नई दिल्ली। बर्फ से ढकी ऊंची चोटियां, हजारों मीटर की ऊंचाई, साल के कई महीनों तक बंद रहने वाले रास्ते और ऐसी दुर्गम जमीन जहां पहुंचना भी किसी चुनौती से कम नहीं… लेकिन अफगानिस्तान की इन्हीं पहाड़ियों में छिपी है दुनिया की सबसे अहम रणनीतिक पट्टियों में से एक वाखान कॉरिडोर… करीब 350 किलोमीटर लंबी जमीन की यह पतली पट्टी देखने में भले ही दुनिया के नक्शे पर मामूली लगे, लेकिन इसके इर्द-गिर्द भारत, चीन, पाकिस्तान और मध्य एशिया की बड़ी भू-राजनीतिक लड़ाई चल रही है. कभी इसे रूसी साम्राज्य और ब्रिटिश भारत के बीच ‘बफर’ बनाने के लिए तैयार किया गया था. आज यही इलाका चीन को टेंशन में डाले हुए हैं.
यह कॉरिडोर पाकिस्तान की मध्य एशिया तक पहुंच की महत्वाकांक्षा और भारत की उत्तरी रणनीति का अहम केंद्र बन गया है. अब भारत-अफगानिस्तान संबंधों में वाखान कॉरिडोर का उल्लेख एक बार फिर इस इलाके को सुर्खियों में ले आया है.
नक्शे पर पतली लाइन, लेकिन खेल बहुत बड़ा
अफगानिस्तान के बदख्शां प्रांत से निकलने वाला वाखान कॉरिडोर पूर्व की तरफ चीन के शिनजियांग तक पहुंचता है. इसके उत्तर में ताजिकिस्तान है, दक्षिण में पाकिस्तान के कब्जे वाला गिलगित-बाल्टिस्तान और उससे जुड़े पर्वतीय इलाके हैं, जबकि पूर्वी छोर पर चीन खड़ा है. यानी जमीन की इस एक पतली पट्टी के आसपास चार देशों और क्षेत्रों की रणनीतिक सीमाएं बेहद करीब आ जाती हैं.
वाखान कॉरिडोर का सबसे अहम हिस्सा उसका पूर्वी छोर है, जहां अफगानिस्तान और चीन की करीब 74-76 किलोमीटर लंबी सीमा मिलती है. यहां वाखजिर दर्रा दोनों देशों को जोड़ने वाला प्रमुख बिंदु है. करीब 5,000 मीटर की ऊंचाई पर स्थित यह दर्रा दुनिया के सबसे कठिन पर्वतीय इलाकों में गिना जाता है. अफगानिस्तान की ओर से यहां तक न के बराबर सड़कें बनाई गई हैं. लेकिन भू-राजनीति में हर रास्ते की अहमियत उसकी चौड़ाई से नहीं, बल्कि उसकी दिशा से तय होती है.
19वीं सदी में रूस और ब्रिटिश साम्राज्य के बीच मध्य एशिया में प्रभाव बढ़ाने की होड़ चल रही थी. इतिहास में इसे ‘ग्रेट गेम’ कहा जाता है. उस समय ब्रिटिश भारत नहीं चाहता था कि रूसी प्रभाव सीधे उसके प्रभाव क्षेत्र तक पहुंच जाए. इसी रणनीतिक खींचतान के बीच अफगानिस्तान के इस संकरे हिस्से को एक बफर जोन के रूप में विकसित किया गया. यानी वाखान कॉरिडोर का जन्म ही दो बड़ी शक्तियों के बीच दूरी बनाए रखने के लिए हुआ था.
विडंबना देखिए, करीब डेढ़ सौ साल बाद भी इस इलाके का काम लगभग वैसा ही है. फर्क सिर्फ इतना है कि अब यहां रूस और ब्रिटिश भारत नहीं, बल्कि चीन, पाकिस्तान, भारत और अफगानिस्तान के हित टकरा रहे हैं.
यह छोटा बॉर्डर चीन के लिए क्यों बड़ी टेंशन?
चीन के लिए वाखान कॉरिडोर केवल अफगानिस्तान से जुड़ी एक छोटी सीमा नहीं है. इस कॉरिडोर का दूसरा छोर सीधे चीन के संवेदनशील शिनजियांग क्षेत्र के पास पहुंचता है. बीजिंग लंबे समय से इस बात को लेकर चिंतित रहा है कि अफगानिस्तान की अस्थिरता और वहां सक्रिय चरमपंथी संगठनों का असर सीमा पार शिनजियांग तक पहुंच सकता है. चीन विशेष रूप से इस बात को लेकर सतर्क रहा है कि उइगर उग्रवाद से जुड़े समूह अफगानिस्तान की जमीन का इस्तेमाल कर शिनजियांग में अस्थिरता फैलाने की कोशिश न करें. यही वजह है कि चीन इस दुर्गम कॉरिडोर को सामान्य सीमा की तरह नहीं देखता. बीजिंग के लिए यह एक तरह का संवेदनशील सुरक्षा गलियारा है.
