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बिहार में BJP को कैसे ‘आत्मनिर्भर’ बना रहे सम्राट चौधरी?

by National Agenda
June 16, 2026
in Bihar, Politics
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Samrat Government
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नई दिल्ली।  पिछले हफ्ते बिहार विधान परिषद चुनाव में सभी 10 उम्मीदवार निर्विरोध निर्वाचित घोषित कर दिए गए. इस चुनाव की सबसे खास बात वह नाम था जो सूची में नहीं था- दीपक प्रकाश. वे पूर्व केंद्रीय मंत्री उपेंद्र कुशवाहा के बेटे हैं और बिहार सरकार में मंत्री भी हैं. उनका राजनीतिक भविष्य इस बात पर निर्भर था कि उन्हें छह महीने के भीतर किसी सदन की सदस्यता मिल जाए.

पहले के उलट सत्तारूढ़ BJP को राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (NDA) की विधान परिषद उम्मीदवारों की सूची में दीपक को शामिल करने के लिए विशेष प्रयास नहीं करने पड़े. उनकी अनुपस्थिति का महत्व केवल किसी एक नेता के भविष्य तक सीमित नहीं है.

दीपक को सूची से बाहर रखकर BJP न तो NDA की सहयोगी पार्टी राष्ट्रीय लोक मोर्चा (RLM) के प्रमुख उपेंद्र कुशवाहा के लिए दरवाजा बंद कर रही है और न ही बिहार के सबसे पहचान वाले OBC नेताओं में से एक से टकराव चाहती है. इस बीच कुछ बुनियादी बदलाव हो चुका है. सम्राट चौधरी, जो उपेंद्र की तरह ही कोइरी-कुशवाहा समुदाय से आते हैं, अब मुख्यमंत्री हैं. इसलिए BJP अब इस महत्वपूर्ण सामाजिक समूह तक पहुंचने के लिए किसी क्षेत्रीय नेता पर निर्भरता महसूस नहीं करती.

पिछले दो दशकों के दौरान ज्यादातर वक्त बिहार में BJP एक शक्तिशाली लेकिन पूरी तरह आत्मनिर्भर पार्टी नहीं थी. उसके पास संगठन, कार्यकर्ताओं की ताकत और राष्ट्रीय नेतृत्व का समर्थन था लेकिन प्रभावशाली जातीय समूहों के बीच स्वीकार्यता के लिए उसे क्षेत्रीय सहयोगियों की जरूरत पड़ती थी. उपेंद्र कुशवाहा जैसे नेताओं का महत्व उनकी विधायकों की संख्या से नहीं, बल्कि इस धारणा से था कि वे अपने समुदाय के बड़े हिस्से को अपने साथ जोड़कर रख सकते हैं.

आज BJP को लगता है कि उसे इसका एक वैकल्पिक मॉडल मिल गया है. सम्राट चौधरी में उसे एक ऐसा नेता मिला है जो मुख्यमंत्री, प्रभावशाली OBC चेहरा, राज्यव्यापी नेता और स्वतंत्र शक्ति केंद्र- सब कुछ एक साथ हैं. यानी मुख्यमंत्री के नेतृत्व में BJP की राजनीतिक आत्मनिर्भरता.

यह बदलाव इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि कोइरी-कुशवाहा OBC बिहार की राजनीति में बेहद प्रभावशाली समूह है और राज्य के चर्चित ‘लव-कुश’ सामाजिक गठबंधन का एक प्रमुख स्तंभ भी. इस समुदाय की आबादी 55 लाख से अधिक है. यह राज्य की कुल आबादी का 4.21 फीसदी है और यादवों के बाद इसे दूसरा सबसे बड़ा OBC समूह माना जाता है.

