गोरखपुर: अगर आपको लगता है कि मोबाइल पर ओटीपी को साझा न करके ही साइबर फ्राड से बच गए तो यह बड़ी भूल है. अनजान ऐप्स को डाउनलोड करने और ऑनलाइन गेम्स खेलने के दौरान हुई चूक भी आपका खाता खाली करने के साथ गोपनीय जानकारियां लीक कर सकती है. मदन मोहन मालवीय प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय (MMMUT) की कुलपति प्रो. अनुपम कौशिक शर्मा का कहना है कि बच्चों की ऑनलाइन गतिविधियों पर निगरानी रखना अत्यंत आवश्यक है.
प्रो. अनुपम कौशिक शर्मा विश्वविद्यालय के कंप्यूटर साइंस एवं इंजीनियरिंग विभाग के अंतर्गत स्थापित साइबर फॉरेंसिक रिसर्च सेंटर द्वारा साइबर सुरक्षा एवं डिजिटल फॉरेंसिक विषय पर आयोजित राष्ट्रीय कार्यक्रम को वह संबोधित कर रही थीं. एक वास्तविक घटना का उल्लेख करते हुए बताया कि एक व्यक्ति ने न तो अपना OTP साझा किया और न ही अपने बैंक खाते की कोई गोपनीय जानकारी किसी को दी, फिर भी उसके खाते से धनराशि कट गई. जांच में सामने आया कि उसके मोबाइल का उपयोग उसके बच्चे ऑनलाइन गेम खेलने के लिए करते थे.
इसी दौरान एक अननोन मोबाइल एप्लिकेशन इंस्टॉल हो गई, जिसने अनधिकृत रूप से मोबाइल में उपलब्ध संवेदनशील जानकारी तक पहुंच प्राप्त कर ली, जिसके परिणामस्वरूप बैंक खाते से धन की निकासी हो गई. प्रो. शर्मा ने जिस आयोजन को संबोधित किया, उसमें उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, दिल्ली एवं ओडिशा सहित विभिन्न राज्यों से लगभग 58 प्रतिभागियों ने पंजीकरण कराया था. इस कार्यक्रम का मुख्य उद्देश्य विद्यार्थियों को साइबर सुरक्षा, नेटवर्क सुरक्षा, डिजिटल साक्ष्य विश्लेषण और साइबर अपराध जांच के क्षेत्र में व्यावहारिक एवं शोधपरक ज्ञान प्रदान करना है.
कुलपति प्रो. अनुपमा ने कहा कि डिजिटल युग में साइबर अपराधों की संख्या निरंतर बढ़ रही है. डिजिटल अरेस्ट, ऑनलाइन बैंकिंग धोखाधड़ी, फिशिंग, सोशल मीडिया फ्रॉड, पहचान चोरी तथा साइबर ठगी जैसे मामलों से प्रभावी ढंग से निपटने के लिए प्रशिक्षित एवं कुशल मानव संसाधन की आवश्यकता है. आगे कहा कि विद्यार्थियों के कौशल विकास के लिए उद्योग-सहयोग आधारित प्रयोगशालाएं तथा व्यावहारिक प्रशिक्षण अत्यंत महत्वपूर्ण हैं.
कंप्यूटर साइंस विभागाध्यक्ष प्रो. राकेश कुमार ने कहा कि बढ़ते साइबर अपराध जैसे डिजिटल अरेस्ट, ऑनलाइन ठगी, साइबर स्टॉकिंग, सोशल मीडिया अपराध तथा पहचान चोरी कानून प्रवर्तन एजेंसियों के समक्ष गंभीर चुनौती बन चुके हैं. बताया कि साइबर फॉरेंसिक्स डिजिटल साक्ष्यों के संग्रहण, विश्लेषण एवं न्यायालय में प्रस्तुतिकरण के माध्यम से अपराधियों की पहचान एवं अपराधों के सफल अन्वेषण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है.
यह भी बताया कि विभाग द्वारा 4.67 करोड़ रुपये की लागत से स्थापित अत्याधुनिक “साइबर फॉरेंसिक रिसर्च सेंटर” में मोबाइल फॉरेंसिक्स, डिस्क फॉरेंसिक्स, ड्रोन फॉरेंसिक्स तथा साइबर धोखाधड़ी जांच से संबंधित उन्नत सुविधाएं उपलब्ध हैं. यह केंद्र पहले से ही गोरखपुर पुलिस के विभिन्न थानों के साइबर अधिकारियों के प्रशिक्षण हेतु उपयोग में लाया जा रहा है और भविष्य में भी इस प्रकार के प्रशिक्षण कार्यक्रम निरंतर संचालित किए जाते रहेंगे. जिससे विश्वविद्यालय एवं प्रशासन के बीच समन्वय और अधिक सुदृढ़ होगा.
कार्यक्रम समन्वयक डॉ. विमल कुमार ने बताया कि इस दौरान प्रशिक्षण के तहत प्रतिभागियों को मोबाइल, कंप्यूटर एवं नेटवर्क फॉरेंसिक्स, मल्टीमीडिया विश्लेषण, ड्रोन एवं वीडियो फॉरेंसिक्स, वॉयस एनालिटिक्स, स्टेगनोग्राफी, पासवर्ड रिकवरी और साइबर जांच तकनीकों का व्यावहारिक प्रशिक्षण प्रदान किया जाएगा. साइंस टेक्नोलॉजीज, नई दिल्ली के विशेषज्ञ अनीकेत साहू ने कहा कि वर्तमान समय में केवल सैद्धांतिक ज्ञान पर्याप्त नहीं है, बल्कि व्यावहारिक अनुभव भी उतना ही आवश्यक है.










