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ऊर्जा सुरक्षा ही नहीं विश्व में भारत की स्थिति मजबूत करती हैं PM की यात्राएं

by National Agenda
May 30, 2026
in Diplomacy
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pm modi
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नई दिल्ली : एक ओर अमरीका और इजरायल और दूसरी ओर ईरान के बीच युद्ध को लगभग तीन महीने होने जा रहे हैं और यह तनाव थमने का नाम नहीं ले रहा है। अमरीका को अप्रत्यक्ष रूप से नुकसान पहुंचाने के लिए ईरान ने खाड़ी के देशों पर भी हमले किए हैं। लगभग 20 देश युद्ध की विभीषिका झेल रहे हैं। उधर युद्ध रूकवाने के लिए अमरीका पर दबाव बनाने और अपनी शक्ति का प्रदर्शन करने हेतु एक महत्वपूर्ण समुद्री रास्ता स्ट्रेट ऑफ़ होर्मुज़ को ईरान ने लगभग बंद कर दिया है।

गौरतलब है कि दुनिया के कुल तेल और गैस की 20 फीसदी आवाजाही में इस मार्ग से होती है। ऐसे में भारत सहित कई देश तेल और गैस की कमी के कगार पर खड़े हैं। साथ ही साथ युद्ध के चलते तेल और गैस की आवाजाही के बाधित होने से तेल और गैस की कीमतों में भी खासी वृद्धि हुई है और यह लगातार जारी है। भारत में सरकार द्वारा एक्साईज ड्यूटी घटाकर तेल की कीमतों को स्थिर रखने का बड़ा प्रयास किया गया, लेकिन कच्चे तेल की कीमतों में लगातार होती वृद्धि के कारण अब पेट्रोल और डीजल की कीमतों में भी वृद्धि प्रारंभ हो गई है। कॉमर्शियल गैस की सिलेंडरों की कीमतों में तो पहले से ही भारी वृद्धि हो चुकी है। हालांकि रसोई गैस की कीमतों को अभी तक नहीं बढ़ाया गया है, लेकिन उसमें कभी भी वृद्धि हो सकती है।

88 प्रतिशत पूर्ति आयात होर्मुज स्ट्रेट से ही होती है
दूसरी तरफ चूंकि देश की कच्चे तेल की लगभग 88 प्रतिशत पूर्ति आयात से होती है, तेल की अंतर्राष्ट्रीय कीमतों में हो रही लगातार वृद्धि के कारण भारत का तेल आयात बिल बढ़ता जा रहा है, जिसके कारण एक तरफ रूपए में गिरावट हो रही है तो दूसरी तरफ देश का विदेशी मुद्रा भंडार भी खाली होता जा रहा है। युद्ध के प्रथम ढाई महीनों में ही भारत का विदेशी मुद्रा भंडार 38 अरब डालर कम हो चुका था। इन सब बातों के मद्देनजर प्रधानमंत्री मोदी ने देश की जनता से अपील की है कि वे पेट्रोलियम पदार्थों के उपयोग को उतरोत्तर कम करने का प्रयास करें। इस कारण उन्होंने जनता से वर्क फ्राम होम, अधिक सार्वजनिक परिवहन के इस्तेमाल की भी अपील की है। साथ ही विदेशी मुद्रा बचाने के लिए भी उन्होंने सोने की खरीद को कम करने, विदेशी यात्राओं से परहेज करने आदि के लिए भी जनता से गुहार लगाई है।

पीएम मोदी का विदेश दौरा चर्चा में
इन परिस्थितियों में मई 2026 के तीसरे सप्ताह में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी द्वारा 5 देशों संयुक्त अरब अमीरात (यूएई), नीदरलैंड, स्वीडन, नार्वे और इटली की महत्वपूर्ण यात्राएं आज बड़ी चर्चा का विषय बनी हुई है। हालांकि, इन यात्राओं का रणनीतिक संदर्भ भी है। लेकिन, माना जा रहा है कि इन यात्राओं के पीछे एक बड़ी प्राथमिकता देश की ऊर्जा सुरक्षा, आर्थिक एवं प्रौद्योगिकी सहयोग भी है। पश्चिमी एशिया में क्षेत्रीय अस्थिरता और वैश्विक तेल बाजारों में उथल-पुथल के चलते यह स्पष्ट है कि भारत इस यात्रा को परंपरागत तेल की आपूर्ति और भविष्य के लिए हरित ऊर्जा के क्षेत्र में संभावनाओं को बढ़ाने में सफल हुआ है। संयुक्त अरब अमीरात भारत के तेल आयात का चैथा सबसे बड़ा स्रोत है, जहां से भारत की कुल कच्चे तेल की आपूर्ति का 11 प्रतिशत प्राप्त होता है।

