नई दिल्ली। केंद्रीय गृह मंत्रालय ने ‘विदेशी अंशदान विनियमन अधिनियम’ (FCRA) के तहत गैर-सरकारी संगठनों (NGOs) और संस्थाओं के लिए विदेशी फंडिंग के नियमों को और कड़ा कर दिया है। सरकार ने दो नए नोटिफिकेशन (अधिसूचनाएं) जारी किए हैं।
इनके जरिए जुर्माने की राशि में भारी बदलाव किया गया है, और यह तय किया गया है कि विदेशी पैसा किस खास काम और किस इलाके में खर्च होगा। साथ ही, धर्म परिवर्तन (proselytising) जैसी गतिविधियों में विदेशी पैसे के इस्तेमाल पर पूरी तरह से रोक लगा दी गई है।
पहले नोटिफिकेशन में क्या-क्या?
गृह मंत्रालय द्वारा जारी पहले नोटिफिकेशन के बिंदुओं की बात करें तो अब हर FCRA रजिस्ट्रेशन के समय यह साफ-साफ बताना होगा कि विदेशी फंड का इस्तेमाल किस काम के लिए किया जाएगा और किस राज्य या केंद्र शासित प्रदेश में यह काम होगा। इसके अलावा संस्थाओं को सरकार द्वारा तय की गई 105 कामों की एक सूची (Schedule) में से ही अपनी गतिविधियां चुननी होंगी।
नए नियमों के अनुसार, जिन संस्थाओं के पास पहले से FCRA रजिस्ट्रेशन है, उन्हें 1 साल का समय दिया गया है। इस दौरान उन्हें बताना होगा कि वे किस काम और किस इलाके को अपने रजिस्ट्रेशन में बनाए रखना चाहती हैं। भविष्य में काम या इलाके का दायरा बढ़ाने के लिए सरकार से नए सिरे से मंजूरी लेनी होगी। नए नियमों में ‘मुख्य पदाधिकारी’ की परिभाषा को और बड़ा किया गया है। अगर किसी संस्था के मुख्य मैनेजमेंट में कोई विदेशी नागरिक है, तो उस संस्था को आमतौर पर रजिस्ट्रेशन या विदेशी फंड लेने की अनुमति नहीं मिलेगी।
रजिस्ट्रेशन के रिन्यूअल या उसे रद्द करने के फैसलों के लिए अब यह देखा जाएगा कि संस्था ने फंड का कम से कम कितना इस्तेमाल किया है। विदेशी फंड की अगली किस्तें जारी करने की शर्तों को भी सख्त बना दिया गया है। वहीं, अब संस्थाओं को अपनी सालाना रिपोर्ट में और ज्यादा जानकारियां देनी होंगी। इसमें उनके कामों की रिपोर्ट, सोशल मीडिया अकाउंट्स की डिटेल और पैसा देने वाले असली डोनर की जानकारी शामिल है।
दूसरे नोटिफिकेशन में नियमों के उल्लंघनों का जिक्र
दूसरा नोटिफिकेशन की बात करें तो यह नियमों के उल्लंघन पर लगने वाले जुर्माने में बदलावों का उल्लेख करता है। इसमें बताया गया है कि तय सीमा से अधिक पैसा ऑफिस या एडमिनिस्ट्रेशन के कामों पर खर्च करना। जोखिम भरे निवेश को लेकर भी नियम बनाए गए हैं और विदेशी पैसे को शेयर मार्केट या ऐसी ही जोखिम भरी जगहों पर लगाने को लेकर जुर्माने का प्रावधान है।
इसके अलावा फंड की हेराफेरी और गलत इस्तेमाल का भी जिक्र है। इसके तहत विदेशी फंड को एक काम से हटाकर किसी दूसरे काम में लगाना गैरकानूनी माना जाएगा। वहीं, विदेशी मदद का इस्तेमाल उन कामों या इलाकों से बाहर करना जिनकी मंजूरी सरकार से नहीं मिली है।
2011 से कितने अलग हैं ये बदलाव?
