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चिप की दुनिया में भारत का बड़ा दांव, PM मोदी के संदेश की गूंज चीन-ताइवान तक

by National Agenda
September 17, 2026
in National
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PM Modi
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नई दिल्ली। प्रधानमंत्री ने आज ऐसा संदेश दिया कि उसकी गूंज चीन और ताइवान तक पहुंच गई भारत में सेमीकंडक्टर यानी चिप की दुनिया को लेकर आज बड़ा दिन है. नई दिल्ली में सेमीकॉन इंडिया नाम का बड़ा आयोजन शुरू हुआ जहां प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने चिप बनाने वाली दुनिया की बड़ी कंपनियों के सामने भारत की तैयारी को रखा. प्रधानमंत्री ने साफ कहा कि दुनिया को अब नई और भरोसेमंद जगहों की जरूरत है जहां चिप बनाई जा सके और भारत खुद को इसके लिए लगातार तैयार कर रहा है.

इसी मंच से अमेरिकी कंपनी अप्लाइड मैटेरियल्स ने भी बड़ा ऐलान किया. कंपनी अगले दस साल में भारत में 5 अरब डॉलर का निवेश करेगी. इस ऐलान के साथ भारत की सेमीकंडक्टर कहानी को एक और बड़ा बढ़ावा मिला है. इसका मतलब यह है कि भारत अब सिर्फ चिप का बड़ा बाजार बनने की कोशिश नहीं कर रहा बल्कि चिप बनाने वाली ग्लोबल सप्लाई चेन में भी अपनी जगह बनाने की तैयारी कर रहा है.

आखिर चिप को लेकर इतनी बड़ी तैयारी क्यों?

आज की दुनिया में कोई भी बड़ी इलेक्ट्रॉनिक चीज ऐसी नहीं है जिसमें चिप का इस्तेमाल न होता हो. मोबाइल फोन, कार, लैपटॉप, सैटेलाइट, इंटरनेट का सामान और अब आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस यानी AI से जुड़े सिस्टम इन सभी में चिप की जरूरत होती है.

AI के इस्तेमाल में जिस तेजी से बढ़ोतरी हो रही है उससे चिप की मांग भी तेजी से बढ़ रही है. यही वजह है कि सेमीकंडक्टर अब सिर्फ टेक्नोलॉजी इंडस्ट्री का हिस्सा नहीं रह गया है बल्कि दुनिया की अर्थव्यवस्था और सप्लाई चेन के लिए भी बेहद अहम बन गया है.

चीन और ताइवान की भूमिका क्या है?

सेमीकंडक्टर की दुनिया में चीन और ताइवान की भूमिका एक जैसी नहीं है. ताइवान खास तौर पर advanced chip manufacturing का बड़ा केंद्र है. ताइवान की कंपनियां दुनिया की सबसे आधुनिक चिप बनाने की क्षमता रखती हैं. इन चिप्स का इस्तेमाल AI, data centre और दूसरी अत्याधुनिक तकनीकों में होता है.

वहीं चीन की ताकत electronics और semiconductor supply chain के कई बड़े हिस्सों में है. चीन electronics manufacturing, assembly, packaging और कई तरह के semiconductor components का बड़ा केंद्र है. साथ ही चीन अपनी घरेलू chip manufacturing क्षमता भी तेजी से बढ़ा रहा है.

आसान भाषा में समझें तो advanced chips में ताइवान की बड़ी भूमिका है जबकि electronics और semiconductor supply chain के कई बड़े हिस्सों में चीन की मजबूत पकड़ है.

अमेरिका-चीन की टेक्नोलॉजी जंग ने बदला गणित

अमेरिका और चीन के बीच पिछले कुछ सालों में technology को लेकर तनाव बढ़ा है. अमेरिका ने चीन पर advanced chip technology और chip बनाने वाली machines को लेकर कई restrictions लगाई हैं. वहीं चीन भी अपनी domestic chip-making capacity बढ़ाने में जुटा है.

इस पूरी खींचतान ने दुनिया की कंपनियों के सामने एक बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है. अगर semiconductor supply chain कुछ चुनिंदा देशों और क्षेत्रों पर ज्यादा निर्भर रहेगी तो किसी भी संकट की स्थिति में पूरी electronics और technology industry प्रभावित हो सकती है.

यही वजह है कि कंपनियां अब अपनी supply chain में नई जगहें जोड़ना चाहती हैं और इसी बदलती तस्वीर में भारत के लिए बड़ा मौका पैदा हुआ है.

भारत ने दिसंबर 2021 में शुरू की अपनी चिप कहानी

भारत ने दिसंबर 2021 में India Semiconductor Mission शुरू किया था. इसके लिए सरकार ने 76 हजार करोड़ रुपये का पैकेज रखा. मकसद सिर्फ भारत में एक-दो chip factories लगाना नहीं था. कोशिश यह थी कि चिप बनाने की पूरी प्रक्रिया को भारत में लाया जाए. इसमें chip design करना, chip बनाना, उसे package करना और उसकी testing करना ये सभी काम शामिल हैं यानी भारत ऐसी semiconductor ecosystem तैयार करना चाहता है जहां चिप से जुड़ी अलग-अलग प्रक्रियाएं देश में ही हो सकें.

अब तक भारत ने कितनी दूरी तय की?

