नई दिल्ली। वैश्विक अर्थव्यवस्था धीरे-धीरे बदलाव की दिशा में आगे बढ़ रही है और भारत ग्लोबल सप्लाई चेन का लीडर बनने की ओर अग्रसर है। अब इस कड़ी में जापान ने चीन को धीरे-धीरे दरकिनार करना शुरू कर दिया है और भारत की ओर अपना रुख कर रहा है। दशकों तक जापानी बैंकों की विदेशी विस्तार रणनीति में चीन सबसे बड़ा कारोबारी केंद्र रहा है, लेकिन अब यह कहानी पूरी तरह से बदलने वाली है।
जापानी बैंक पहले अपने उद्योगों और ग्राहकों के पीछे-पीछे चीन पहुंचे थे और वहां निवेश, व्यापार तथा वित्तीय सेवाओं का एक बड़ा नेटवर्क खड़ा किया था। लेकिन अब तस्वीर बदल रही है। चीन की धीमी होती अर्थव्यवस्था, बढ़ती लागत और भू-राजनीतिक चुनौतियों के बीच जापानी बैंक धीरे-धीरे अपना फोकस भारत और दक्षिण-पूर्व एशिया की ओर मोड़ रहे हैं। यह बदलाव केवल अस्थायी नहीं, बल्कि एशिया के आर्थिक नक्शे में हो रहे बड़े परिवर्तन का संकेत माना जा रहा है।
भारत के बैंकिंग सेक्टर में जापान का अब तक का सबसे बड़ा निवेश
जापानी बैंक चीन में अपनी उपस्थिति को सीमित कर रहे हैं और भारत तथा सिंगापुर की ओर देख रहे हैं। इस बीच प्रमुख वित्तीय समूह भारत के बैंकिंग और वित्तीय सेवा क्षेत्र में अब तक के अपने सबसे बड़े निवेशों में से कुछ कर रहे हैं। यह रुझान एशियाई विनिर्माण और निवेश प्रवाह में चल रहे एक बड़े बदलाव को दर्शाता है, जिसमें भारत एक प्रमुख लाभार्थी के रूप में उभर रहा है। ऐसा ‘निक्केई एशिया’ ने अपनी रिपोर्ट में कहा है।
चीन में जापानी कंपनियों को करना पड़ रहा चुनौतियों का सामना
निक्केई एशिया की एक रिपोर्ट के अनुसार, पिछले कुछ वर्षों में चीन में कारोबार करने वाली जापानी कंपनियों को कई चुनौतियों का सामना करना पड़ा है। वहां उत्पादन लागत बढ़ी है, स्थानीय कंपनियों से प्रतिस्पर्धा तेज हुई है और कई क्षेत्रों में मांग भी कमजोर हुई है। इसका सीधा असर जापानी बैंकों पर भी पड़ा है। जिन बैंकों ने वर्षों पहले चीन में अपने नेटवर्क का विस्तार किया था, वे अब वहां अपनी मौजूदगी सीमित कर रहे हैं।
रिपोर्ट में बताया गया है कि पिछले 5 सालों में चीन में जापानी स्थानीय बैंकों के ब्रांच नेटवर्क में लगभग 20 प्रतिशत की गिरावट आई है। हालांकि, रिपोर्ट में बैंकिंग कामकाज को बड़े पैमाने पर बंद करने का कोई संकेत नहीं दिया गया है, पर इससे साफ जाहिर होता है कि चीन अब पहले जैसा आकर्षक बाजार नहीं रह गया है।
चीन में जापानी लोन बुक्स में 40% तक की भारी कमी
चीन में कई बड़े बैंकों के लिए भी चुनौतियां साफ नजर आ रही हैं। रिपोर्ट के अनुसार, जापान के तीन बड़े बैंकों – मित्सुबिशी UFJ फाइनेंशियल ग्रुप, सुमितोमो मित्सुई बैंकिंग कॉर्पोरेशन (SMBC) और मिज़ुहो फाइनेंशियल ग्रुप द्वारा चीन में कॉर्पोरेट लोन देने में भारी गिरावट आई है। पिछले 5 सालों में इन तीनों संस्थानों की लोन बुक्स में 40 प्रतिशत तक की कमी आई है।
इस बदलाव के तहत सबसे अहम सौदों में से एक था – SMBC का साल 2025 में YES Bank में लगभग $1.6 बिलियन में 20 प्रतिशत हिस्सेदारी खरीदना। इस सौदे से यह जापानी लेंडर इस प्राइवेट सेक्टर बैंक का सबसे बड़ा शेयरहोल्डर बन गया। इससे उसे भारत में काम कर रही जापानी कंपनियों को सेवा देने के लिए एक मजबूत मंच मिला, साथ ही देश के तेजी से बढ़ते बैंकिंग सेक्टर में भी उसकी पहुंच मजबूत हुई।
आखिर भारत क्यों है जापान के लिए इतना खास?
भारत की सबसे बड़ी ताकत उसका विशाल घरेलू बाजार और युवा आबादी है। यहाँ का तेजी से बढ़ता मध्यम वर्ग, बढ़ती आय और औद्योगिक विस्तार विदेशी निवेशकों को लगातार आकर्षित कर रहे हैं। इसके साथ ही सरकार की विनिर्माण (मैन्युफैक्चरिंग) बढ़ाने वाली नीतियां, इलेक्ट्रॉनिक्स और सेमीकंडक्टर क्षेत्र में मिलने वाले प्रोत्साहन तथा डिजिटल अर्थव्यवस्था का विस्तार भी निवेश के नए अवसर पैदा कर रहा है।
जापान के बड़े बैंक अब केवल भारतीय बाजार को देख नहीं रहे, बल्कि उसमें सीधे निवेश भी कर रहे हैं। पिछले कुछ वर्षों में जापानी वित्तीय संस्थानों ने भारत के बैंकिंग, गैर-बैंकिंग वित्तीय सेवाओं (NBFC) और निवेश बैंकिंग क्षेत्र में अरबों डॉलर का निवेश किया है। इन निवेशों का उद्देश्य केवल जापानी कंपनियों को सेवाएं देना नहीं, बल्कि भारत की घरेलू आर्थिक वृद्धि का हिस्सा बनना भी है। इससे जापानी बैंकों को खुदरा लोन, निवेश बैंकिंग, पूंजी बाजार और वित्तीय सेवाओं के तेजी से बढ़ते भारतीय बाजार तक सीधी पहुंच मिल रही है।
मिज़ुहो बैंक के ग्लोबल CEO मासाहिको काटो ने इस पर कहा – “जापानी कंपनियां अब भारत को अपने सबसे ज्यादा संभावनाओं वाले बाजार के तौर पर देखती हैं। जापान बैंक फॉर इंटरनेशनल कॉर्पोरेशन के सर्वे में 2022 से ही भारत को विदेशों में निवेश के लिए सबसे बेहतरीन जगह माना गया है।”










