लखनऊ। उत्तर प्रदेश के किसानों के लिए बड़ी खुशखबरी है। प्रदेश में स्मार्ट कृषि को बढ़ाने के लिए प्रत्येक जिले में ड्रोन बैंक खोले जाएंगे। इन ड्रोन बैंकों के संचालन की जिम्मेदारी एग्री जंक्शन और एफपीओ के पास होगी। कोई भी किसान कीटनाशक और लिक्विड उर्वरकों के छिड़काव के लिए इन बैंकों से ड्रोन किराए पर लेकर इसका इस्तेमाल कर सकेंगे।
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50 फीसदी मिलेगा अनुदान
विश्व बैंक़ पोषित योजना यूपी एग्रीज के सहयोग से राज्य सरकार इन ड्रोन बैंकों को 50 फीसदी अनुदान पर ड्रोन उपलब्ध कराएगी। किसानों के अनुरोध करने व तय किराया जमा करने के बाद ड्रोन बैंक के ड्रोन संचालक किसानों के खेतों में ड्रोन से तरल उर्वरक और कीटनाशकों का छिड़काव करेंगे।
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राज्य सरकार खेती की लागत को कम करने के लिए नई तकनीकों पर काम कर रही है। इसके तहत जो भी चीज किसानों के लिए लाभकारी है, उसे बढ़ावा दिया जा रहा है। इसके लिए प्रदेश के प्रत्येक जिले में ड्रोन बैंक़ खोलने की कार्य योजना तैयार की गई है। यूपी एग्रीज योजना (उत्तर प्रदेश कृषि विकास और ग्रामीण उद्यम पारिस्थितिकी तंत्र सुदृढ़ीकरण परियोजना) इसके लिए आर्थिक सहयोग के लिए सहमत हो गया है। जल्द ही इस कार्ययोजना को क्रियान्वित किया जाएगा।
चूंकि महंगी तकनीक होने के कारण 90 फीसदी से अधिक किसान ड्रोन खरीदने में सक्षम नहीं है। ऐसे में सरकार ने उन्हें ड्रोन के उपयोग का नया रास्ता दिखाया है। इससे किसानों द्वारा मानव श्रम की जगह ड्रोन के इस्तेमाल करने पर खर्च कम आएगा और लागत कुशल और पर्यावरण के अनुकूल होने के कारण ड्रोन तकनीक खेती और बागवानी को स्मार्ट बनाएगा।
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अनाज से लेकर सब्जी और फूलों की खेती में खूब है सफल
धान-गेहूं हों या दलहन-तिलहन, कम ऊंचाई वाली फसलों के लिए ड्रोन का प्रयोग काफी सफल रहा है। यही स्थिति सब्जियों और फूलों की खेती में भी है। ड्रोन के प्रयोग से सब्जियों के साथ-साथ गेंदा, गुलाब जैसे फूलों की खेती में ड्रोन ने क्रांति ला दी है। बहुत ही कम पानी में यह आसानी से बहुत ही कम समय में उर्वरक एवं कीटनाशकों का छिड़काव कर देता है। कम ऊंचाई वाले बागों मसलन अमरूद, अनार, अंगूर आदि में यह अपनी सफलता के झंडे गाड़ रहा है। पानी के संकट वाले क्षेत्रों में इसके माध्यम से खेती की तस्वीर तेजी से बदल रही है। इससे बीजों की बुआई और पौध रोपण भी खूब हो रहे हैं।
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मिट्टी के स्वास्थ्य की भी करता है निगरानी
ड्रोन का उपयोग मृदा स्वास्थ्य और खेतों की स्थिति की निगरानी के कार्य मसलन फील्ड मॉनिटरिंग में भी किया जा रहा है। यह जल निकासी पैटर्न और गीले व सूखे स्थानों को निर्धारित करने में भी उपयोगी है। इससे मिट्टी में मौजूद नाइट्रोजन के स्तर की भी निगरानी की जाती है। यही नहीं आवारा पशुओं की निगरानी में भी इसका प्रयोग किया जाने लगा है।











