जैसलमेर: रक्षा क्षेत्र में स्वदेशी तकनीक को मजबूती देने की दिशा में एक महत्वपूर्ण उपलब्धि हासिल करते हुए निबे ग्रुप (Nibe Group) ने अपने लोइटरिंग म्यूनिशन ‘वायु अस्त्र-1’ का सफल प्रदर्शन किया है. कंपनी की ओर से 18 और 19 अप्रैल 2026 को राजस्थान के पोखरण फायरिंग रेंज तथा 26 और 27 अप्रैल को उत्तराखंड के जोशीमठ (मलारी) क्षेत्र में नो-कॉस्ट, नो-कमिटमेंट (NCNC) डेमो आयोजित किया गया, जिसमें प्रणाली ने सभी निर्धारित मानकों पर उत्कृष्ट प्रदर्शन किया.
100 किलोमीटर दूर लक्ष्य पर सटीक प्रहार : वायु अस्त्र-1 एंटी-पर्सनल लोइटरिंग म्यूनिशन ने पोखरण रेंज में 10 किलोग्राम वॉरहेड के साथ पहली ही कोशिश में 100 किलोमीटर दूर स्थित लक्ष्य को सफलतापूर्वक भेद दिया. परीक्षण के दौरान इसका सर्कुलर एरर प्रोबेबल (CEP) एक मीटर से भी कम रहा, जो इसकी उच्च सटीकता को दर्शाता है. विशेष बात यह रही कि प्रणाली में ‘अबॉर्ट अटैक’ और ‘री-अटैक’ की क्षमता का भी सफल प्रदर्शन किया गया, जिससे मिशन के दौरान लक्ष्य बदलने अथवा पुनः हमला करने की क्षमता सिद्ध हुई.
रात में एंटी-टैंक हमला भी रहा सफल : पोखरण परीक्षण के दौरान वायु अस्त्र-1 की एंटी-आर्मर (एंटी-टैंक) क्षमता का भी रात्रिकालीन परीक्षण किया गया. इंफ्रारेड (IR) कैमरे की सहायता से संचालित इस मिशन में लोइटरिंग म्यूनिशन ने एक ही प्रयास में लक्ष्य को दो मीटर CEP के भीतर सटीकता से नष्ट किया. इसके अलावा ग्राउंड कंट्रोल स्टेशन से लगभग 70 किलोमीटर दूर स्थित फॉरवर्ड कंट्रोल सेगमेंट को नियंत्रण हस्तांतरण की क्षमता भी सफलतापूर्वक प्रदर्शित की गई.
ऊंचाई वाले क्षेत्र में 90 मिनट से अधिक उड़ान : उत्तराखंड के जोशीमठ (मलारी) क्षेत्र में किए गए परीक्षणों के दौरान वायु अस्त्र-1 ने उच्च हिमालयी परिस्थितियों में अपनी क्षमता साबित की. लोइटरिंग म्यूनिशन ने 14 हजार फीट से अधिक ऊंचाई पर 90 मिनट से ज्यादा समय तक उड़ान और निगरानी की. मिशन पूरा होने के बाद प्रणाली को सुरक्षित रूप से रिकवर कर लिया गया, जिससे इसके पुनः उपयोग योग्य होने की क्षमता भी प्रमाणित हुई.
आधुनिक युद्ध आवश्यकताओं के अनुरूप प्रणाली : कंपनी का कहना है कि वायु अस्त्र-1 आधुनिक युद्धक्षेत्र की आवश्यकताओं को ध्यान में रखकर विकसित किया गया है. लंबी दूरी, अत्यधिक सटीक प्रहार, लक्ष्य की निगरानी, रात्रिकालीन ऑपरेशन तथा नियंत्रण हस्तांतरण जैसी विशेषताएं इसे सैन्य अभियानों के लिए उपयोगी बनाती हैं. पोखरण और जोशीमठ में हुए सफल परीक्षणों के बाद यह प्रणाली भारतीय रक्षा क्षेत्र के लिए एक महत्वपूर्ण विकल्प के रूप में उभर सकती है.