2022 से 2025 के बीच सरकार ने 12 projects को मंजूरी दी. इन projects में कुल मिलाकर करीब 1 लाख 64 हजार करोड़ रुपये के निवेश का वादा आया. इस पूरी कहानी में सबसे बड़ा नाम Tata Electronics का है. टाटा गुजरात के धोलेरा में 91 हजार करोड़ रुपये की लागत से एक chip factory लगा रही है. यहां 28, 50 और 65 nanometer वाली chips बनाने की योजना है. इन chips का इस्तेमाल गाड़ियों, electronic सामान और communication equipment में होगा.

गुजरात से असम तक शुरू हुआ काम

अमेरिकी कंपनी Micron ने गुजरात के सानंद में एक ऐसी factory लगाई है जहां chips को test और package करके इस्तेमाल के लिए तैयार किया जाता है. असम में भी Tata की एक कंपनी ने इसी तरह का काम शुरू किया है यानी भारत में semiconductor ecosystem तैयार करने की शुरुआत हो चुकी है. हालांकि अभी सबसे बड़ा कदम यानी बड़े पैमाने पर chip manufacturing शुरू होना बाकी है.

कंपनियों को भारत क्यों पसंद आ रहा है?

इसकी पहली बड़ी वजह है भारत का अपना market. सरकारी अनुमान के मुताबिक भारत में chips की खपत 2025 में करीब 45 से 50 अरब डॉलर थी. यह खपत 2030 तक बढ़कर 110 अरब डॉलर तक पहुंच सकती है यानी कंपनियों के लिए भारत सिर्फ chips बनाने की जगह नहीं है बल्कि एक बहुत बड़ा market भी है.

दूसरी वजह है कि कंपनियां अब सिर्फ चीन पर निर्भर नहीं रहना चाहतीं. वे अपनी supply chain में दूसरे विकल्प भी जोड़ना चाहती हैं और भारत को एक additional option के तौर पर देख रही हैं.

तीसरी वजह भारत के पास मौजूद engineers और chip designers की बड़ी संख्या है. अब कोशिश है कि भारत की इस design और engineering क्षमता को manufacturing capability से जोड़ा जाए.

आज का दिन भारत के लिए क्यों खास है?

नई दिल्ली में शुरू हुए Semicon India आयोजन में 60 से ज्यादा देशों की कंपनियां और बड़े अधिकारी पहुंचे हैं. इसी मौके पर Applied Materials ने अगले दस साल में भारत में 5 अरब डॉलर के निवेश का ऐलान किया. इससे पहले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने chip बनाने वाली कंपनियों के प्रमुखों के साथ बैठक भी की. प्रधानमंत्री ने कहा कि भारत नई technology में शुरू से ही आगे रहने वाले देशों में शामिल होना चाहता है यानी संदेश साफ है भारत अब सिर्फ chips का बड़ा खरीदार नहीं रहना चाहता बल्कि उनकी global supply chain में अपनी जगह बनाना चाहता है.

लेकिन सबसे बड़ी चुनौती अभी बाकी है

इतनी प्रगति के बावजूद भारत अभी तक किसी बड़ी factory से एक भी chip नहीं बना पाया है. Packaging और testing का काम शुरू हो चुका है लेकिन असली chip बनाने वाली factory से production शुरू होना अभी बाकी है. टाटा का धोलेरा project जो इस पूरी योजना का सबसे बड़ा project है तय समय से करीब दो साल पीछे चल रहा है यानी investment आना एक बात है और जमीन पर बड़े पैमाने पर chip production शुरू होना दूसरी बात.

चिप बनाना इतना मुश्किल क्यों है?

Chip बनाने वाली factory दुनिया की सबसे complex factories में गिनी जाती है. इसके लिए अरबों डॉलर का investment चाहिए. बेहद साफ environment चाहिए. लगातार electricity और पानी चाहिए. इसके साथ ही बहुत skilled engineers की जरूरत होती है. यहां एक छोटी सी गलती भी पूरे production को प्रभावित कर सकती है. इसलिए सिर्फ factory बन जाना ही काफी नहीं है. असली चुनौती है लगातार अच्छी quality की chips बनाना और उन्हें सही कीमत पर तैयार करना.

अब आगे क्या होने वाला है?

सरकार अब Semiconductor Mission के दूसरे चरण की तैयारी कर रही है. इसका budget करीब 1 लाख 27 हजार करोड़ रुपये रखने का प्रस्ताव है. इस बार focus सिर्फ factory लगाने पर नहीं होगा. Design, manufacturing, packaging, testing, machines और research इन सभी को साथ लेकर चलने की कोशिश होगी.

क्या भारत चीन और ताइवान की जगह ले लेगा?

अभी ऐसा कहना जल्दबाजी होगी. भारत की semiconductor capacity अभी चीन और ताइवान के बराबर नहीं है लेकिन दुनिया जिस तरह अपनी supply chain को अलग-अलग जगहों में बांटना चाहती है उसमें भारत खुद को एक नए और भरोसेमंद partner के तौर पर पेश कर रहा है.

अगर भारत अपनी योजनाओं को ठीक से जमीन पर उतार पाया तो आने वाले सालों में वह दुनिया की chip supply chain का एक अहम हिस्सा बन सकता है.

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