यह केवल कुशवाहा समुदाय की आबादी का मामला नहीं है. इसके साथ कुर्मी वोट भी जुड़ता है, जिसकी हिस्सेदारी 2.87 फीसदी है. बिहार के सामाजिक और राजनीतिक परिदृश्य में कुर्मी और कुशवाहा लंबे समय से लव-कुश गठबंधन के रूप में साथ चलते रहे हैं. दोनों को मिलाकर यह आबादी का 7 फीसदी से थोड़ा अधिक हिस्सा बनता है. यही गठबंधन लगभग दो दशकों तक नीतीश कुमार को चुनावी रूप से मजबूत बनाने में अहम रहा. इससे भी महत्वपूर्ण यह है कि इस गठबंधन ने ऐतिहासिक रूप से ऐसी राजनीतिक पहचान दी जिसके आधार पर व्यापक जातीय गठबंधन तैयार किए जा सके.

लेकिन अब यह प्रभावशाली सामाजिक समूह तेजी से सम्राट चौधरी को अपना स्वाभाविक नेता मानता दिखाई दे रहा है. इसका असर बिहार की बदलती जातीय राजनीति और नेतृत्व की दिशा पर पड़ सकता है.

दशकों तक उपेंद्र कुशवाहा की राजनीतिक प्रासंगिकता कुशवाहा वोटों पर उनकी पकड़ पर टिकी रही. सरकारें उन्हें इसलिए अहमियत देती थीं क्योंकि उन्हें एक महत्वपूर्ण वोट समूह तक पहुंच का माध्यम माना जाता था, न कि इसलिए कि उनके पास कितने विधायक हैं. लेकिन अब मुख्यमंत्री खुद BJP के लिए कुशवाहा वोटों को आकर्षित करने वाले नेता हैं. पार्टी को अब इस समुदाय के प्रतिनिधित्व के लिए किसी सहयोगी पर निर्भर रहने की जरूरत नहीं है. पहली बार राज्य के सबसे महत्वपूर्ण OBC समूहों में से एक का प्रतिनिधित्व सीधे मुख्यमंत्री कार्यालय से हो रहा है.

इसलिए MLC चुनाव में दीपक का प्रकरण एक मोड़ की तरह है. NDA ने लगभग सभी के लिए जगह निकाली लेकिन उपेंद्र के बेटे के लिए नहीं. पिछले दो दशकों के अधिकांश समय में उपेंद्र बिहार की राजनीति में एक अनोखी स्थिति में रहे. विभिन्न गठबंधन उन्हें अपने साथ रखना चाहते थे. वे नीतीश कुमार के साथ आए, अलग हुए, फिर लौटे, फिर दोबारा अलग हुए और लगातार नई राजनीतिक पार्टियां बनाते रहे. आलोचकों ने इसे अस्थिरता कहा. समर्थकों ने इसे राजनीतिक अस्तित्व बनाए रखने की रणनीति बताया. जो भी हो, इस रणनीति ने उन्हें तब भी प्रासंगिक बनाए रखा जब उनके कई समकालीन नेता राजनीति में कमजोर पड़ गए. लेकिन अब NDA के पास वह चीज है जो पहले नहीं थी- उसी सामाजिक समूह से आने वाला एक मुख्यमंत्री.

माना जाता है कि उपेंद्र ने अपनी पार्टी RLM का BJP में विलय करने से इनकार कर दिया, हालांकि उन्होंने NDA में बने रहने की पुष्टि की और दीपक का भविष्य BJP नेतृत्व के हाथों में छोड़ दिया. मुद्दा वंशवाद से असहजता का नहीं था. मुद्दा राजनीतिक प्रभाव का था, या यूं कहें कि उसके कम होते जाने का.

यहीं सम्राट चौधरी स्थिति बदल देते हैं. जो BJP कभी जातीय समूहों को समझने और उनसे संवाद करने के लिए सहयोगियों पर निर्भर रहती थी उसके पास अब ऐसा नेता है जो खुद सबसे महत्वपूर्ण चुनावी समूहों में से एक से सीधा जुड़ाव रखता है. राजनीतिक रूप से देखें तो चौधरी ने BJP को कम निर्भर और अधिक आत्मनिर्भर बनाया है. अब वह सिर्फ बिहार से संवाद नहीं कर सकती बल्कि अपने ही एक नेता के माध्यम से बिहार की आवाज भी बन सकती है.

