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UP : 2017 से 2022 तक यूपी की राजनीति में क्या बदला, 2027 के लिए क्यों अहम हैं ये 5 संकेत?

by National Agenda
July 7, 2026
in Politics, Uttar Pradesh
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नई दिल्ली। उत्तर प्रदेश में 2027 के विधानसभा चुनाव में अभी समय है. लेकिन सियासी पारा अभी से चढ़ने लगा है. हर दल अपने-अपने अंदाज में तैयारियों में जुट गया है. बीजेपी जहां अपनी सत्ता और संगठन की ताकत पर भरोसा जता रही है. वहीं समाजवादी पार्टी ‘PDA’ के फॉर्मूले से नई राह तलाश रही है. बीएसपी की खामोशी भी अपने आप में कई सवाल खड़े कर रही है. इसके साथ छोटे दल भी सही मौके की ताक में हैं.

अब बड़ा सवाल यही है कि 2027 की यह सियासी जंग आखिर किस जमीन पर लड़ी जाएगी?

आप सबको पता है कि 2017 से 2022 तक के सफर ने यूपी की राजनीति की तस्वीर पूरी तरह बदल दी है. जो जीत कल एक लहर लग रही थी, उसने आज अपनी जड़ें गहरी कर ली हैं. लेकिन, 2027 की राह 2022 जैसी नहीं होने वाली. इस बार मुद्दे भी नए होंगे, समीकरण भी बदलेंगे और मुकाबला भी और अधिक दिलचस्प होगा.

हमारी इस विशेष सीरीज ‘UP 2027: का कहत बा यूपी?’ के पहले भाग में आज हम उन पांच बड़े बदलावों पर बात करेंगे. जिन्हें समझे बिना 2027 की चुनावी बिसात को समझना नामुमकिन है.

2017 में बीजेपी ने राजनीति का पुराना ढांचा तोड़ दिया

आप सबको याद होगा कि यूपी में 2017 का चुनाव सिर्फ सरकार बदलने वाला चुनाव नहीं था. उसने यूपी की राजनीति का में इतिहास रचते हुए सभी को चौंका दिया था. उससे पहले यहां चुनावों को जातीय समीकरणों से पढ़ा जाता था. कौन किस जाति के साथ है, किसका मुस्लिम वोट पर असर है, किस इलाके में किस दल की पकड़ है. यही बड़ी बातें होती थीं. लेकिन बीजेपी ने 2017 के विधानसभा चुनाव में इस पूरी तस्वीर को ही बदल दिया था.

पार्टी ने हिंदुत्व, मजबूत नेतृत्व, कानून-व्यवस्था और संगठन का ऐसा गठजोड़ तैयार किया कि जब रिजल्ट आया तो सभी हैरान रह गए. जातीय समीकरण देखें तो बीजेपी ने गैर-यादव पिछड़ों और गैर-जाटव दलितों तक भी पहुंच बढ़ाई. यही उसकी सबसे बड़ी ताकत बनी. बीजेपी ने सिर्फ अपने पुराने वोट पर भरोसा नहीं किया, उसने नया सामाजिक आधार भी बनाया. यहीं से यूपी की राजनीति में एक नया फॉर्मूला मजबूत हुआ. सिर्फ जाति नहीं, बल्कि जाति के साथ बड़ा नैरेटिव, मजबूत संगठन और चुनावी मशीनरी. 2027 को समझने के लिए 2017 की यही बुनियाद सबसे पहले समझनी होगी.

