नई दिल्ली। भारत ने एशिया के पावर बैलेंस को बदलने के लिए एक मास्टरस्ट्रोक खेला है! दो देशों के साथ मिलकर शुरू किया गया IMT प्रोजेक्ट भारत का ऐसा प्लान है, जो एक तीर से पूरे 6 निशाने साधेगा. सबसे बड़ी बात ये है कि ये प्रोजेक्ट सेंसेटिव ‘चिकन नेक’ इलाके के लिए एक पावरफुल भाई की तरह काम करेगा. करीब 1,360 किलोमीटर लंबा ये मेगा प्रोजेक्ट भारत की कई बड़ी-बड़ी मुश्किलों को चुटकी में हल करने का दम रखता है.
क्या है भारत का 6 निशाने वाला मास्टरस्ट्रोक?
जब बात बॉर्डर सिक्योरिटी और इंटरनेशन ट्रेड को मजबूत करने की आती है तो भारत अब सिर्फ डिफेंस का खेल नहीं खेलता, बल्कि फ्रंट-फुट पर आकर मास्टरस्ट्रोक लगाता है. ऐसा ही एक बड़ा मास्टरस्ट्रोक है- ‘भारत-म्यांमार-थाईलैंड (IMT) त्रिपक्षीय राजमार्ग’.
करीब 1,360 किलोमीटर लंबा यह मेगा प्रोजेक्ट कोई साधारण सड़क या नेशनल हाईवे नहीं है. ये भारत का एक ऐसा ड्रीम प्रोजेक्ट है, जो पूर्वोत्तर के सबसे नाजुक हिस्से ‘चिकन नेक’ को एक पावरफुल ‘भाई’ देने वाला है. इसके चालू होते ही मुख्य भारत का जमीनी रास्ता सीधे दक्षिण-पूर्व एशिया (ASEAN) के देशों से जुड़ जाएगा. इस एक मेगा कॉरिडोर के जरिए भारत ने एक साथ 6 बड़े अंतरराष्ट्रीय निशाने साध लिए हैं.
कैसे बनाया जा रहा है IMT त्रिपक्षीय राजमार्ग?
IMT Trilateral Highway एक 1,360 किलोमीटर लंबा फोर-लेन रोड कॉरिडोर है. इसका रूट बहुत ही रणनीतिक तरीके से तय किया गया है.
शुरुआती पॉइंट: ये हाईवे भारत के मणिपुर राज्य में स्थित सीमावर्ती शहर ‘मोरे’ से शुरू होता है.
म्यांमार का सफर: सीमा पार करते ही ये म्यांमार के तमू, कलेवा, मंडाले और राजधानी नेपीडॉ से होकर गुजरता है.
थाईलैंड में एंट्री: म्यांमार के बड़े शहरों को लांघते हुए ये सड़क सीधे थाईलैंड के ‘मे सोत’ शहर में प्रवेश करती है. मे सोत पहुंचते ही यह थाईलैंड के बेहतरीन और विशाल हाईवे नेटवर्क से जुड़ जाता है.
इस कॉरिडोर की बात सबसे पहले साल 2002 में पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के समय शुरू हुई थी. तब उम्मीद थी कि यह 2015 तक बनकर तैयार हो जाएगा. लेकिन म्यांमार के मुश्किल रास्तों, पैसों की तंगी और वहां हाल ही में हुए तख्तापलट की वजह से इसकी डेडलाइन बार-बार आगे बढ़ती गई. अब भारत सरकार ने इसे 2027 तक हर हाल में चालू करने का नया टारगेट सेट किया है.
चिकन नेक को कैसे मिलेगा पावरफुल ‘भाई’?
पश्चिम बंगाल के सिलीगुड़ी में मौजूद ‘सिलीगुड़ी कॉरिडोर’ को ‘चिकन नेक’ भी कहा जाता है. ये महज 20-22 किलोमीटर चौड़ी एक बेहद संकरी पट्टी है, जो पूरे भारत को आठ पूर्वोत्तर राज्यों से जोड़ती है. सुरक्षा के नजरिए से ये इलाका हमेशा से भारत की सबसे बड़ी चिंता रहा है, क्योंकि चीन की चुंबी घाटी इसके काफी करीब है. अगर युद्ध या संकट के समय दुश्मन इस 20 किलोमीटर के हिस्से को ब्लॉक कर दे तो पूर्वोत्तर भारत का संपर्क मुख्य देश से पूरी तरह कट सकता है. लेकिन IMT हाईवे इस चिकन नेक के लिए एक मजबूत ढाल और ‘पावरफुल भाई’ की तरह सामने आया है.