तरल प्राकृतिक गैस की आपूर्ति में यूएई का तीसरा स्थान है और भारत यूएई की गैस का सबसे बड़ा खरीदार है। एलपीजी के लिए भी यूएई भारत का सबसे बड़ा स्रोत है। दूसरी तरफ भारत द्वारा परिष्कृत पेट्रोलियम और लुब्रीकेंट का निर्यात भी यूएई में बड़ी मात्रा में होता है और इस संदर्भ में भी उसका दूसरा सबसे बड़ा स्थान है। भारतीय कंपनियों ने बड़ी मात्रा में यूएई की ऊर्जा परिसंपतियों में निवेश किया हुआ है। यूएई की कंपनी ‘मसदर’ ने राजस्थान में 60 गीगावाट की नवीकरणीय ऊर्जा क्षमता निर्माण के लिए समझौता किया है।

PM मोदी का UAE दौरा भारत की पेट्रोलियम जरूरतें होंगी पूरी
गौरतलब है कि प्रधानमंत्री की यात्राओं में यूएई की यात्रा प्रारंभ में शामिल नहीं थी, और अंतिम समय पर 15 मई के लिए यूएई की यात्रा को प्रधानमंत्री के कार्यक्रम में जोड़ा गया। यात्रा क्रम में इस बदलाव को कूटनीतिक और आर्थिक हलकों में काफी महत्वपूर्ण माना जा रहा है। सबसे खास यह रही कि आपातकाल में भारत के पेट्रोलियम भंडार की आवश्यकता पूर्ण करेगा और ऐसी किसी भी स्थिति में भारत को गारंटी के साथ तेल की आपूर्ति की जा सकेगी। हालांकि, भारत के पास तेल के भंडारण की काफी क्षमता है, लेकिन उसके बावजूद भी युद्धकाल में ऐसा देखा गया कि यह क्षमता युद्ध की स्थिति में अपर्याप्त है।

अबूधाबी नेशनल आयल कंपनी और इंडियन आयल लिमिटेड के बीच एक सहयोग समझौता हुआ, जिससे भारत की एलपीजी आपूर्ति सुरक्षा सुनिश्चित होगी। यूएई की यात्रा में खास बात रणनीतिक प्रतिरक्षा साझेदारी का फ्रेमवर्क भी शामिल है। इसके अंतर्गत दोनों देशों के बीच प्रतिरक्षा और प्रौद्योगिक सहयोग को मजबूत किया जाएगा। जलपोत मरम्मत हेतु गुजरात में एक कलस्टर भी बनाया जाएगा। यूएई द्वारा भारत में निवेश के संदर्भ में भी समझौते हुए। कुल मिलाकर भारत और यूएई के बीच आर्थिक सहयोग का एक नया अध्याय इसके साथ शुरू हो गया है।

आयात से ही पूरी होती हैं ऊर्जा की आवश्यकताएं
यह सही है कि चाहे लंबे समय से देश की अधिकांश ऊर्जा की आवश्यकताएं आयातित पेट्रोलियम पदार्थों से पूरी होती रही हैं, लेकिन, यह भी उतना ही सच है कि देश ने ऊर्जा के वैकल्पिक स्रोतों में भी काफी प्रगति की है। आज देश में जितनी बिजली उत्पादन की क्षमता है, उसका 51 प्रतिशत नवीकरणीय ऊर्जा के स्रोतों जैसे सौर ऊर्जा, पवन ऊर्जा, पनबिजली योजनाओं, न्यूक्लियर ऊर्जा आदि से आता है। इसमें देश लगातार प्रगति कर रहा है, और नवकरणीय ऊर्जा क्षमता जो वर्तमान में 288 गीगावाट है, वर्ष 2030 तक 500 गीगावाट तक पहुंचने का लक्ष्य है। इससे न केवल भारत ऊर्जा की दृष्टि से केवल आत्मनिर्भर बनेगा, बल्कि ऊर्जा की आवश्यकताएं जो अभी तक पेट्रोलियम पदार्थों से पूर्ण होती है, अब नवीकरणीय ऊर्जा से पूर्ण हो सकेंगी। पिछले कुछ वर्षों में बैटरी चलित वाहन जैसे ई-रिक्शा, कारें, छोटे और बड़े ट्रक, बस आदि में अभूतपूर्व प्रगति हुई है। एक तरफ नवकरणीय ऊर्जा क्षमता में वृद्धि और दूसरी ओर विद्युत चलित वाहनों में प्रगति देश को ऊर्जा की दृष्टि से आत्मनिर्भर बनाने में बड़ी भूमिका निभा सकते हैं।

