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आईआईटी, एम्स, इसरो…नेहरू ने जो बनाया, PM मोदी ने उसे कितना आगे बढ़ाया?

by National Agenda
June 8, 2026
in National
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नई दिल्ली। भारत की तरक्की किसी एक दिन की कहानी नहीं है. यह लंबी यात्रा है. इस यात्रा में कई नेताओं का योगदान है. देश के पहले पीएम जवाहरलाल नेहरू ने आधुनिक संस्थानों की सोच दी. आज के पीएम नरेंद्र मोदी ने कई संस्थानों को नए दौर की जरूरतों से जोड़ा. नए संस्थान खोले. आईआईटी, एम्स और इसरो जैसे संस्थान बड़े उदाहरण के रूप में हमारे सामने हैं. अब जब पीएम नरेंद्र मोदी देश के पहले प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू का रिकार्ड तोड़ने जा रहे हैं तो बरबस कुछ सवाल हवा में तैर रहे हैं.

लोग पूछ रहे हैं कि नेहरू ने आईआईटी बनाए, एम्स बनाए, इसरो की स्थापना की तो मोदी ने उनकी मुहिम को कितना आगे बढ़ाया? आइए, विस्तार से समझते हैं.

संस्थान बनेंगे तो देश बनेगा

नेहरू का जोर वैज्ञानिक सोच पर आधारित था. वे मानते थे कि संस्थान बनेंगे तो देश बनेगा. वे मानते थे कि गरीब देश को ज्ञान से ताकत मिलेगी. उनके दौर में शिक्षा, शोध, इंजीनियरिंग और स्वास्थ्य के लिए बड़े संस्थान बनाए गए. आज आईआईटी, एम्स, परमाणु ऊर्जा, अंतरिक्ष शोध और वैज्ञानिक प्रयोगशालाएं भारत की पहचान हैं. इनमें से कई की जड़ें नेहरू काल में मिलती हैं. नेहरू ने यह समझा कि केवल भाषण से देश नहीं बदलता. इसके लिए संस्थाएं चाहिए. अच्छे शिक्षक चाहिए. प्रयोगशालाएं चाहिए. अस्पताल चाहिए. वैज्ञानिकों को स्वतंत्र माहौल चाहिए.

तकनीकी भारत की शुरुआती प्रयोगशाला

आईआईटी प्रणाली की शुरुआत आजादी के बाद हुई. पहला आईआईटी साल 1951 में खड़गपुर में शुरू हुआ. इसके बाद बॉम्बे, मद्रास, कानपुर और दिल्ली में भी आईआईटी स्थापित हुए. इन संस्थानों में विदेशी सहयोग भी लिया गया. कहीं सोवियत संघ का सहयोग था तो कहीं जर्मनी का तो कहीं अमेरिका के विश्वविद्यालयों का. यह नेहरू की खास नीति थी. भारत को आत्मनिर्भर बनाना था. पर, दुनिया से सीखना भी था. आईआईटी ने भारत को इंजीनियर दिए. वैज्ञानिक दिए. उद्यमी दिए. बड़ी टेक कंपनियों में भारतीय नेतृत्व दिखा. स्टार्टअप जगत में भी आईआईटी का असर आज भी देखा जा रहा है.

मोदी दौर में आईआईटीज को मिला विस्तार

मोदी सरकार के समय आईआईटी नेटवर्क और बड़ा हुआ. साल 2014 में जब उन्होंने पीएम प की शपथ ली तब देश में 16 आईआईटी थे. दो साल पहले ही यह संख्या 23 हो गई. आईआईटी पलक्कड़, तिरुपति, भिलाई, गोवा, जम्मू और धारवाड़ जैसे नए कैंपस इसी विस्तार का हिस्सा बने. आईएसएम धनबाद को भी आईआईटी का दर्जा मिला. सीटें भी बढ़ीं.

