पटना: बिहार में तेजी से बढ़ रहे साइबर अपराध के बीच अब राज्य सरकार आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस यानी एआई की मदद से नई तकनीकी व्यवस्था तैयार करने जा रही है. हाल ही में आयोजित बिहार एआई समिट 2026 में सरकार ने घोषणा की कि साइबर अपराध हेल्पलाइन 1930 को एआई आधारित सिस्टम से जोड़ा जाएगा. अगर यह व्यवस्था पूरी तरह लागू होती है तो बिहार देश का पहला ऐसा राज्य बन जाएगा जहां साइबर अपराध की शिकायतों पर एआई आधारित रिस्पॉन्स मिलेगा.
हेल्पलाइन 1930 का आधुनिकीकरण: सरकार का दावा है कि इससे शिकायत दर्ज करने की प्रक्रिया तेज होगी, पीड़ितों को कम समय में मदद मिलेगी और साइबर फ्रॉड की रकम को समय रहते होल्ड कराने में सहायता मिलेगी. साइबर अपराध से जुड़ी शिकायतों के लिए देशभर में 1930 टोल फ्री नंबर संचालित किया जाता है. बिहार में भी यह कॉल सेंटर पहले से काम कर रहा है, लेकिन अब इसे अधिक आधुनिक और तेज बनाने की तैयारी चल रही है.
तेजी से होगी कार्रकवाई: बिहार एआई समिट में सरकार ने कहा कि बढ़ते साइबर अपराध को देखते हुए शिकायतकर्ताओं को समय पर रिस्पॉन्स देना जरूरी हो गया है. अभी शिकायत दर्ज करने की प्रक्रिया पूरी तरह मैनुअल है, जिसमें कॉल रिसीव करने से लेकर शिकायत को सही श्रेणी में डालने और आगे कार्रवाई शुरू करने तक कई मिनट लग जाते हैं. एआई आधारित सिस्टम आने के बाद यह प्रक्रिया काफी हद तक ऑटोमेटेड हो जाएगी.
आर्थिक अपराध इकाई करती है निगरानी: राज्य में साइबर अपराध से जुड़े मामलों की निगरानी आर्थिक अपराध इकाई के तहत की जाती है. आर्थिक अपराध इकाई के आईजी रंजीत कुमार मिश्रा ने बताया कि राज्य में बढ़ते साइबर अपराध और online धोखाधड़ी को देखते हुए फरवरी महीने में साइबर अपराध एवं सुरक्षा इकाई का अलग से गठन किया गया. इसके साथ ही पहले से संचालित 1930 कॉल सेंटर में आईवीआरएस यानी इंटरएक्टिव वॉइस रिस्पांस सिस्टम भी जोड़ा गया ताकि शिकायतों को व्यवस्थित तरीके से हैंडल किया जा सके.
साइबर अपराध के आंकड़ों में वृद्धि: आईजी रंजीत कुमार मिश्रा ने बताया कि कुछ समय पहले तक जहां प्रतिदिन लगभग 5500 कॉल आते थे, वहीं अब यह संख्या बढ़कर करीब 8100 प्रतिदिन पहुंच गई है. यानी साइबर अपराध की शिकायतों में लगभग 46 प्रतिशत की वृद्धि हुई है. पिछले चार महीनों में ही 1930 कॉल सेंटर ने करीब 9 लाख कॉल रिसीव किए हैं. इन शिकायतों में लगभग 199 करोड़ रुपये के साइबर फ्रॉड की रिपोर्टिंग हुई. इनमें से 51.54 करोड़ रुपये को समय रहते होल्ड कराया गया, जबकि लगभग 7 करोड़ रुपये पीड़ितों को वापस भी कराए जा चुके हैं. शेष राशि न्यायालय के निर्देश के बाद पीड़ितों को लौटाई जाएगी.