2022 ने दिखाया कि बीजेपी का मॉडल एक चुनाव तक सीमित नहीं है

2022 का चुनाव बीजेपी के लिए आसान नहीं था. पांच साल की सरकार थी. बेरोजगारी, महंगाई, स्थानीय नाराजगी, किसानों का आंदोलन सब कुछ चर्चा में था. विपक्ष भी पहले के मुकाबले ज्यादा सक्रिय दिख रहा था. इसके बावजूद बीजेपी सत्ता में लौट आई. यहीं 2022 का सबसे बड़ा संदेश छिपा है. बीजेपी ने दिखाया कि 2017 की जीत सिर्फ माहौल की देन नहीं थी. उसने अपने वोट को संभालकर रखा भी. साथ ही प्रदेश में सुरक्षा, सरकारी योजानाओं, योगी के प्रति लोगों का प्रेम ये सारे समीकरण काम भी आए. साथ में संगठन तो बूथ से लेकर सत्ता की गद्दी तक पहुंचाने में हमेशा की तरह फिर काम आया. हालांकि बीजेपी को जीत तो मिल गई थी लेकिन जीत एकतरफा नहीं थी. बीजेपी की सीटें 2017 के मुकाबले घटीं हुई मिली. समाजवादी पार्टी ने अपनी स्थिति तो मजबूत की. कुलमिलाकर बीजेपी जीती जरूर, लेकिन विपक्ष गायब नहीं हुआ. यही बात 2027 को चुनाव में और भी रोमांच लाएगा.

2017 और 2022 के नतीजे क्या कहते हैं?

अगर आंकड़ों पर नजर डालें तो तस्वीर और साफ होती है. 2017 में बीजेपी और उसके सहयोगियों ने 325 सीटें जीती थीं. समाजवादी पार्टी 47 सीटों पर सिमट गई थी. बसपा को 19 और कांग्रेस को 7 सीटें मिली थीं. 2022 में बीजेपी गठबंधन 273 सीटों के साथ फिर सत्ता में लौटा. समाजवादी पार्टी और उसके सहयोगियों की सीटें बढ़कर 125 हो गईं. बसपा 1 सीट पर रह गई. कांग्रेस को सिर्फ 2 सीटें मिलीं. इन आंकड़ों का मतलब साफ है. बीजेपी का आधार कमजोर नहीं पड़ा, लेकिन उसकी बढ़त पहले जैसी भी नहीं रही. वहीं समाजवादी पार्टी ने वापसी की कोशिश की, लेकिन वह सरकार तक पहुंचने लायक बढ़त नहीं बना सकी. 2027 की कहानी यहीं से शुरू होती है.

जाति की राजनीति खत्म नहीं हुई, बस उसका रूप बदल गया

2017 के बाद कई बार कहा गया कि यूपी में जाति की राजनीति कमजोर पड़ गई है. लेकिन सच यह नहीं है. जाति अब भी राजनीति के बीच में है. फर्क सिर्फ इतना है कि उसका तरीका बदल गया है. बीजेपी ने गैर-यादव पिछड़ों और गैर-जाटव दलितों में जो पकड़ बनाई, उसने पुराने समीकरणों को बदल दिया. दूसरी तरफ समाजवादी पार्टी को भी समझ आ गया कि सिर्फ यादव-मुस्लिम आधार के भरोसे बात नहीं बनेगी.

इसलिए उसने छोटे दलों के साथ तालमेल बढ़ाया. पिछड़ों और दूसरे तबकों में जगह बनाने की कोशिश की. बाद में PDA की लाइन भी इसी राजनीति का हिस्सा बनकर सामने आई. 2027 तक आते-आते जाति की राजनीति और तेज हो सकती है. सवाल यह होगा कि गैर-यादव OBC किस तरफ जाते हैं. दलित वोट किस ओर झुकता है. सवर्ण वोट कितना स्थिर रहता है. और क्या विपक्ष सामाजिक प्रतिनिधित्व की बहस को वोट में बदल पाता है.

विपक्ष मौजूद है, लेकिन अभी उसे भरोसेमंद विकल्प बनना है

2022 के चुनाव ने एक बात साफ कर दी. यूपी में विपक्ष खत्म नहीं हुआ है. समाजवादी पार्टी ने अपनी सीटें बढ़ाईं. कई इलाकों में बीजेपी को कड़ी टक्कर दी. उसने यह दिखाया कि मुकाबला अब भी वही खड़ा कर सकती है. लेकिन विपक्ष की असली चुनौती सीटें बढ़ाने से बड़ी है. उसे यह भरोसा भी बनाना होगा कि वह सत्ता का मजबूत विकल्प है. अखिलेश यादव के सामने यही सबसे बड़ा काम है. क्या वह यादव-मुस्लिम आधार से आगे बढ़कर गैर-यादव पिछड़ों, दलितों, युवाओं और शहरी वोटर तक पहुंच बना पाएंगे? क्या सपा बूथ स्तर पर बीजेपी की संगठन क्षमता का मुकाबला कर पाएगी? क्या उसके पास ऐसा मुद्दा होगा जो सिर्फ नाराजगी नहीं, बल्कि वोट ट्रांसफर भी करा सके?