सप्लाई गेट का विस्तार: दिल्ली, कोलकाता या मुंबई से चलकर थाईलैंड जाने वाला कोई भी व्यापारिक ट्रक चिकन नेक से गुजरेगा, लेकिन अब वह सिर्फ पूर्वोत्तर में खत्म नहीं होगा. वो मणिपुर के मोरे बॉर्डर से सीधे म्यांमार और थाईलैंड पहुंचेगा. इससे चिकन नेक सिर्फ एक सुरक्षा-संवेदनशील संकरा इलाका नहीं रहेगा, बल्कि पूरे एशिया के सबसे बड़े ‘ट्रांस-एशियन ट्रेड कॉरिडोर’ का मेन गेटवे बन जाएगा.
आर्थिक सुरक्षा की गारंटी: अब तक पूर्वोत्तर का इलाका मुख्य भारत पर निर्भर था लेकिन IMT हाईवे के बनने से पूर्वोत्तर खुद एक बड़ा ट्रेड हब बन जाएगा. इससे चिकन नेक पर सिर्फ सामान भेजने का दबाव कम होगा और पूरा क्षेत्र आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बनेगा.
भारत के एक तीर से लगे 6 बड़े निशाने
इस ड्रीम प्रोजेक्ट से भारत को सिर्फ एक सड़क नहीं मिल रही, बल्कि छह अलग-अलग मोर्चों पर बहुत बड़ी बढ़त मिलने वाली है.
म्यांमार के साथ मजबूत जमीनी संपर्क: भारत का पहला निशाना पड़ोसी म्यांमार है. म्यांमार, भारत के पूर्वोत्तर राज्यों का प्रवेश द्वार है. इस सड़क के बनने से म्यांमार के साथ हमारा सीधा जमीनी जुड़ाव होगा, जिससे सीमावर्ती इलाकों में उग्रवाद पर लगाम लगेगी और व्यापार को नई रफ्तार मिलेगी.
थाईलैंड और आसियान का सीधा रास्ता: थाईलैंड तक सीधी सड़क पहुंचने से भारत के लिए 10 आसियान देशों के दरवाजे खुल जाएंगे. भारत का सामान अब बिना किसी समुद्री देरी के सीधे थाईलैंड, कंबोडिया और वियतनाम के बाजारों में बिकने पहुंचेगा, जिससे ट्रांसपोर्ट और लॉजिस्टिक्स की लागत में भारी गिरावट आएगी.
बांग्लादेश से जुड़ने का मेगा प्लान: भारत इस हाईवे का दायरा सिर्फ तीन देशों तक सीमित नहीं रख रहा है. भविष्य में इसे बांग्लादेश से जोड़ने का प्रस्ताव है. अगर ऐसा होता है तो कोलकाता से त्रिपुरा और मेघालय जाने वाली गाड़ियों को चिकन नेक के लंबे रास्ते के बजाय बांग्लादेश से होकर निकाला जा सकेगा. ये चिकन नेक पर हमारी निर्भरता को आधा कर देगा.
नेपाल के लिए नया इकोनॉमिक कॉरिडोर: इस कॉरिडोर का अगला चरण नेपाल को जोड़ने का है. नेपाल जो अब तक पूरी तरह चारों तरफ से घिरा देश था, इस अंतरराष्ट्रीय सड़क के जरिए सीधे भारत और दक्षिण-पूर्व एशिया के बाजारों से अपने व्यापार को सुगम बना सकेगा.
भूटान को मिला बड़ा ट्रेड रूट: भारत का सबसे करीबी दोस्त भूटान भी इस बड़े ट्रांसपोर्ट नेटवर्क का हिस्सा बनेगा. भूटान का सामान सीधे भारत के पूर्वोत्तर से होता हुआ म्यांमार और थाईलैंड के बाजारों तक पहुंच सकेगा, जिससे भूटान की अर्थव्यवस्था को बहुत बड़ा सहारा मिलेगा.
