लखनऊ: प्रदेश के किसानों को कृषि यंत्रों पर सब्सिडी देने के लिए 20 और 21 अगस्त को ई-लॉटरी निकाली जाएगी. सब मिशन ऑन एग्रीकल्चरल मैकेनाइजेशन योजना के तहत यह प्रक्रिया प्रदेश के 75 जिलों में एक साथ चलेगी, लेकिन सवाल यह है कि आवेदन से लेकर किसान के खाते में सब्सिडी पहुंचने तक का पूरा सफर कितना पारदर्शी है. कृषि विभाग के डिप्टी डायरेक्टर बलराम वर्मा के मुताबिक, जितने आवेदन आए हैं और जितने यंत्र उपलब्ध हैं, उसी अनुपात में लाभार्थियों का चयन लॉटरी के जरिए होगा. हर जिले में जिलाधिकारी की अध्यक्षता में एक कमेटी बनाई गई है, जो लॉटरी की निगरानी करेगी.
मांग और आपूर्ति में दिखा बड़ा अंतर: प्रक्रिया के तहत पहले स्क्रीन पर मॉक ड्रिल की जाएगी, उसके बाद असली इलेक्ट्रॉनिक ड्रॉ निकाला जाएगा और पूरा फैसला कमेटी के हाथ में रहेगा. आंकड़े बताते हैं कि किसानों में सबसे ज्यादा मांग रोटावेटर की है. इस यंत्र के लिए जहां करीब 11,890 आवेदन आए हैं, वहीं विभाग के पास सिर्फ 1000 रोटावेटर उपलब्ध हैं. यानी मांग और आपूर्ति में करीब बारह गुना का फासला है.
रोटावेटर और लेजर लैंड लेवेलर की सबसे अधिक डिमांड: इसी तरह लेजर लैंड लेवेलर के लिए 300 के मुकाबले 2442 आवेदन, कम्बाइन हार्वेस्टर (सुपर स्ट्रा मैनेजमेंट सिस्टम) के लिए 152 के मुकाबले 1238 आवेदन आए हैं. कुल मिलाकर प्रदेश भर से 36,346 आवेदनों के मुकाबले महज 11,898 यंत्र ही उपलब्ध हैं. सब्सिडी के मामले में विभाग ने साफ किया कि महिला और अनुसूचित जाति-जनजाति के किसानों को 50 प्रतिशत तक अनुदान मिलेगा, जबकि सामान्य पुरुष किसानों को 40 प्रतिशत सब्सिडी दी जाएगी. चयन के बाद किसान को पहले अपने खर्च से यंत्र खरीदना होगा, फिर बिल, आधार कार्ड, फोटो और खेत के कागजात जमा करने होंगे.
सत्यापन के बाद सीधे खाते में आएगी सब्सिडी: इसके बाद जिला कृषि अधिकारी सत्यापन करेंगे और तब जाकर सब्सिडी की राशि खाते में पहुंचेगी, एक ऐसी प्रक्रिया जिसमें अधिकारी खुद मानते हैं कि समय लग सकता है. यही देरी असल परेशानी की जड़ है. डिप्टी डायरेक्टर के कार्यालय में ही जालौन के रहने वाले किसान देवेंद्र तिवारी ने शिकायत दर्ज कराई कि वे पिछले दस साल से कृषि यंत्र के लिए आवेदन कर रहे हैं, लेकिन आज तक एक भी यंत्र नहीं मिला. उन्होंने आरोप लगाया कि जिले में कुछ लोग सब्सिडी का 50 प्रतिशत हिस्सा लेकर यंत्र दिलवाने का दावा करते हैं.
दलालों के बहकावे में न आने की अपील: इस पर अधिकारी ने भरोसा दिलाया कि ऐसा किसी सूरत में संभव नहीं है, लेकिन साथ ही यह भी स्वीकार किया कि कुछ दलाल दस लोगों से पैसा लेकर उनमें से दो-तीन का चयन होते ही उसका श्रेय लेने लगते हैं. यानी लॉटरी की प्रक्रिया भले ही कागज पर पारदर्शी दिखे, जमीन पर मांग और आपूर्ति का बड़ा अंतर, सब्सिडी मिलने में लगने वाला समय, और दलालों की सक्रियता जैसे सवाल असली किसानों के लिए अब भी बरकरार हैं.












