीय सुविधाओं का लाभ नहीं उठा सकते। उनकी कटैगरी ‘अल्पसंख्यक’ की है।
चर्च और मस्जिदों के निर्माण के लिए जमीन कैसे मिली
धर्मांतरण समाज के अस्तित्व से जुड़ा एक सामाजिक मुद्दा है। इसका राजनीतिकरण नहीं किया जाना चाहिए। लेकिन हकीकत है कि वोटबैंक की राजनीति करने वाली पार्टियाँ इन्हें ऐसे ही चश्मे से देखती हैं और धर्मांतरण का विरोध नहीं करती। झारखंड का जनजातीय समुदाय बिरसा मुंडा, सिद्धू कान्हू, पोटो हो, वीर टाना भगग और वीर तेलंगा खड़िया जैसे महापुरुषों के दिखाए गए राह पर चलते हुए अगर अपनी पहचान नहीं बचा पाता है तो उसका अस्तित्व भी मिट जाएगा।
झारखंड में हजारों चर्च और मस्जिद बन गए हैं। जनजातीय समुदाय से जुड़ी सीएनटी-एसपीटी एक्ट के तहत जनजातीय लोगों की जमीन किसी को भी ट्रांसफर नहीं किया सकता। ऐसे में इनके गाँवों में चर्च और मस्जिद कैसे बन गए? आखिर इन्हें जमीन किसने दिए।
चंपई सोरेन का यह सवाल सीधे तौर पर शासन और प्रशासन को कटघरे में खड़ा करता है कि जब कानूनन जमीन का ट्रांसफर हो ही नहीं सकता, तो झारखंड के आदिवासी गाँवों में हजारों की संख्या में भव्य चर्च और विशाल मस्जिदें कैसे बन गईं? आखिर इन अल्पसंख्यक मजदही स्थलों के निर्माण के लिए जमीन किसने उपलब्ध कराई? यह विशुद्ध रूप से अल्पसंख्यक संस्थान हैं, जिनका आदिवासियों की मूल संस्कृति से कोई लेना-देना नहीं है। ऐसे में जनजातीय समुदाय की सुरक्षित जमीन इन संस्थाओं के पास कैसे स्थानांतरित हो गई?
चंपई सोरेन ने माँग की है कि इस पूरे भू-घोटाले और जमीनों के अवैध हस्तांतरण की एक उच्च स्तरीय, निष्पक्ष जाँच होनी चाहिए ताकि यह साफ हो सके कि इसके पीछे कौन सा बड़ा सिंडिकेट और प्रशासनिक मिलीभगत काम कर रही है।










