लखनऊ: उत्तर प्रदेश में पिछले पांच वर्षों के दौरान एटीएस (ATS) और पुलिस की कार्रवाई ने एक ऐसे खतरनाक पैटर्न का पर्दाफाश किया है, जो सुरक्षा तंत्र के लिए नई चुनौती बन गया है। अब आतंकी और कट्टरपंथी संगठन सीधे हमले के बजाय ‘स्लो पॉइजनिंग’ यानी धीरे-धीरे ब्रेनवॉश करने की रणनीति पर काम कर रहे हैं, जिसमें ‘हिंदू चेहरों’ को मोहरा बनाकर धर्मांतरण से लेकर टेरर मॉड्यूल तक का एक पूरा चक्र तैयार किया जा रहा है।
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सुरक्षा एजेंसियों की जांच में सबसे चौंकाने वाला तथ्य यह आया है कि आतंकी नेटवर्क अब अपनी पहचान छिपाने के लिए हिंदू नामों वाले युवाओं का इस्तेमाल कर रहे हैं, जिसकी ताजा मिसाल हाल ही में पकड़े गए दो अलग-अलग मॉड्यूल हैं। इनमें से एक मामले में तुषार नामक युवक हिजबुल्लाह की पहचान के साथ सक्रिय पाया गया, वहीं बाराबंकी का कृष्णा मिश्रा आईएसआई (ISI) से जुड़कर आतंकी साजिशें रच रहा था। इसी तरह विकास गहलावत और पपला पंडित जैसे आरोपित पाकिस्तानी हैंडलर्स के इशारों पर वारदातों को अंजाम दे रहे थे।
यह पूरा खेल धर्मांतरण के एक ‘कॉर्पोरेट मॉडल’ की तरह काम करता है, जिसकी नींव साल 2021 में उजागर हुए देश के सबसे बड़े धर्मांतरण सिंडिकेट के दौरान देखी गई थी। जब उमर गौतम और मुफ्ती काजी जहांगीर आलम कासमी की गिरफ्तारी हुई, तो यह साफ हुआ कि कैसे ‘इस्लामिक दावा सेंटर’ के नाम पर मूक-बधिर छात्रों और आर्थिक रूप से कमजोर लोगों को नौकरी, पैसे और शादी का लालच देकर शिकार बनाया गया। इसी कड़ी में मौलाना कलीम सिद्दीकी की गिरफ्तारी हुई, जो कथित तौर पर ट्रस्ट और एनजीओ के जरिए करोड़ों की विदेशी फंडिंग का नेटवर्क चला रहा था।
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जांच में जलालुद्दीन उर्फ छांगुर का नाम भी प्रमुखता से उभरा, जिसने विदेश से आए नीतू और नवीन वोहरा का धर्मांतरण करवाने के बाद उन्हें ही ‘फेस’ बनाकर विदेशी फंडिंग के जरिए बड़े पैमाने पर इस नेटवर्क को आगे बढ़ाया। वर्ष 2025 में बलरामपुर और आगरा से सामने आए मामले इसी खतरनाक मॉडल का हिस्सा माने जा रहे हैं, जहां दो बहनों के लापता होने की जांच में रेडिकलाइजेशन, हथियारों के साथ सोशल मीडिया पर तस्वीरें और अमेरिका-कनाडा से फंडिंग के सुराग मिले हैं।
जांच एजेंसियों के अनुसार, यह नेटवर्क एक ‘तीन-स्तरीय रणनीति’ पर काम करता है जिसमें सबसे पहले टेलीग्राम, सिग्नल और इंस्टाग्राम जैसे प्लेटफॉर्म के जरिए पाकिस्तानी हैंडलर्स युवाओं से भावनात्मक और डिजिटल संपर्क साधते हैं। इसके बाद कट्टरपंथी वीडियो दिखाकर उनका ब्रेनवॉश किया जाता है और दूसरे स्तर पर उन्हें मोटी रकम, फर्जी पासपोर्ट या विदेश में सेटल कराने का लालच देकर आर्थिक और मानसिक जाल में फंसाया जाता है।
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अंतिम चरण में उन्हें कट्टर विचारधारा के प्रसार और आतंकी साजिशों की जमीन तैयार करने के लिए इस्तेमाल किया जाता है। एटीएस के वरिष्ठ अधिकारियों का मानना है कि यह मॉडल भविष्य की आतंकी साजिशों के लिए बेहद घातक है। वर्तमान में सुरक्षा एजेंसियां डेटा रिकवरी और सोशल मीडिया चैट्स के आधार पर इस नेटवर्क से जुड़े अन्य संदिग्धों की तलाश कर रही हैं और जल्द ही इस मामले में कई और बड़ी गिरफ्तारियां होने की संभावना है।