अगर 2027 में लड़ाई सच में कड़ी होनी है तो विपक्ष को 2022 से आगे जाना होगा. सिर्फ सरकार की आलोचना से काम नहीं चलेगा. जमीन, संगठन और सामाजिक विस्तार तीनों पर काम करना होगा.

2027 का चुनाव पूरे यूपी में एक जैसा नहीं होगा

यूपी को एक ही खिड़की से देखने वाले लोग शायद एक ही समीकरण देख पाएं. यूपी को देखना है तो हर इलाकों को देखना होगा. तभी तो पश्चिम यूपी की राजनीति पूर्वांचल जैसी नहीं है. अवध का मिजाज बुंदेलखंड से अलग है. शहरों की प्राथमिकताएं गांवों से अलग हैं. यही वजह है कि 2027 की लड़ाई भी हर इलाके में एक जैसी नहीं दिखती और न ही दिखेगी. पश्चिम यूपी में किसान, जाट-मुस्लिम समीकरण और ध्रुवीकरण का असर अलग होगा. पूर्वांचल में जातीय बुनावट, स्थानीय चेहरे और हिंदुत्व की राजनीति का मेल ज्यादा असर डाल सकता है. अवध और मध्य यूपी में सरकार, प्रशासन और संगठन की ताकत बड़ा फैक्टर बन सकती है. यानी 2027 को समझने के लिए सिर्फ यह नहीं देखना होगा कि यूपी क्या सोच रहा है. यह भी देखना होगा कि यूपी का कौन-सा इलाका क्या सोच रहा है. असली कहानी वहीं छिपी है.

तो 2027 के लिए अभी से कौन-से 5 संकेत दिख रहे हैं?

2017 से 2022 तक के बदलावों को जोड़ें तो 2027 के लिए पांच शुरुआती संकेत साफ दिखते हैं.

पहला:- बीजेपी की ताकत सिर्फ उसका कोर वोट नहीं, उसका बढ़ा हुआ सामाजिक आधार भी है.

दूसरा:-विपक्ष के पास जमीन है, लेकिन उसे भरोसेमंद विकल्प बनना अभी बाकी है.

तीसरा:-जाति की राजनीति खत्म नहीं हुई है. वह नए रूप में फिर केंद्र में है.

चौथा:- सरकारी फायदों की राजनीति और पहचान की राजनीति का मेल अब भी असरदार है.

पांचवां:-2027 की असली तस्वीर क्षेत्रवार मिजाज से ही निकलेगी.

2027 की लड़ाई 2022 की तरह क्यों नहीं है?

यानी अब सभी को यह समझना होगा कि यूपी की राजनीति को सिर्फ 2022 के नतीजों से नहीं समझा जा सकता. 2017 ने जो ढांचा बनाया, 2022 ने उसे मजबूत किया. अब 2027 उसी ढांचे की अगली परीक्षा होगी. लेकिन नई परिस्थितियों में. विपक्ष अपनी जमीन बढ़ाने की कोशिश करेगा. सामाजिक समीकरणों की नई भाषा बनेगी. छोटे दल अपनी जगह तलाशेंगे. और सत्ता पक्ष अपने मॉडल को कायम रखने में पूरी ताकत लगाएगा. अब सवाल सिर्फ इतना नहीं है कि 2027 में कौन जीतेगा. सवाल यह भी है कि यूपी की राजनीति किस दिशा में जा रही है. यही इस सीरीज़ का मकसद है- शोर से अलग जाकर, जमीन की राजनीति को समझना.

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