साल 2014 में आईआईटी में बीटेक में लगभग 10 हजार सीटें थीं. अब यह संख्या लगभग 20 हजार है. यह बड़ा बदलाव है. अब ज्यादा छात्रों को मौका मिल रहा है. छोटे शहरों और नए राज्यों तक आईआईटी का नाम पहुंचा है. लेकिन चुनौती भी है, नए आईआईटी को पुराने जैसा स्तर पाने में समय लगता है. फैकल्टी की कमी है. स्थायी कैंपस बनाने में भी देरी हुई. शोध की गुणवत्ता पर लगातार काम चाहिए, इसलिए मोदी दौर का योगदान विस्तार और पहुंच में दिखता है. अब जरूरत गुणवत्ता को बराबर मजबूत करने की है.

इलाज और मेडिकल शिक्षा का बड़ा मॉडल बने एम्स

देश का पहला एम्स दिल्ली में साल 1956 में बना. यह नेहरू सरकार की बड़ी उपलब्धियों में था. आज भो दूर-दूर से मरीज यहाँ लंबी लाइन लगाकर भी इलाज करवाना पसंद करते हैं. इसमें तत्कालीन स्वास्थ्य मंत्री राजकुमारी अमृत कौर की भूमिका भी बहुत अहम थी. एम्स का लक्ष्य साफ था. भारत में विश्वस्तरीय अस्पताल बने. मेडिकल शिक्षा बेहतर हो. गरीब मरीज को अच्छा इलाज मिले. शोध और इलाज एक साथ चलें. एम्स दिल्ली ने लंबे समय तक देश का सबसे भरोसेमंद सरकारी अस्पताल बनकर काम किया. यहां इलाज भी हुआ. डॉक्टर भी तैयार हुए. नई चिकित्सा पद्धतियों पर शोध भी हुआ. इस मॉडल ने भारत को बताया कि सरकारी अस्पताल भी उत्कृष्ट हो सकता है.

मोदी दौर में एम्स का हुआ बड़ा विस्तार

मोदी सरकार ने एम्स मॉडल को कई राज्यों तक ले जाने की कोशिश की. साल 2014 तक एम्स दिल्ली के अलावा कुछ नए एम्स शुरू होने की प्रक्रिया में थे. साल 2024 तक देश में 22 एम्स स्वीकृत या विकसित अवस्था में पहुंच गए हैं. कई जगह ओपीडी शुरू है. कई जगह एमबीबीएस की कक्षाएं और अस्पताल सेवाएं शुरू हुईं. गोरखपुर, नागपुर, बिलासपुर, देवघर, गुवाहाटी, राजकोट और अन्य स्थान इस विस्तार से जुड़े. इससे बड़े शहरों पर दबाव कम करने की कोशिश हुई. पूर्वी भारत, उत्तर-पूर्व, मध्य भारत और छोटे राज्यों को इसका सीधा फायदा मिला.

मेडिकल शिक्षा में भी बड़ा विस्तार हुआ. 2014 में देश में एमबीबीएस की लगभग 51 हजार सीटें थीं. अब यह संख्या एक लाख से अधिक हो गई. मेडिकल कॉलेजों की संख्या भी बढ़ी. यह स्वास्थ्य ढांचे के लिए अहम है. खुलने के साथ ही एम्स में कुछ दिक्कतें भी सामने आ रही हैं. कई नए एम्स में डॉक्टरों की कमी है. कुछ जगह इमारत बनी, पर पूरी सेवा धीरे-धीरे शुरू हुई. उपकरण और विशेषज्ञ विभाग तैयार करने में समय लगता है. इसलिए यहां भी असली परीक्षा गुणवत्ता की है.

नेहरू ने जमीन बनाई, संस्था बाद में बनी

इसरो को लेकर एक बात समझना होगा. इसकी स्थापना साल 1969 में हुई. मतलब, नेहरू के निधन के बाद. लेकिन भारत के अंतरिक्ष कार्यक्रम की जमीन नेहरू काल में ही तैयार हुई. साल 1962 में भारतीय राष्ट्रीय अंतरिक्ष अनुसंधान समिति का गठन किया गया जो बाद में इसरो के रूप में जाना गया. यह भारतीय अंतरिक्ष शोध की शुरुआती समिति थी. विक्रम साराभाई इसके प्रमुख चेहरे थे. होमी भाभा और वैज्ञानिक संस्थानों का माहौल भी इसमें मददगार था. साल 1963 में थुम्बा से पहला साउंडिंग रॉकेट छोड़ा गया. यह भारत की अंतरिक्ष यात्रा की शुरुआत थी.