यह बदलाव केवल जातीय समीकरणों में नहीं, शासन में भी दिख रहा है. अप्रैल में पद संभालने के बाद से चौधरी ने तेजी का संदेश दिया है. उनकी सरकार ने कई पहलों पर तेजी से काम किया है. इनमें इंजीनियरिंग अनुमानों की AI आधारित जांच, AI नीति की रूपरेखा, सार्वजनिक-निजी भागीदारी (PPP) मॉडल पर गंगा एक्सप्रेसवे की योजना, मॉडल सरकारी स्कूलों का विस्तार, नए डिग्री कॉलेज, सैटेलाइट टाउनशिप और सहयोग शिकायत निवारण प्रणाली शामिल हैं.

उनके नेतृत्व में सरकार पहले की तुलना में ज्यादा सक्रिय दिखाई दे रही है और अपने फैसलों व कामकाज को लेकर लोगों से सीधे संवाद करने की कोशिश कर रही है. अधिकारी अब समय-सीमा, परिणाम और तेज क्रियान्वयन की बात अधिक करते हैं. चौधरी का सार्वजनिक संदेश ऐसी सरकार की छवि पेश करता है जो काम करती हुई दिखाई देती है. यही वह बिंदु है जहां BJP का बदलाव केवल सत्ता में बैठी पार्टी की सामान्य कहानी से आगे निकल जाता है.

नीतीश कुमार के लंबे दौर में BJP एक मजबूत सहयोगी थी लेकिन उसकी शक्ति गठबंधन की व्यवस्थाओं और साझा सत्ता की सीमाओं से नियंत्रित रहती थी. चौधरी के नेतृत्व में वह ऐसी पार्टी की तरह दिखने लगी है जो अपनी शर्तों पर शासन करने का अनुभव हासिल कर रही है. उसकी भाषा अधिक आक्रामक है, प्रशासनिक गति तेज है और उसका सामाजिक विस्तार अब बिचौलियों पर कम निर्भर है.

बिहार में जाति आज भी एक स्थाई राजनीतिक शक्ति है. लेकिन अब BJP और मतदाता के बीच सहयोगी ही एकमात्र पुल नहीं रहे. मुख्यमंत्री कार्यालय में चौधरी की मौजूदगी ने पार्टी को केवल गठबंधन मैनेजर से अधिक आत्मविश्वासी शासक शक्ति में बदल दिया है.

यही वजह है कि विधान परिषद चुनाव, भले ही निर्विरोध था और देखने में लगभग नीरस लगता था, लेकिन उसका राजनीतिक संदेश बहुत महत्वपूर्ण था. उसने यह संकेत दिया कि अब NDA के भीतर किसकी अहमियत है. दीपक की अनुपस्थिति एक जोरदार संदेश थी. इससे यह संकेत मिला कि NDA अब हर पुराने राजनीतिक समझौते को बनाए रखने के लिए मजबूर नहीं है. वह चुनिंदा फैसले लेने की स्थिति में पहुंच चुका है.

फिर भी बड़ी कहानी न तो दीपक की है और न ही आखिरकार उपेंद्र की. यह कहानी BJP की है. दशकों तक बिहार में पार्टी का विस्तार शक्तिशाली क्षेत्रीय नेताओं के साथ संतुलन बनाकर हुआ, जिनमें से हर एक किसी खास सामाजिक समूह पर प्रभाव का दावा करता था. आज BJP पहले से अधिक आश्वस्त दिखाई देती है कि वह ऐसे संबंध खुद विकसित कर सकती है. इस आत्मविश्वास के केंद्र में सम्राट चौधरी खड़े हैं. उन्होंने पार्टी को वह चीज दी है जिसकी उसे लंबे समय से तलाश थी- राजनीतिक आत्मनिर्भरता.

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