भारत के लिए क्यों खास है वाखान?
यहीं से इस कहानी में भारत की एंट्री होती है.जम्मू-कश्मीर के गिलगित-बाल्टिस्तान इलाके पाकिस्तान ने अवैध रूप से कब्जा कर रखा है. यह इलाका वाखान कॉरिडोर के बेहद करीब स्थित है. यही वह बिंदु है जहां दुनिया के नक्शे पर दिखने वाली एक पतली पट्टी अचानक भारत की बड़ी रणनीतिक तस्वीर का हिस्सा बन जाती है. हाल ही में भारत और अफगानिस्तान के बीच समझौते में वाखान का जिक्र इसी रणनीतिक सोच से जुड़ता है.
चीन-पाकिस्तान की जोड़ी और भारत की नजर
वाखान कॉरिडोर के आसपास चीन और पाकिस्तान की बढ़ती रणनीतिक साझेदारी भारत के लिए एक बड़ा फैक्टर है. चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारा यानी CPEC पहले से ही पाकिस्तान के कब्जे वाले गिलगित-बाल्टिस्तान से होकर गुजरता है. चीन लगातार पाकिस्तान के साथ सड़क, ऊर्जा और कनेक्टिविटी परियोजनाओं को आगे बढ़ा रहा है.
ऐसे में भविष्य में अगर वाखान क्षेत्र को चीन-अफगानिस्तान या पाकिस्तान-मध्य एशिया संपर्क के लिए विकसित किया जाता है, तो पूरे इलाके की रणनीतिक तस्वीर बदल सकती है. अगर इस दुर्गम इलाके में भविष्य में बेहतर सड़कें और संपर्क मार्ग विकसित होते हैं, तो चीन को अफगानिस्तान और मध्य एशिया तक पहुंच के नए विकल्प मिल सकते हैं. पाकिस्तान को भी मध्य एशिया की तरफ एक नया रणनीतिक रास्ता मिल सकता है. भारत इसी संभावना पर नजर रखे हुए है.
चीन-पाकिस्तान की टेंशन बढ़ाने वाला प्लान
भारत लंबे समय से पाकिस्तान को दरकिनार करते हुए अफगानिस्तान और मध्य एशिया तक पहुंच बनाने की कोशिश करता रहा है. इसी रणनीति में ईरान का चाबहार बंदरगाह महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है. भारत चाबहार के जरिए अफगानिस्तान और आगे मध्य एशिया तक संपर्क का विकल्प विकसित करना चाहता है. लेकिन वाखान क्षेत्र में चीन और पाकिस्तान की संभावित गतिविधियां इस पूरे समीकरण को प्रभावित कर सकती हैं.
यही वजह है कि भारत के लिए वाखान केवल पहाड़ों के बीच फंसी एक जमीन नहीं है. यह भविष्य की कनेक्टिविटी की उस शतरंज का हिस्सा है, जिसमें हर सड़क, हर दर्रा और हर सीमा का अपना महत्व है.
उज्बेकिस्तान से 1000 KM दूर, फिर भी मध्य एशिया की राजनीति में अहम
यह समझना भी जरूरी है कि वाखान कॉरिडोर उज्बेकिस्तान से करीब 1,000 किलोमीटर दूर है. फिलहाल इसकी अहमियत सड़क या व्यापारिक आवाजाही से ज्यादा इसकी भौगोलिक स्थिति और भविष्य की संभावनाओं में है. लेकिन अगर आने वाले वर्षों में क्षेत्रीय शक्तियां नई सड़कें, रेल नेटवर्क या आर्थिक गलियारे विकसित करती हैं, तो आज का यह ‘डेड एंड’ कल का बड़ा रणनीतिक रास्ता बन सकता है.
आने वाले समय में बदल सकता है पूरा खेल
फिलहाल वाखान कॉरिडोर बर्फ, पहाड़ और दुर्गम रास्तों से घिरा हुआ है. भारत के लिए भी यह कॉरिडोर सिर्फ नक्शे पर बनी एक पतली लाइन नहीं है. यह चीन की सुरक्षा चिंता को समझने का रास्ता है. पाकिस्तान की कनेक्टिविटी महत्वाकांक्षा पर नजर रखने का बिंदु है. मध्य एशिया की भविष्य की राजनीति का संभावित दरवाजा है. और सबसे बढ़कर, यह उस भू-राजनीतिक शतरंज का हिस्सा है जहां बर्फ से ढकी एक संकरी पहाड़ी पट्टी भी पूरी बाजी का रुख बदल सकती है.
वाखान कॉरिडोर आज भले ही दुनिया के सबसे सुनसान इलाकों में शामिल हो, लेकिन आने वाले वर्षों में यही ‘सुनसान रास्ता’ एशिया की सबसे बड़ी रणनीतिक लड़ाइयों में से एक का केंद्र बन सकता है.