FCRA के नियमों में ये बदलाव एक बड़े और सामान्य कार्यक्रम-आधारित ढांचे से हटकर एक बेहद सख्त और नियम-आधारित व्यवस्था की ओर इशारा करते हैं। 2011 के नियमों के तहत संस्थाएं मोटे तौर पर खुद को धार्मिक, सांस्कृतिक, शैक्षणिक, आर्थिक या सामाजिक गतिविधियों से जुड़ा हुआ बताती थीं और अपने कार्यक्रमों की जानकारी देती थीं। वहीं, नए नियमों के तहत उन्हें सरकार द्वारा जारी की गई स्वीकृत कामों की सूची में से ही चुनाव करना होगा, और उनका रजिस्ट्रेशन उन्हीं खास कामों से बंधा रहेगा।
इलाके की पाबंदी भी नए नियमों में दूसरा अहम बदलाव भौगोलिक सीमाओं को लेकर है। पहले संस्थाएं सिर्फ उन इलाकों की जानकारी देती थीं, जहां वे काम कर रही हैं, लेकिन उनका रजिस्ट्रेशन किसी खास राज्य या केंद्र शासित प्रदेश से जुड़ा हुआ नहीं होता था। अब नए नियमों के तहत काम करने का इलाका भी संस्थान के लाइसेंस का एक जरूरी हिस्सा बन गया है।
पदाधिकारी को लेकर भी सख्त नियम
2011 के नियमों में ज्यादातर “कार्यकारी समिति या परिषद के सदस्यों” का ही जिक्र था लेकिन “मुख्य पदाधिकारी” को साफ तौर पर परिभाषित नहीं किया गया था। अब नए नियमों में इसे पूरी तरह स्पष्ट कर दिया गया है। इसके तहत कंपनियों के डायरेक्टर्स, फर्मों के पार्टनर्स, ट्रस्टों के ट्रस्टी, हिंदू अविभाजित परिवार (HUF) के कर्ता, संस्था के पदाधिकारी और गवर्निंग बॉडी के सदस्य, या “ऐसा कोई भी अन्य अधिकारी या व्यक्ति शामिल है, जिसका संस्था के मैनेजमेंट या कामकाज पर कंट्रोल या जिम्मेदारी हो।”
धर्म परिवर्तन पर रोक और सख्त नियम
नए नियम साफ तौर पर धर्म परिवर्तन को मंजूर की गई धार्मिक गतिविधियों से बाहर रखते हैं। इसके अलावा, ‘मुख्य पदाधिकारी’ का दायरा बड़ा किया गया है, और जिन संस्थाओं के नेतृत्व में विदेशी नागरिक शामिल हैं, उन पर नई पाबंदियां लगाई गई हैं। साथ ही विदेशी फंड के इस्तेमाल के लिए एक न्यूनतम सीमा तय की गई है, और सरकार से विशेष अनुमति लेकर फंड पाने वाली संस्थाओं की जांच-पड़ताल को और सख्त कर दिया गया है। कुल मिलाकर ये बदलाव इस बात पर सरकारी नियंत्रण को काफी बढ़ा देते हैं कि विदेशी फंड का इस्तेमाल कैसे, कहाँ और किस काम के लिए किया जा सकता है।
धर्म परिवर्तन का खास जिक्र क्यों?
नए नियमों की सूची की सबसे बड़ी खासियत यह है कि धार्मिक गतिविधियों से जुड़े हर मामले में बार-बार ‘धर्म परिवर्तन को छोड़कर’ वाक्य का इस्तेमाल किया गया है। हालांकि 2011 के नियमों में कई तरह की धार्मिक गतिविधियों को मंजूरी दी गई थी, लेकिन उनमें ‘धर्म परिवर्तन’ का सीधे तौर पर कोई जिक्र नहीं था। नई व्यवस्था धार्मिक शिक्षा, धार्मिक अध्ययन, धार्मिक परंपराओं के संरक्षण और धार्मिक सभाओं जैसे कामों की इजाजत तो देती है, लेकिन धर्म परिवर्तन कराने के उद्देश्य से किए जाने वाले कामों को साफ तौर पर बाहर रखती है।
इसके पीछे का कानूनी संदर्भ भी बहुत महत्वपूर्ण है। संविधान का अनुच्छेद 25 धर्म को मानने, उसका आचरण करने और उसका प्रचार करने के अधिकार की गारंटी देता है। लेकिन ‘रेवरेंड स्टेनिसलॉस बनाम मध्य प्रदेश राज्य’ (1977) के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने यह फैसला दिया था कि धर्म के प्रचार के अधिकार में किसी दूसरे व्यक्ति का धर्म परिवर्तन कराने का अधिकार शामिल नहीं है।
धर्म परिवर्तन को साफ तौर पर बाहर रखकर केंद्र सरकार यह संदेश दे रही है कि विदेशी फंड का इस्तेमाल धार्मिक और आस्था से जुड़े कामों के लिए तो हो सकता है, लेकिन धर्म परिवर्तन कराने वाले कामों के लिए बिल्कुल नहीं। यह कदम संघ परिवार और बीजेपी की वैचारिक सोच से भी मेल खाता है। संघ परिवार के भीतर लंबे समय से यह चिंता रही है कि विदेशी फंडिंग पाने वाले कुछ संगठन देश में धर्म परिवर्तन के कामों में शामिल हैं।