साइकिल और बैलगाड़ी पर रॉकेट पार्ट्स ले जाने वाली तस्वीरें इसी दौर की प्रतीक बन गईं. नेहरू ने वैज्ञानिकों को जगह दी. उन्होंने विज्ञान को राष्ट्र निर्माण से जोड़ा. यही सोच आगे चलकर इसरो की ताकत बनी.

मोदी दौर में अंतरिक्ष कार्यक्रम को मिली नई पहचान

मोदी सरकार के समय भारत की अंतरिक्ष उपलब्धियां ज्यादा चर्चा में आईं. मंगलयान 2013 में लॉन्च हुआ और 2014 में मंगल की कक्षा में पहुंचा. यह भारत के लिए ऐतिहासिक क्षण था. साल 2017 में इसरो ने एक साथ 104 उपग्रह लॉन्च किए. यह विश्व रिकॉर्ड था. 2019 में चंद्रयान-2 मिशन गया. लैंडर सफल नहीं हुआ, लेकिन ऑर्बिटर ने काम जारी रखा. साल 2023 में चंद्रयान-3 ने इतिहास बनाया.

भारत चंद्रमा पर सॉफ्ट लैंडिंग करने वाला चौथा देश बना. भारत चंद्रमा के दक्षिणी ध्रुव क्षेत्र के पास उतरने वाला पहला देश बना. साल 2023 में आदित्य-एल1 सूर्य अध्ययन मिशन लॉन्च हुआ. अगले साल यह अपने निर्धारित हेलो ऑर्बिट में पहुंचा. इसी साल एक्सपोसैट मिशन भी लॉन्च हुआ. यह ब्लैक होल और न्यूट्रॉन स्टार जैसे विषयों के अध्ययन से जुड़ा है. साल 2023 में केंद्र सरकार के नई स्पेस पॉलिसी लेकर आई. इस वजह से निजी कंपनियों को मौका मिला. आज कई दर्जन स्टार्ट-अप इसी क्षेत्र में काम कर रहे हैं. यह बड़ा बदलाव है.

बजट और बाजार का बदलाव

अंतरिक्ष विभाग का बजट भी बढ़ा. साल 2013-14 में यह लगभग पाँच-छह हजार करोड़ रुपये के आसपास था. साल 2024-25 में यह 13 हजार करोड़ रुपये से अधिक तक की यात्रा कर चुका है. यह बढ़ोतरी महत्वपूर्ण है, लेकिन भारत का स्पेस बजट अभी भी अमेरिका, चीन और यूरोप से बहुत छोटा है. फिर भी भारत कम खर्च में बड़े मिशन करने के लिए जाना जाता है. यह इसरो की खास ताकत है.

फर्क कहां दिखता है?

नेहरू का योगदान मूल ढांचे में था. उन्होंने वैज्ञानिक भारत की कल्पना की. उन्होंने उच्च शिक्षा और शोध को राष्ट्रीय प्राथमिकता बनाया. मोदी का योगदान विस्तार, दृश्यता और क्रियान्वयन में दिखता है. उन्होंने संस्थानों को नए जिलों और राज्यों तक फैलाया. उन्होंने अंतरिक्ष को निजी क्षेत्र से जोड़ा. उन्होंने विज्ञान को जन-गौरव का विषय बनाया. नेहरू का दौर निर्माण का दौर था. मोदी का दौर विस्तार और ब्रांडिंग का दौर है. दोनों की चुनौतियां अलग थीं. दोनों के साधन अलग थे.

अब भारत के सामने बड़ा सवाल क्या है?

क्या नए आईआईटी पुराने आईआईटी की तरह मजबूत बनेंगे? यदि हाँ, तो कब तक? क्या नए एम्स में सचमुच गरीब को समय पर इलाज मिलेगा? क्या निजी स्पेस कंपनियां भारत को वैश्विक बाजार में आगे ले जाएंगी? अगर इसका जवाब हां हुआ, तो भारत की वैज्ञानिक यात्रा और तेज होगी. नेहरू की शुरुआत और मोदी का विस्तार तब एक ही राष्ट्रीय कहानी के दो अध्याय बनेंगे. यह कहानी राजनीति से बड़ी है. यह भारत की क्षमता की कहानी है.

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