चीन के CPEC को करारा जवाब: छठा और सबसे बड़ा रणनीतिक निशाना चीन है! चीन अपनी ‘बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव’ (BRI) और CPEC (चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारा) के जरिए पूरे एशिया पर अपना दबदबा कायम करना चाहता है. भारत का ये IMT प्रोजेक्ट चीन के उस दबदबे को सीधी चुनौती है. ये बिना किसी देश को कर्ज के जाल में फंसाए, एक पारदर्शी और मजबूत लोकतांत्रिक ट्रेड रूट तैयार कर रहा है.
म्यांमार का संकट और निर्माण की बड़ी चुनौतियां
हालांकि इस प्रोजेक्ट का करीब 70 फीसदी काम पूरा हो चुका है लेकिन बचे हुए 30 फीसदी काम को पूरा करने में कई पहाड़ जैसी चुनौतियां आ रही हैं.
म्यांमार में तख्तापलट और गृहयुद्ध: साल 2021 में म्यांमार की सेना ने वहां की चुनी हुई सरकार का तख्तापलट कर दिया. इसके बाद से वहां की जुंटा सरकार और स्थानीय बागी गुटों, पीडीएफ और एथनिक आर्म्ड ऑर्गेनाइजेशन के बीच भयानक हिंसक जंग जारी है.
खतरनाक जोन से गुजरता हाईवे: इस हाईवे का एक बहुत बड़ा हिस्सा म्यांमार के ‘चिन राज्य’ और ‘सगाइंग क्षेत्र’ से होकर गुजरता है. ये दोनों ही इलाके फिलहाल म्यांमार में जारी हिंसा के सबसे बड़े केंद्र हैं. यहां आए दिन गोलाबारी और बमबारी होती है, जिससे भारत के ठेकेदारों, इंजीनियरों और मजदूरों के लिए काम करना जान जोखिम में डालने जैसा हो गया है.
पुराने पुल और पहाड़ी इलाके: तमू-क्यीगोन-कलेवा मार्ग पर अंग्रेजों के जमाने के 69 पुराने लोहे के पुल हैं. भारत सरकार इन सभी पुलों को हटाकर नए आरसीसी ब्रिज बना रही है, लेकिन कागजी अड़चनों और युद्ध के हालातों की वजह से काम धीमा है. इसके अलावा कलेवा-यागी का इलाका बहुत ही खतरनाक और खड़ी पहाड़ियों वाला है, जहां भारी बारिश और भूस्खलन की वजह से काम में बार-बार रुकावट आती है.
मोटर वाहन समझौता (MVA): केवल सड़क बना देना काफी नहीं है. जब तक भारत, म्यांमार और थाईलैंड के बीच ‘त्रिपक्षीय मोटर वाहन समझौता’ (MVA) साइन नहीं होता, तब तक तीनों देशों की गाड़ियां बिना रोक-टोक के एक-दूसरे की सीमा में नहीं जा सकतीं. कस्टम ड्यूटी, वीजा नियम और सुरक्षा जांच पर अभी भी तीनों देशों के बीच बातचीत चल रही है.
पूर्वोत्तर भारत की बदल जाएगी पूरी तकदीर
तमाम सुरक्षा और भौगोलिक चुनौतियों के बावजूद, ये प्रोजेक्ट भारत की ‘एक्ट ईस्ट पॉलिसी’ का सबसे बड़ा मास्टरस्ट्रोक है.
अब तक असम, मणिपुर, नागालैंड, मिजोरम जैसे भारत के पूर्वोत्तर के राज्य भौगोलिक रूप से खुद को कटा हुआ महसूस करते थे. चारों तरफ से जमीनी सीमाओं से घिरे होने के कारण वहां बड़े उद्योग-धंधे नहीं लग पाते थे. लेकिन जैसे ही ये 1,360 किलोमीटर लंबा हाईवे पूरी तरह चालू होगा, पूर्वोत्तर भारत पूरे एशिया का सबसे बड़ा ‘ट्रेड एंड टूरिज्म हब’ बन जाएगा.
मणिपुर का मोरे शहर भारत का नया ‘बिजनेस का एंट्री पॉइंट’ कहलाएगा. स्थानीय किसानों के प्रोडक्ट्स, हस्तशिल्प और ऑर्गेनिक सामान कुछ ही घंटों में थाईलैंड और वियतनाम के बाजारों में बिक रहे होंगे.












