नई दिल्ली। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने किर्गिस्तान की राजधानी बिश्केक में ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेजेश्कियान से मुलाकात की है. दोनों नेताओं की यह मुलाकात शंघाई सहयोग संगठन यानी एससीओ शिखर सम्मेलन से इतर हुई. ईरान के साथ युद्ध शुरू होने के बाद दोनों नेताओं की यह पहली आमने-सामने की मुलाकात है. इस मीटिंग के बारे में आधिकारिक तौर पर यही कहा गया कि दोनों नेताओं ने द्विपक्षीय संबंधों की मौजूदा स्थिति की समीक्षा की.
भारत और ईरान के बीच साझा हित वाले क्षेत्रों में सहयोग को और मजबूत करने पर चर्चा हुई. लेकिन, यह मुलाकात ऐसे समय हुई है जब पश्चिम एशिया में तनाव बेहद ज्यादा है. करीब एक महीने के ठहराव के बाद सोमवार को फिर अमेरिका और ईरान ने एक दूसरे के ठिकानों पर हमले के दावे किए. ऐसे में मोदी और पेजेश्कियान की बातचीत सिर्फ दो देशों के रिश्तों तक सीमित नहीं है. इसके पीछे भारत के कई बड़े रणनीतिक हित जुड़े हैं.
क्यों अहम है मुलाकात?
भारत के लिए ईरान पश्चिम एशिया का एक अहम साझेदार है. दोनों देशों के बीच पुराने कारोबारी और रणनीतिक रिश्ते हैं. लेकिन अमेरिकी प्रतिबंधों और क्षेत्रीय तनाव के कारण इन रिश्तों पर लगातार दबाव रहा है. अब हालात और जटिल हो गए हैं. अमेरिका और ईरान के बीच संघर्ष का सीधा असर खाड़ी क्षेत्र पर पड़ता है. सबसे बड़ा खतरा ऊर्जा आपूर्ति पर है. दुनिया के बड़े तेल और गैस आपूर्ति मार्ग यानी होर्मुज स्ट्रेट इसी इलाके से गुजरते हैं. भारत खाड़ी देशों से बड़ी मात्रा में कच्चा तेल खरीदता है. ये तेल होर्मुज के रास्ते ही भारत आते हैं. ऐसे में ईरान के शीर्ष नेतृत्व के साथ सीधे संपर्क में रहना भारत के लिए बेहद जरूरी है.
चाबहार बंदरगाह
भारत और ईरान के रिश्तों में चाबहार बंदरगाह की सबसे अहम भूमिका है. ईरान के दक्षिण-पूर्वी हिस्से में मौजूद चाबहार भारत को पाकिस्तान को दरकिनार करके अफगानिस्तान और मध्य एशिया तक पहुंच देता है. यही वजह है कि भारत लंबे समय से चाबहार परियोजना में निवेश कर रहा है. अगर पाकिस्तान के रास्ते मध्य एशिया जाना मुश्किल है तो चाबहार भारत के लिए वैकल्पिक रास्ता बनता है. यहां से भारत अफगानिस्तान होते हुए मध्य एशियाई देशों तक अपने व्यापारिक संपर्क बढ़ा सकता है. भारत के लिए यह सिर्फ व्यापार का रास्ता नहीं है. यह उसकी मध्य एशिया नीति का भी महत्वपूर्ण हिस्सा है.
ईरान का महत्व उसके भौगोलिक स्थान से भी समझा जा सकता है. एक तरफ ईरान फारस की खाड़ी के करीब है. दूसरी तरफ वह मध्य एशिया और अफगानिस्तान के रास्ते भारत को यूरेशिया से जोड़ता है. भारत लगातार मध्य एशियाई देशों के साथ अपने रिश्ते मजबूत कर रहा है. हाल के वर्षों में उज्बेकिस्तान, कजाकिस्तान और दूसरे देशों के साथ भारत की सक्रियता बढ़ी है. ऐसे में ईरान भारत के लिए एक कड़ी की तरह काम करता है. यही वजह है कि पश्चिम एशिया में कोई बड़ा संकट भारत के लिए सिर्फ तेल का संकट नहीं होता. इसका असर भारत की मध्य एशिया तक पहुंच और व्यापारिक गलियारों पर भी पड़ सकता है.
पेजेश्कियान का रुख
ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेजेश्कियान ने लगातार बातचीत के जरिए संघर्ष खत्म करने की वकालत की है. उनका कहना है कि ईरान युद्ध नहीं चाहता. लेकिन अगर उस पर हमला होता है तो वह जवाब देगा. यानी तेहरान एक तरफ बातचीत का रास्ता खुला रखना चाहता है. दूसरी तरफ अपनी सुरक्षा को लेकर सख्त रुख भी अपना रहा है. भारत की नीति भी लंबे समय से यही रही है कि क्षेत्रीय विवादों का समाधान बातचीत और कूटनीति से होना चाहिए. इसलिए दोनों नेताओं की बातचीत में पश्चिम एशिया की स्थिति पर चर्चा होना स्वाभाविक था.
भारत किस तरह संतुलन साध रहा
यह मुलाकात भारत की विदेश नीति के एक बड़े पहलू को भी दिखाती है. भारत अमेरिका का रणनीतिक साझेदार है. रूस के साथ भी उसके पुराने और मजबूत रिश्ते हैं. दूसरी तरफ ईरान के साथ भी भारत अपने संबंध बनाए रखना चाहता है. यानी भारत किसी एक खेमे में बंधकर अपनी विदेश नीति नहीं चलाना चाहता. अमेरिका और ईरान के बीच तनाव के बावजूद मोदी और पेजेश्कियान की बातचीत इसी रणनीतिक स्वतंत्रता का संकेत है.
होर्मुज की चिंता
भारत के लिए सबसे बड़ी चिंता समुद्री व्यापार और ऊर्जा आपूर्ति को लेकर है. फारस की खाड़ी से निकलने वाले तेल और गैस का बड़ा हिस्सा होर्मुज स्ट्रेट से होकर गुजरता है. संघर्ष के कारण यहां जहाजों की आवाजाही प्रभावित हुई है. इसका असर वैश्विक ऊर्जा बाजार पर पड़ा है. तेल की कीमत बढ़ गई है. जहाजों के बीमा और परिवहन लागत बढ़ गई है. इससे भारत का आयात बिल भी बढ़ गया है. यानी ईरान और अमेरिका के बीच संघर्ष जितना लंबा चलेगा, भारत के लिए जोखिम उतना ही बढ़ेगा. इसीलिए भारत के लिए तेहरान के साथ सीधा संवाद बनाए रखना बेहद जरूरी है.












