नई दिल्ली। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने बुधवार को भारत मंडपम में आयोजित एक कार्यक्रम के दौरान देश की विकास दर पर बात की। उन्होंने कहा कि 2014 से पहले के कई दशक अस्थिरता और उथल-पुथल से भरे हुए थे, लेकिन अब देश की जनता एक स्थिर सरकार का काम देख रही है और उसकी निर्णायक क्षमता की सराहना भी कर रही है।
अपने संबोधन में पीएम मोदी ने कांग्रेस पर निशाना साधते हुए एक शब्द का इस्तेमाल किया- “हिंदू ग्रोथ रेट”। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के पूरे भाषण में यह शब्द सबसे ज्यादा चर्चा का विषय बन गया। सोशल मीडिया पर कई लोगों ने सवाल पूछना शुरू कर दिया कि आखिर हिंदू ग्रोथ रेट क्या होता है? क्या इसका सीधा संबंध हिंदू समाज से है? क्या यह कोई सांप्रदायिक अवधारणा है?
हालांकि, जब इस शब्द के इतिहास को देखा जाता है तो पता चलता है कि “हिंदू ग्रोथ रेट” कोई सांप्रदायिक मुद्दा नहीं बल्कि भारत की अर्थव्यवस्था से जुड़ा एक आर्थिक शब्द है।
पीएम मोदी ने क्या कहा था?
सबसे पहले जानते हैं कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने संबोधन में क्या कहा था। भारत की विकास दर का जिक्र करते हुए पीएम मोदी ने कहा, “पहले देश को ऐसा एहसास कराया जाता था कि भारत में विकास धीरे-धीरे ही हो सकता है। भारत कभी भी तेज विकास नहीं कर सकता। बड़ी चतुराई से उस धीमी विकास दर को एक नाम भी दे दिया गया था- हिंदू ग्रोथ रेट। यानी कार्यशैली कांग्रेस की, नीतियां कांग्रेस की, असफलताएं कांग्रेस की, लेकिन कलंक देश की बड़ी हिंदू आबादी पर लगा दिया गया। सच्चाई यह है कि इसका नाम कांग्रेस ग्रोथ रेट होना चाहिए था।”
क्या होती है हिंदू ग्रोथ रेट?
असल में 1965 से 1975 के बीच भारत की आर्थिक विकास दर काफी कम रही थी। उस दौर में दिल्ली स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स के प्रसिद्ध अर्थशास्त्री प्रोफेसर राज कृष्ण ने भारत की धीमी आर्थिक वृद्धि को “हिंदू रेट ऑफ ग्रोथ” नाम दिया था। उनका तर्क था कि भारत की विकास दर बहुत धीमी गति से बढ़ रही है। उन्होंने व्यंग्यात्मक अंदाज में उस समय की आर्थिक नीतियों और धीमी विकास दर की आलोचना करते हुए यह शब्द इस्तेमाल किया था। यह शब्द किसी धर्म विशेष पर टिप्पणी नहीं था, बल्कि आर्थिक प्रदर्शन पर कटाक्ष था।
असल में उस दौर में हिंदुओं की प्रजजन दर कम थी, उसी पर कटाक्ष करते हुए कहा गया था कि देश की आर्थिक हालत भी ऐसी ही बन चुकी है। कहने का प्रयास था कि देश की विकास दर और हिंदुओं की प्रजनन दर एक समान थी।
जानकारी के लिए बता दें कि 1950 के दशक से लेकर 1980 के दशक तक भारत की औसत आर्थिक विकास दर करीब 3 से 4 प्रतिशत के बीच रही थी। 1947 में आजादी के समय देश आर्थिक रूप से काफी कमजोर था। भारत मुख्य रूप से कृषि प्रधान अर्थव्यवस्था था और बुनियादी ढांचे की भी भारी कमी थी। इसी धीमी आर्थिक वृद्धि को बाद में “हिंदू रेट ऑफ ग्रोथ” कहा गया।
हिंदू ग्रोथ रेट का जिक्र पूर्व आरबीआई गवर्नर रघुराम राजन ने भी 2023 में किया था। उन्होंने कहा था कि भारत की विकास दर खतरनाक रूप से हिंदू रेट ऑफ ग्रोथ के करीब पहुंच रही है और देश को इससे बचने के लिए बेहतर आर्थिक कदम उठाने की जरूरत है।
अब पीएम मोदी ने इसी शब्द को गुलामी की मानसिकता का प्रतीक बताया है। उनका कहना है कि कांग्रेस शासन के दौरान देश की एक बड़ी आबादी को नकारात्मक संदर्भ में पेश किया गया और आर्थिक विफलताओं का बोझ एक सांस्कृतिक पहचान पर डाल दिया गया।
अब हिंदू ग्रोथ रेट का मतलब तो जान लिया, लेकिन यह भी समझना जरूरी है कि आखिर ग्रोथ रेट होता क्या है और इसे कैसे मापा जाता है।
ग्रोथ रेट का मतलब क्या होता है?
सरल शब्दों में कहें तो ग्रोथ रेट का मतलब है कि किसी देश की अर्थव्यवस्था कितनी तेजी से आगे बढ़ रही है। इसे आमतौर पर जीडीपी (GDP) यानी सकल घरेलू उत्पाद की वृद्धि दर के रूप में मापा जाता है। उदाहरण के लिए, यदि किसी देश की जीडीपी एक साल में 90 से बढ़कर 100 हो जाती है तो उसकी विकास दर 10 प्रतिशत मानी जाएगी।
किसी भी देश की विकास दर को मापने के लिए कई आर्थिक गतिविधियों को शामिल किया जाता है। इसी वजह से इसे जीडीपी ग्रोथ रेट भी कहा जाता है। आर्थिक विकास दर को मुख्य रूप से दो पैमानों पर देखा जाता है- नॉमिनल ग्रोथ रेट और रियल ग्रोथ रेट।
नॉमिनल ग्रोथ रेट में महंगाई का प्रभाव भी शामिल होता है। यानी जीडीपी का जो आंकड़ा सामने आता है, उसमें वस्तुओं और सेवाओं की बढ़ी हुई कीमतों का असर भी रहता है। वहीं, रियल ग्रोथ रेट महंगाई के प्रभाव को हटाकर निकाला जाता है जिससे अर्थव्यवस्था की वास्तविक वृद्धि का पता चलता है।
साल भर में पैदा हुई वस्तुओं और सेवाओं के कुल मूल्य की गणना के आधार पर रियल ग्रोथ रेट निर्धारित की जाती है। इसमें कारों की बिक्री, मशीनरी, अनाज, कपड़े और अन्य वस्तुओं व सेवाओं का उत्पादन शामिल होता है।
देश की विकास दर साल दर साल
चलिए, अब अंत में आपको बताते हैं कि साल-दर-साल भारत की विकास दर किस तरह आगे बढ़ी है, यूपीए शासनकाल में यह कितनी रही और एनडीए के कार्यकाल में इसकी स्थिति क्या रही। यह डेटा World Bank से लिया गया है।










