नई दिल्ली। भारत की पहली हाइड्रोजन से चलने वाली ट्रेन ने संचालन शुरू होने के कुछ ही दिनों में एक बड़ी उपलब्धि हासिल की है. भारतीय रेलवे के मुताबिक, ये हाइड्रोजन ट्रेन अब तक करीब 6,000 किलोमीटर का सफर तय कर चुकी है. इस दौरान अनुमानित 36,444 किलोग्राम यानी करीब 36 टन कार्बन डाइऑक्साइड (CO₂) उत्सर्जन में कमी आई है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पिछले महीने देश की पहली हाइड्रोजन ट्रेन को हरी झंडी दिखाई थी. ये ट्रेन हरियाणा के जींद से सोनीपत के बीच संचालित हो रही है.
ट्रेन में कुल 10 कोच हैं और इसमें करीब 2,600 यात्री सफर कर सकते हैं. इसकी अधिकतम परिचालन गति 75 किलोमीटर प्रति घंटा है, जबकि इसे 110 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार तक चलने के लिए डिजाइन किया गया है.
पानी की भाप के अलावा नहीं निकलता प्रदूषण
हाइड्रोजन ट्रेन की सबसे बड़ी खासियत इसका पर्यावरण अनुकूल संचालन है. ट्रेन में लगे हाइड्रोजन फ्यूल सेल हाइड्रोजन और ऑक्सीजन को मिलाकर बिजली पैदा करते हैं. ट्रेन के संचालन के दौरान पारंपरिक डीजल इंजन की तरह कार्बन उत्सर्जन नहीं होता. भारतीय रेलवे के मुताबिक, एक सामान्य DEMU ट्रेन प्रति किलोमीटर करीब 6.074 किलोग्राम CO₂ समकक्ष उत्सर्जन करती है. हाइड्रोजन ट्रेन के संचालन से अब तक इसी आधार पर करीब 36,444 किलोग्राम CO₂ उत्सर्जन की बचत का अनुमान लगाया गया है.
दुनिया की सबसे शक्तिशाली हाइड्रोजन ट्रेनों में शामिल
भारत की हाइड्रोजन ट्रेन कई मायनों में खास है। जहां दुनिया की अधिकांश हाइड्रोजन ट्रेनों में दो या तीन यात्री कोच होते हैं. वहीं, भारत की ट्रेन में 10 कोच हैं. इसे दुनिया की सबसे लंबी परिचालन हाइड्रोजन ट्रेन भी बताया जा रहा है. ट्रेन में करीब 3,200 हॉर्सपावर (HP) का प्रोपल्शन सिस्टम लगाया गया है, जिससे यह दुनिया की सबसे शक्तिशाली हाइड्रोजन ट्रेन के रूप में पहचान बना रही है.
भारत ने गिने-चुने देशों की लिस्ट में बनाई जगह
हाइड्रोजन से चलने वाली यात्री ट्रेनों का संचालन अभी दुनिया के सीमित देशों में ही हो रहा है. जर्मनी ने सबसे पहले व्यावसायिक यात्री सेवा के लिए हाइड्रोजन ट्रेन शुरू की थी. चीन भी इस तकनीक को अपना चुका है. भारत के अलावा फ्रांस और इटली में भी हाइड्रोजन ट्रेन सेवाओं को आगे बढ़ाया जा रहा है, जबकि जापान, अमेरिका, ब्रिटेन और दक्षिण कोरिया में यह तकनीक मुख्य रूप से परीक्षण या प्रदर्शन के चरण में है.
दूरदराज और विरासत मार्गों के लिए उपयोगी
भारत में रेलवे नेटवर्क का करीब 99 प्रतिशत हिस्सा पहले ही इलेक्ट्रिक हो चुका है. ऐसे में हाइड्रोजन ट्रेन का इस्तेमाल खास तौर पर उन मार्गों पर किया जा सकता है, जहां विद्युतीकरण करना मुश्किल या महंगा है. भविष्य में कालका-शिमला जैसे पहाड़ी और विरासत मार्गों पर भी हाइड्रोजन ट्रेन को पर्यावरण के अनुकूल परिवहन विकल्प के तौर पर इस्तेमाल करने की संभावनाएं देखी जा सकती हैं.
देश में ही तैयार हुई ट्रेन
इस परियोजना की एक और खासियत यह है कि ट्रेन की डिजाइन, इंजीनियरिंग और एकीकरण का काम भारत में ही किया गया है. RDSO, ICF और Medha ने मिलकर इसके निर्माण और परीक्षण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है. ट्रेन के लिए जींद में स्वदेशी तकनीक से हाइड्रोजन स्टोरेज और रिफ्यूलिंग सुविधा भी विकसित की गई है.
किराया नहीं बढ़ाया गया
हाइड्रोजन ट्रेन की शुरुआत के बावजूद यात्रियों पर अतिरिक्त किराये का बोझ नहीं डाला गया है. ट्रेन का किराया सामान्य DEMU सेवाओं के समान रखा गया है. ये 10 रुपये से 25 रुपये के बीच है. भारतीय रेलवे के नेट-जीरो उत्सर्जन लक्ष्य की दिशा में हाइड्रोजन ट्रेन को एक महत्वपूर्ण तकनीकी कदम माना जा रहा है. हालांकि, शुरुआती दौर में इसका योगदान सीमित रहेगा. लेकिन, इसके सफल संचालन से भारत में स्वच्छ और टिकाऊ रेल परिवहन की संभावनाओं को मजबूती मिली है.