लेकिन, अल्पकाल में देश ऊर्जा की दृष्टि से पूरी तरह से आत्मनिर्भर नहीं हो सकता। पिछले लगभग 3 माह से चल रहे युद्ध के चलते देश के समक्ष एक बड़ी समस्या आ खड़ी हुई है, जो कच्चे तेल की बढ़ती कीमतों, बाधित आपूर्ति आदि के कारण देश में महंगाई बढ़ने लगी है। इसलिए दीर्घकाल के लिए जो प्रयास हो रहे हैं, वे अल्पकाल के लिए शायद काफी नहीं है। देश में आने वाले कुछ समय तक पेट्रोलियम पदार्थों की भी कमी को भी दूर करना जरूरी है। गत सप्ताह प्रधानमंत्री द्वारा की गई खाड़ी देशों की यात्राएं इस संदर्भ में अहम मानी जा रही हैं। प्रधानमंत्री की यात्राओं को देश के समक्ष खड़ी समस्याओं के संदर्भ में देखना होगा।

नीदरलैंड, स्वीडन और नॉर्वे के बाद, मई 19 और 20 को इटली की प्रधानमंत्री जार्जिया मेलोनी के आमंत्रण पर प्रधानमंत्री मोदी की इटली यात्रा खासी चर्चा का विषय रही और भारत ने इटली के साथ द्विपक्षीय व्यापार और निवेश बढ़ाने हेतु समझौते भी किए। इस दौरान यूएई के साथ 5 अरब डॉलर और अन्य देशों के साथ लगभग 40 अरब डॉलर के निवेश समझौते भी किए गए हैं। इन समझौतों में प्रतिरक्षा प्रौद्योगिकी और उद्योग, शोध एवं विकास, हरित ऊर्जा एवं शिपिंग, डिजिटल सार्वजनिक बुनियादी ढांचे सहित अनेक विषयों का समावेश है।

वैश्विक मानचित्र भारत की मजबूत होती स्थिति
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की हाल की विदेश यात्राएँ—जैसे संयुक्त अरब अमीरात, नॉर्वे, इटली और अन्य रणनीतिक साझेदार देशों की यात्राएँ—एक तेज़ी से बदलती वैश्विक व्यवस्था में भारत की वैश्विक स्थिति को मज़बूत करने के एक सोचे-समझे प्रयास को दर्शाती हैं। ये यात्राएँ केवल औपचारिक नहीं हैं; वे भारत की आर्थिक सुरक्षा, ऊर्जा ज़रूरतों, तकनीकी प्रगति और भू-राजनीतिक प्रभाव से गहराई से जुड़ी हुई हैं।

इन यात्राओं से ऊर्जा साझेदारियों को मज़बूती तो मिली ही, दीर्घकालिक समझौते और रणनीतिक पेट्रोलियम भंडारों में सहयोग से भारत को वैश्विक कीमतों में अचानक होने वाले उतार-चढ़ाव और आपूर्ति में रुकावटों में भी राहत मिलेगी। यह विशेष रूप से पश्चिम एशिया में चल रहे भू-राजनीतिक तनावों के संदर्भ में महत्वपूर्ण है। इसी तरह, स्वच्छ ऊर्जा और समुद्री प्रौद्योगिकी में अग्रणी देश नॉर्वे के साथ जुड़ाव, अपतटीय ऊर्जा, हरित हाइड्रोजन और टिकाऊ शिपिंग के क्षेत्रों में सहयोग के नए रास्ते खोलता है।

इटली और अन्य यूरोपीय देशों की यात्राएँ उन्नत औद्योगिक अर्थव्यवस्थाओं के साथ भारत के बढ़ते जुड़ाव को उजागर करती हैं। इटली, जो अपनी विनिर्माण उत्कृष्टता, डिज़ाइन क्षमताओं और तकनीकी नवाचार के लिए जाना जाता है, प्रधानमंत्री की यात्रा रक्षा उत्पादन, ऑटोमोबाइल और उच्च-स्तरीय इंजीनियरिंग जैसे क्षेत्रों में सहयोग के अवसर प्रदान करने में सहयोगी हो सकती है। ये साझेदारियाँ प्रौद्योगिकी हस्तांतरण, संयुक्त उद्यमों और निवेश प्रवाह को सुगम बनाकर भारत की “मेक इन इंडिया” और “आत्मनिर्भर भारत” पहलों को आगे बढ़ाने का काम करेगी।