‘गोल्डन टाइम’ का महत्व: विशेषज्ञों का मानना है कि एआई आधारित कॉल सेंटर साइबर अपराध के मामलों में “गोल्डन टाइम” बचाने में सबसे बड़ी भूमिका निभा सकता है. साइबर फ्रॉड में शुरुआती कुछ मिनट और पहला घंटा बेहद महत्वपूर्ण माना जाता है. अगर इसी समय के भीतर बैंक खाते को फ्रीज या रकम को होल्ड करा दिया जाए तो पैसे बचाए जा सकते हैं.
एआई आधारित चैट बॉट के लाभ: राज्य के साइबर एक्सपर्ट अंकुर कुमार का कहना है कि एआई आधारित चैट बॉट और वॉइस सिस्टम आने के बाद यह समय काफी कम हो सकता है. उन्होंने कहा कि साइबर अपराध अलग-अलग प्रकार के होते हैं, जैसे यूपीआई फ्रॉड, ओटीपी स्कैम, फेक कॉल, सोशल मीडिया हैकिंग, निवेश के नाम पर ठगी या बैंकिंग फ्रॉड. एआई सिस्टम शिकायतकर्ता की आवाज और जानकारी के आधार पर तुरंत यह समझ सकेगा कि मामला किस श्रेणी का है और उसके बाद अगला कदम क्या होना चाहिए. इससे पीड़ित को तुरंत सलाह मिल सकेगी कि बैंक को कैसे अलर्ट करना है, खाते को कैसे सुरक्षित करना है और शिकायत को किस एजेंसी तक पहुंचाना है.
एआई सिस्टम की चुनौतियां और मानवीय भूमिका: अंकुर कुमार ने कहा कि हालांकि एआई आधारित कॉल सेंटर के कुछ नुकसान और चुनौतियां भी हो सकती हैं. ग्रामीण इलाकों के लोग या तकनीक की कम जानकारी रखने वाले नागरिक मशीन आधारित संवाद को आसानी से समझ नहीं पाएंगे. कई बार स्थानीय भाषाओं और बोलियों को समझने में एआई सिस्टम को परेशानी हो सकती है. इसके अलावा संवेदनशील मामलों में लोग इंसानी बातचीत को अधिक भरोसेमंद मानते हैं. इसलिए एआई सिस्टम के साथ प्रशिक्षित मानव ऑपरेटरों की भी जरूरत बनी रहेगी. उन्होंने कहा कि एआई तकनीक ह्यूमन वर्कफोर्स का विकल्प नहीं है, बल्कि सहायक है.
बैंकिंग नेटवर्क के साथ एकीकरण का सुझाव: बिहार एआई समिट की आयोजन समिति से जुड़े बिहार इंडस्ट्रीज एसोसिएशन के पूर्व अध्यक्ष रामलाल खेतान का कहना है कि समय की मांग है कि हर क्षेत्र में नई तकनीक का इस्तेमाल किया जाए. उन्होंने कहा कि एआई का सबसे बड़ा फायदा समय की बचत है. अभी कॉल सेंटर में एक शिकायत को पूरी तरह दर्ज करने और समझने में लगभग 5 से 10 मिनट लग जाते हैं, लेकिन एआई आधारित सिस्टम कुछ ही सेकंड में अपराध की प्रकृति को समझ सकता है. इसके बाद वह संबंधित बैंक, एजेंसी या शिकायतकर्ता को तुरंत अलर्ट भेज सकता है.
भविष्य की राह और निष्कर्ष: उन्होंने कहा कि एआई आधारित 1930 कॉल सेंटर सिर्फ तकनीकी बदलाव नहीं बल्कि साइबर सुरक्षा के क्षेत्र में बड़ा प्रयोग साबित हो सकता है. अगर बिहार का यह मॉडल सफल होता है तो आने वाले समय में दूसरे राज्य भी इसे अपनाने की दिशा में आगे बढ़ सकते हैं. लगातार बढ़ते साइबर अपराध के बीच यह पहल लोगों को तेज राहत, बेहतर सुरक्षा और समय पर सहायता देने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम होगा.












