लखनऊ। उत्तर प्रदेश में पंचायत राज व्यवस्था के इतिहास में एक बड़ा और अभूतपूर्व निर्णय लेते हुए योगी आदित्यनाथ सरकार ने प्रदेश के सभी 826 ब्लॉक प्रमुखों को उनके पद पर ‘प्रशासक’ के रूप में नियुक्त कर दिया है. रविवार, 19 जुलाई को दोपहर 2 बजे सरकार द्वारा जारी इस आदेश ने राज्य की प्रशासनिक व्यवस्था में एक नई चर्चा छेड़ दी है.
पहली बार हुआ ऐसा बदलाव
उत्तर प्रदेश के इतिहास में यह पहली बार है जब ग्राम प्रधानों, जिला पंचायत अध्यक्षों और ब्लॉक प्रमुखों को एक साथ प्रशासक नियुक्त किया गया है. सामान्यतः पंचायती राज अधिनियम के तहत, जैसे ही इन प्रतिनिधियों का कार्यकाल समाप्त होता है, स्थानीय प्रशासन जैसे ग्राम प्रधान की जगह ग्राम पंचायत अधिकारी और ब्लॉक प्रमुख की जगह खंड विकास अधिकारी (BDO) को प्रशासक का प्रभार सौंप दिया जाता है. लेकिन इस बार सरकार ने इस पुरानी परंपरा को बदलते हुए निर्वाचित प्रतिनिधियों को ही कार्यवाहक के रूप में पद पर बनाए रखने का फैसला किया है.
क्या है सरकार का यह निर्णय?
रविवार, 19 जुलाई को वर्तमान ब्लॉक प्रमुखों का 5 साल का निर्धारित कार्यकाल समाप्त हो रहा था. कार्यकाल खत्म होने से ठीक पहले सरकार ने आदेश जारी कर स्पष्ट कर दिया कि अब वे केवल निर्वाचित प्रतिनिधि ही नहीं, बल्कि ‘प्रशासक’ के तौर पर भी कार्य करेंगे. इस निर्णय का सीधा मतलब यह है कि आगामी पंचायत चुनाव संपन्न होने और नई परिषदों के गठन तक, वर्तमान ब्लॉक प्रमुख अपनी कुर्सियों पर बने रहेंगे.
प्रशासनिक कामकाज में आएगी निरंतरता
सरकार के इस कदम को प्रशासनिक दृष्टिकोण से काफी महत्वपूर्ण माना जा रहा है. विशेषज्ञों का मानना है कि कोरोना महामारी या अन्य परिस्थितियों के कारण यदि चुनाव में देरी होती है, तो पंचायतों का कामकाज प्रभावित नहीं होगा. यदि किसी अधिकारी को प्रभार दिया जाता, तो विकास कार्यों की गति धीमी हो सकती थी, लेकिन अब जनप्रतिनिधियों के बने रहने से ब्लॉक स्तर की विकास योजनाएं और जनहित के कार्य बिना किसी रुकावट के जारी रहेंगे.
पंचायत चुनाव की तैयारी पर नजर
राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार, इस निर्णय के पीछे आगामी पंचायत चुनावों की तैयारी भी एक बड़ा कारण हो सकती है. सरकार चाहती है कि जमीनी स्तर पर विकास कार्यों की कमान उन लोगों के हाथ में ही रहे जिन्हें जनता ने चुनकर भेजा है. इससे न केवल जनता के बीच सरकार की छवि बेहतर होती है, बल्कि विकास कार्यों में भी जवाबदेही बनी रहती है. फिलहाल, इस ऐतिहासिक फैसले के बाद पूरे राज्य की निगाहें अब पंचायत चुनावों की तारीखों की घोषणा पर टिकी हैं.