लगातार धर्म परिवर्तन के मामले में हुई कार्रवाई
सत्ता में आने के बाद से नरेंद्र मोदी सरकार पर धर्म परिवर्तन के संदेह में FCRA नियमों के तहत ईसाई संगठनों को निशाना बनाने के आरोप लगते रहे हैं। ‘मिशनरीज ऑफ चैरिटी’, ‘कंपैशन इंटरनेशनल’, ‘वर्ल्ड विज़न इंडिया’, ‘इवेंजेलिकल फेलोशिप ऑफ इंडिया’ और ‘चर्च ऑफ नॉर्थ इंडिया’ से जुड़ी संस्थाओं समेत कई ईसाई संस्थानों को FCRA के तहत कार्रवाई का सामना करना पड़ा है। हालांकि, सरकार का हमेशा यह कहना रहा है कि ये कार्रवाइयां FCRA के नियमों के सीधे उल्लंघन के आधार पर की गईं, लेकिन इनमें से कई कार्रवाइयाँ संघ से जुड़े संगठनों द्वारा धर्म परिवर्तन में शामिल होने के आरोपों वाले अभियानों के बाद हुईं।
दिसंबर 2021 में केंद्रीय गृह मंत्रालय ने मदर टेरेसा द्वारा स्थापित ‘मिशनरीज ऑफ चैरिटी’ के FCRA रजिस्ट्रेशन को रिन्यू (नवीनीकरण) करने से इनकार कर दिया था। इसके लिए गृह मंत्रालय ने प्रतिकूल रिपोर्टों और पात्रता शर्तों को पूरा न करने का हवाला दिया था। यह फैसला हिंदू राष्ट्रवादी संगठनों के उन लंबे समय से चले आ रहे आरोपों के बीच आया था, जिनमें कहा गया था कि इस संस्था द्वारा चलाए जा रहे कुछ संस्थान धर्म परिवर्तन के कामों में शामिल थे।
संशोधनों (बदलावों) के पीछे सरकार का तर्क
सरकार का कहना है कि इन बदलावों का मुख्य उद्देश्य विदेशी फंडिंग पर सरकारी निगरानी को मजबूत करना, नियमों के पालन में रहने वाली कमियों को दूर करना और यह देखना है कि विदेशी पैसे का इस्तेमाल कैसे हो रहा है। इसके अलावा सरकारी अधिकारियों का तर्क है कि पुराना ढांचा यह ठीक से ट्रैक नहीं कर पाता था कि पैसे का इस्तेमाल मंजूर किए गए कामों के लिए या तय इलाकों में ही हो रहा है या नहीं। नई व्यवस्था काम के हिसाब से रजिस्ट्रेशन, इलाके की पाबंदी, ज्यादा जानकारियां मांगने और सख्त रिपोर्टिंग नियमों के जरिए इसी कमी को दूर करना चाहती है।
इसके अलावा नए सख्त नियमों को लेकर तर्क ये भी है कि गृह मंत्रालय के सूत्रों ने यह भी बताया कि जब किसी संगठन का FCRA रजिस्ट्रेशन खत्म, रद्द या सरेंडर हो जाता है, तो विदेशी पैसे से बनाई गई संपत्तियों को संभालने के लिए और ज्यादा मजबूत नियमों की ज़रूरत थी। वहीं, फंड के गलत इस्तेमाल पर चिंता जताई गई है। पिछले कुछ सालों में सरकार द्वारा जारी चेतावनियों में बार-बार विदेशी फंडिंग के दुरुपयोग को लेकर चिंता जताई गई थी। इसमें यह भी शामिल था कि इस पैसे का इस्तेमाल मंजूर किए गए कामों से अलग गतिविधियों और धर्म परिवर्तन के मामलों में किया जा रहा था।
एनजीओ के लिए अपने कामों की विस्तृत रिपोर्ट देना, सोशल मीडिया अकाउंट्स की जानकारी शेयर करना और बिचौलिए संगठनों या फंड देने वाली संस्थाओं के पीछे छिपे ‘असली डोनर’ की पहचान उजागर करने का नियम इसलिए बनाया गया है, ताकि उन कमियों को दूर किया जा सके जिनकी वजह से पैसे के लेन-देन के रास्तों और प्रभाव डालने वाले नेटवर्कों को ट्रैक करना मुश्किल होता था।
प्रवर्तन निदेशालय (ED) ने बेंगलुरु में एक अमेरिका से संचालित ईसाई मिशनरी संगठन और सात लोगों के खिलाफ़ पुलिस केस दर्ज करवाया है। संगठन पर आरोप है कि इसने 92.55 करोड़ रुपये से ज़्यादा का गैर-कानूनी विदेशी फंड भारत में भेजा है। कहा जा रहा है कि इसका एक हिस्सा छत्तीसगढ़ और असम के माओवाद प्रभावित इलाकों में भी पहुंचा है।









