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अनाज के लिए तरसने वाला भारत कैसे बना 80 करोड़ का अन्नदाता!

by National Agenda
June 6, 2026
in Economy, National
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राशन
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नई दिल्‍ली. एक दौर वह था जब भारत अपनी जनता का पेट भरने के लिए विदेशी जहाजों और अमेरिकी अनाज की खैरात पर निर्भर था जिसे इतिहास में शिप-टू-माउथ यानी जहाज से मुंह तक का दर्दनाक दौर कहा गया. लेकिन आज आजादी के सात दशकों से अधिक समय बाद, वही भारत दुनिया का सबसे बड़ा खाद्य सुरक्षा कार्यक्रम चला रहा है, जिसके तहत 80 करोड़ से अधिक लोगों को मुफ्त अनाज दिया जा रहा है. नेहरू काल में विदेशी मदद पर टिकी खाद्य सुरक्षा से लेकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के कार्यकाल में बड़े पैमाने पर जारी जनकल्याणकारी योजनाओं का यह सफर, स्वतंत्र भारत के सबसे बड़े और ऐतिहासिक बदलावों में से एक है.

यह ऐतिहासिक तुलना इसलिए भी बेहद खास हो जाती है क्योंकि 10 जून 2026 को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी एक बड़ा मील का पत्थर छूने जा रहे हैं. वह जवाहरलाल नेहरू को पीछे छोड़कर भारत के सबसे लंबे समय तक लोकतांत्रिक रूप से चुने गए और लगातार सेवा करने वाले प्रधानमंत्री बनने वाले हैं. ऐसे में भारत की खाद्य सुरक्षा यात्रा दो अलग-अलग कप्तानों के दौर की नीतियों, चुनौतियों और उनकी प्राथमिकताओं के बीच का एक बेहद दिलचस्प और बड़ा अंतर पेश करती है.

नेहरू बनाम मोदी युग 5 मुख्य बातें
नेहरू काल की शिप-टू-माउथ लाचारी: आजादी के बाद जवाहरलाल नेहरू के कार्यकाल में देश कम कृषि उत्पादकता, सिंचाई की कमी और मानसून पर निर्भरता के कारण भयंकर खाद्यान्न संकट से जूझ रहा था. साल 1950-51 में देश का कुल खाद्यान्न उत्पादन महज 50.82 मिलियन टन था जिसके कारण भारत को अमेरिका से पीएल-480 (PL-480) के तहत अनाज आयात करना पड़ता था.

एम.एस. स्वामीनाथन और हरित क्रांति का टर्निंग पॉइंट: नेहरू युग के बाद देश को आत्मनिर्भर बनाने में भारतीय हरित क्रांति के जनक डॉ. एम.एस. स्वामीनाथन ने केंद्रीय भूमिका निभाई. उच्च उपज वाली फसलों (HYV), वैज्ञानिक खेती और 1965 में भारतीय खाद्य निगम (FCI) की स्थापना ने देश को अनाज की किल्लत से निकालकर बफर स्टॉक और खरीद के युग में पहुंचा दिया.

मोदी युग में कल्याण का महा-अभियान: पीएम मोदी के कार्यकाल में संकट प्रबंधन की नीति बदलकर स्केल पर वेलफेयर डिलीवरी में बदल गई. कोविड-19 महामारी के दौरान 26 मार्च 2020 को शुरू हुई प्रधानमंत्री गरीब कल्याण अन्न योजना (PMGKAY) के तहत 80 करोड़ लोगों को मिलने वाले राशन को दोगुना (प्रति व्यक्ति 5 किलो अतिरिक्त) कर दिया गया.

2028 तक पूरी तरह मुफ्त राशन: 1 जनवरी 2023 से सरकार ने इस योजना को नया रूप देकर राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम (NFSA) के सभी लाभार्थियों के लिए अनाज पूरी तरह मुफ्त कर दिया. नवंबर 2023 में कैबिनेट ने इसे 5 साल के लिए और बढ़ा दिया जिससे अब दिसंबर 2028 तक 81.35 करोड़ लाभार्थियों को 5 लाख से अधिक राशन दुकानों के जरिए मुफ्त अनाज मिलता रहेगा.

रिकॉर्ड उत्पादन और डिजिटल रिफॉर्म्स: भारत अब सिर्फ आत्मनिर्भर ही नहीं बल्कि निर्यात क्षमता वाला देश बन चुका है. साल 2025-26 में भारत का कुल खाद्यान्न उत्पादन रिकॉर्ड 376.563 मिलियन टन होने का अनुमान है जो पिछले साल से 18.8 मिलियन टन ज्यादा है. वन नेशन वन राशन कार्ड (ONORC) जैसी तकनीक ने प्रवासी मजदूरों के लिए देश में कहीं भी राशन पाना बेहद आसान बना दिया है.

दोनों युगों की नीतियों की तुलना
नेहरू और मोदी, दोनों ही प्रधानमंत्रियों के दौर में भारत की बुनियादी चुनौतियां और उनके समाधान के तरीके बिल्कुल अलग रहे हैं. नेहरू के सामने एक ऐसा नव-स्वतंत्र राष्ट्र था जो विभाजन के जख्मों, संसाधनों की भारी कमी और कृषि के पिछड़ेपन से कराह रहा था. उस दौर में प्राथमिकता जैसे-भी हो, भुखमरी को रोकना था, भले ही इसके लिए विदेशी मदद लेनी पड़े. नेहरू युग की रणनीति बुनियादी ढांचा (जैसे बांध और भारी उद्योग) खड़ा करने पर केंद्रित थी लेकिन कृषि में तात्कालिक आत्मनिर्भरता तब भी एक दूर का सपना थी.
इसके विपरीत, मोदी सरकार को हरित क्रांति से मजबूत हो चुकी कृषि अर्थव्यवस्था की विरासत मिली जिसका इस्तेमाल उन्होंने देश के आखिरी छोर पर खड़े व्यक्ति तक पहुंच सुनिश्चित करने के लिए किया.

मोदी युग की सबसे बड़ी ताकत लॉजिस्टिक्स और डिजिटल रिफॉर्म हैं. जहां पहले सार्वजनिक वितरण प्रणाली (PDS) भ्रष्टाचार और लीकेज की शिकार थी, वहीं मोदी सरकार ने वन नेशन वन राशन कार्ड और राशन कार्डों के डिजिटलीकरण के जरिए बिचौलियों की भूमिका को खत्म कर दिया. इसके अलावा, ‘पोषण अभियान’ के माध्यम से सिर्फ पेट भरना ही नहीं बल्कि गर्भवती महिलाओं और बच्चों में कुपोषण को दूर करना भी नीति का हिस्सा बना. यह सफर केवल अनाज उत्पादन का नहीं बल्कि अनाज की उपलब्धता से लेकर अनाज के अधिकार तक का एक नीतिगत बदलाव है.

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