मेरठ : यूपी के मेरठ स्थित बुनकर सेवा केंद्र ने बेहद ही अनोखी तरह की साड़ियों को तैयार किया है. यह साड़ियां आम तौर पर समुद्र के तटीय इलाकों में ही बुनी जा सकती थीं. इतना ही नहीं, इन अनूठी साड़ियों को कॉपी करना भी आसान नहीं है. आइए जानते हैं ऐसी ही अनूठी पहल के बारे में.
मेरठ के बुनकर सेवा केंद्र में साड़ी को लेकर किये गए खास शोध ने पूरे देश का ध्यान अपनी ओर खींच लिया है, यहां कुछ ऐसी साड़ियां तैयार की गई हैं जो आने वाले दिनों में अपनी अलग और अनोखी बुनाई की वजह से न सिर्फ किसी को भी आकर्षित कर सकती हैं, बल्कि इससे यूपी के बुनकरों का ये हुनर उन्हें अलग पहचान और सम्मान के साथ आर्थिक तौर पर भी समृद्ध बनाने में मददगार साबित हो सकता है.
ये विशेष साड़ी भारत टेक्सटाइल एक्सपो 2026 (Bharat Tex 2026) में प्रदर्शन के लिये प्रस्तावित की गई है. यह मेरठ क्षेत्र के लिए एक महत्वपूर्ण उपलब्धि है, क्योंकि यह क्षेत्र मुख्यतः बेडशीट, दरी, तौलिया के अलावा होम फर्निशिंग उत्पादों के लिए जाना जाता है. विशेष तरह की साड़ियों को रिसर्च और नवाचार के तहत सिंगल काउंट कॉटन धागे का उपयोग करते हुए तैयार किया गया है.
जानकारों का कहना है कि इस प्रकार की महीन साड़ियों का उत्पादन समुद्र के तटीय क्षेत्रों में होता है, लेकिन बुनकर सेवा केंद्र, मेरठ ने इसे स्थानीय स्तर पर विकसित किया है. साड़ी में डिजाइन के लिए खास तकनीक का प्रयोग किया गया है, जिसे भारत सरकार की तरफ से आयोजित तंतवी स्ट्रक्चर 2.0 की डिजाइन मीटिंग में पैनल एवं विशेषज्ञों द्वारा हाल ही में चुना भी गया है.
बुनकर सेवा केंद्र में बतौर टेक्सटाइल डिजाइनर सेवा दे रहीं सुप्रिया द्विवेदी बताती हैं कि मेरठ के बुनकर केंद्र से लगभग 35 जिले जुड़े हुए हैं. इस केंद्र पर बुनकरों को लेकर खास योजना बनाई गई है, जिससे कि उनके हुनर को अलग पहचान के साथ-साथ सम्मान भी मिल सके. वह बताती हैं कि मेरठ की अगर बात करें तो यहां चिंदी दरी, बेडशीट, मोटे कपड़ों का काम होता है, लेकिन यहां एक अलग तरह की कोशिश की गई.
वह बताती हैं कि यहां एक अलग तरह की साड़ी को बुनकरों के प्रयास से तैयार किया गया है. ये साड़ी का प्रोटोटाइप आगे के लिए चुना भी गया है. इसमें जो धागा इस्तेमाल में लाया गया है वह, सिंगल हड्रेड यूज हुआ है. इस धागे के साथ बहुत सारे कॉम्प्लिकेशंस भी हैं, अगर इस धागे को बनाई में लेते हैं तो बहुत ज्यादा टूटता भी है. इस धागे को बुनाई में लेने के लिए वातावरण भी उसी तरह का होना जरूरी होता है.
वह बताती हैं कि जो समुद्री किनारे वाले इलाके हैं वहीं यह खास तरह की साड़ी तैयार की जा सकती है. क्योंकि वहां का क्लाइमेट साड़ी बनाने के लिए मुफीद है. उसके बावजूद इस साड़ी को यहां बनाया गया है. इसका प्रोटोटाइप विकसित किया गया है और मेरठ बुनकर केंद्र के ही दायरे में आने वाले ललितपुर में ऐसी साड़ियों को बनाया जा रहा है.
बुनकर सेवा केंद्र के मेरठ के उपनिदेशक तपन शर्मा कहते हैं कि तंतवी स्ट्रक्चर 2.0 के अंतर्गत पहली बार रिसर्च एवं डेवलपमेंट के तहत सिंगल 100 काउंट सूती धागे से साड़ी का सफल विकास कराया गया है. मेरठ क्षेत्र पारंपरिक रूप से दरी, बेडशीट, मैट एवं चिंदी दरी जैसे होम फर्निशिंग उत्पादों के लिए जाना जाता है, जबकि इतनी महीन सूती साड़ियों का निर्माण नदी तटीय क्षेत्रों में किया जाता है.
वह बताते हैं कि इस साड़ी में हैंडलूम विशिष्ट “वॉर्प मैनिपुलेशन” तकनीक का प्रयोग किया गया है, जिसे पावरलूम पर दोहराना संभव नहीं है. सिंगल 100 काउंट धागे की महीनता के कारण एक साड़ी के निर्माण में लगभग 10-15 दिन का समय लगता है, जिससे बुनकरों को अत्यधिक सावधानी के साथ कार्य करना पड़ता है.
वह बताते हैं कि बुनकर सेवा केंद्र, मेरठ को 12 नई साड़ियों का डिजाइन विकास करने के लिये चयनित किया गया है. जिनका विकास स्थानीय बुनकरों के द्वारा करवाया जा रहा है. जिनका प्रदर्शन राष्ट्रीय हथकरघा दिवस (7 अगस्त) पर भारत मंडपम, नई दिल्ली में किया जाएगा. भविष्य में इन उत्पादों के भारत टैक्स जैसे राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय मंचों पर प्रदर्शित होने से निश्चित ही आगे अवसर मिलेंगे.
इस नवाचार को बुनकरों के लिए अधिक व्यावहारिक और उत्पादन-अनुकूल बनाने के उद्देश्य से बाद में 2/120 काउंट सूती धागे में भी इसी तकनीक का विकास कराया गया, जो सफल रहा है. इससे उत्पादन प्रक्रिया सरल हुई तथा बुनकर कम समय में इस उत्पाद का निर्माण कर सकेंगे.
यह पहल मेरठ के हथकरघा क्षेत्र को पारंपरिक उत्पादों से आगे बढ़ाकर उच्च मूल्यवर्धित, नवाचारी एवं हैंडलूम-विशिष्ट उत्पादों की दिशा में ले जा रही है तथा स्थानीय बुनकरों को नए डिजाइन, नई तकनीक और नए बाजार अवसर प्रदान कर रही है.
उपनिदेशक बताते हैं कि पूरी उम्मीद है कि जहां वर्तमान समय में एक बुनकर दिन भर में औसतन 400 कमाता है, अगर यह साड़ी मार्केट में पसंद कर ली जाती है और ग्राहक मिल जाते हैं तो बुनकरों की आर्थिक स्थिति सुधर सकती है. उनका दावा है कि बुनकर एक दिन में आसानी से 800 रुपये तक आसानी से कमा लेंगे. मेरठ केंद्र से मंडल में ही 2000 बुनकर इस वक्त जुड़े हुए हैं. जबकि 35 जिले भी मेरठ बुनकर केंद्र के दायरे में आते हैं.