ये यात्राएं भारत के बहुपक्षीय जुड़ाव को करेंगी
द्विपक्षीय लाभों से परे, ये यात्राएँ भारत के बहुपक्षीय जुड़ाव को भी मज़बूत करती हैं। उदाहरण के लिए, नॉर्वे वैश्विक जलवायु चर्चाओं और महासागर शासन में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। ऐसे देशों के साथ संबंधों को गहरा करके, भारत स्थिरता, जलवायु वित्त और ‘ब्लू इकोनॉमी’ (समुद्री उत्पादों से संबद्ध आर्थिकी) पहलों पर वैश्विक मानदंडों को आकार देने में अपनी आवाज़ को और अधिक प्रभावी बनाता है। इसी तरह, यूरोपीय राष्ट्रों के साथ जुड़ाव भारत को वैश्विक शक्ति संतुलन बनाए रखने और पारंपरिक गठबंधनों से परे अपनी रणनीतिक साझेदारियों में विविधता लाने में मदद करता है।

इन राजनयिक प्रयासों का एक प्रमुख आयाम एक तकनीकी शक्ति के रूप में भारत का उभरना है। पिछले एक दशक में, भारत ने डिजिटल बुनियादी ढांचे, अंतरिक्ष प्रौद्योगिकी, फिनटेक और नवीकरणीय ऊर्जा के क्षेत्रों में महत्वपूर्ण प्रगति की है। ‘डिजिटल इंडिया’, यूपीआई जैसी पहलें, और सेमीकंडक्टर तथा एआई (कृत्रिम बुद्धिमत्ता) पारिस्थितिकी तंत्र में हुई प्रगति ने भारत को एक विश्वसनीय तकनीकी साझेदार के रूप में स्थापित किया है। इन यात्राओं के दौरान, भारत न केवल निवेश की तलाश कर रहा है, बल्कि अपनी क्षमताओं की पेशकश भी कर रहा है—चाहे वह डिजिटल सार्वजनिक बुनियादी ढांचे के क्षेत्र में हो, अंतरिक्ष सहयोग में, या विकासशील देशों के लिए किफायती तकनीकी समाधान प्रदान करने में।

भारत है प्रौद्योगिकी का है सक्रिय सहयोगी
यह परिवर्तन प्रदर्शित करता है कि भारत प्रौद्योगिकी का निष्क्रिय प्राप्तकर्ता नहीं है बल्कि एक सक्रिय सहयोगी और नवप्रवर्तक शक्ति है। नॉर्वे और इटली जैसे तकनीकी रूप से उन्नत देशों के साथ साझेदारी से शोध और विकास कार्यों में तेज़ी आ सकती है, इनोवेशन के माहौल को बढ़ावा मिल सकता है, और भारतीय कंपनियाँ ग्लोबल वैल्यू चेन में शामिल हो सकती हैं। इसके अलावा, भारत का बड़ा बाज़ार, कुशल कार्यबल, और मैन्युफ़ैक्चरिंग को बढ़ावा देने वाली नीतियाँ इसे उन ग्लोबल कंपनियों के लिए एक आकर्षक जगह बनाती हैं जो अपनी सप्लाई चेन में विविधता लाना चाहती हैं।

संक्षेप में कहें तो प्रधानमंत्री की हाल की यात्राएँ कूटनीति और आर्थिक व तकनीकी लक्ष्यों के बीच एक रणनीतिक तालमेल को दर्शाती हैं। ऊर्जा सप्लाई सुरक्षित करके, निवेश आकर्षित करके, इनोवेशन में साझेदारी को बढ़ावा देकर, और ग्लोबल जुड़ाव को मज़बूत करके, भारत खुद को उभरती हुई विश्व व्यवस्था में एक अहम खिलाड़ी के तौर पर स्थापित कर रहा है। बढ़ती आर्थिक ताक़त वाला एक तकनीकी शक्ति के रूप में, भारत अब ग्लोबल घटनाक्रमों पर सिर्फ़ प्रतिक्रिया ही नहीं दे रहा है, बल्कि उन्हें आकार भी दे रहा है।

 

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